प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मार्च 2016
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्यांकन
स्त्री संघर्ष की आत्मकथा 'कूड़ा-कबाड़ा': एक अध्ययन- प्रो. सुशील कुमार शैली
 
 
अजीत कौर आज़ादी के बाद की पंजाबी स्त्री लेखिकाओं में प्रमुख हस्ताक्षर हैं। अभी तक इनके नौ कहानी संग्रह, तीन उपन्यास, दो आत्मकथाएँ, संस्मरण व यात्रा वृतांत प्रकाशित हो चुके हैं। इनकी कुछ रचनाओं पोस्टमार्टम, गौरी, काले कूएँ, कसाइबाड़ा, खानाबदोश, कूड़ा-कबाड़ा का हिन्दी भाषा में भी अनुवाद हो चुका है। खानाबदोश (आत्मकथा) के लिए इन्हें 1986 में साहित्य अकादमी पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। उनकी रचनाएँ अन्य स्त्री लेखिकाओं के समान नारी वेदना की न होकर नारी संवेदना का मुखर स्वर हैं।  इन्होंने  न केवल नारी के संघर्ष का चित्रण किया बल्कि सामाजिक व राजनीतिक विकृतियों का भी चित्रण किया।
 
'कूड़ा-कबाड़ा' लेखिका के संघर्षरत जीवन का प्रामाणिक दस्तावेज है। जिसमें नारी विषयक तमाम जड़ रूढ़ियों, खोखली परम्पराओं, दकियानूसी प्रथाओं को झेलती, सहती और अंतत: दरकिनार करती अपने जीवन को स्वयं आकार देती एक स्त्री का स्वर है। लेखिका के स्वयं के शब्दों में "अपनी ज़िंदगी के सारे राज़ मैं आपके साथ इसलिए नहीं बाँट रही हूँ कि आप मुझसे हमदर्दी जताएँ ।....यह सारी पीड़ा, सारी मेहनत, मौत की गलियों में दुबारा भटकने की यातना और संताप मैं इसलिए नहीं झेल रही हूँ कि मुझे किसी की हमदर्दी की ज़रूरत है।..…यह सारी दास्तान तो आपको सिर्फ़ इसलिए सुना रही हूँ कि आपका परिचय एक डरी-सहमी, नन्हीं सी बच्ची से करवा सकूँ, जो पढ़े-लिखे और शिष्ट समझे जाने वाले, खाते-पीते, इज़्ज़तदार मध्यवर्गीय परिवार में पैदा हुई। जिस बच्चे को उसके बचपन से इसलिए वंचित रखा गया क्योंकि वह बच्चा एक लड़की थी।" (पृ-128,129)
 
फ्रांसीसी लेखिका सीमोन द बउवार ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'दि सेकेण्ड सेक्स' में नारीपन से मुक्ति का नारा लगाते हुए कहा कि 'स्त्री पैदा नहीं होती बनाई जाती है।' सीमोन के इस कथन में वो सारी सामाजिक, दार्शनिक, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि समा जाती है, जिसमें पितृ-सत्तात्मक समाज में लड़की को जन्म से ही नियमों, परम्पराओं की बेड़ियों में जकड़ दिया जाता है। बचपन से ही नारी होने की भावना से जकड़ दिया जाता है। जहाँ परिवार की मान-मर्यादा लड़की के कंधों पर डाल दी जाती है। उसे घर की चार दीवारी में कैद रखा जाता है। उसकी छोटी-छोटी खुशियों, इच्छाओं का गला सिर्फ़ इस लिए घोंट दिया जाता है कि वह एक लड़की है। उसे धार्मिक कथाओं, उपदेशों के माध्यम से सहनशील, त्याग, कुर्बानी का पाठ पढ़ाया जाता है। उस का बचपन, जवानी एक टापू पर अकेले ही बीत जाता है। लेखिका अपनी आत्मकथा के माध्यम से ऐसी सभी लड़कियों का प्रतिनिधित्व करती हुई कहती हैं कि "आज सोचती हूँ तो लगता है, जवानी भी कहाँ आई मेरे जीवन में! शायद आई ही नहीं। अगर आई भी तो सबने यही कोशिश की कि उसे दबा-छिपाकर फ़ना कर दिया जाए। जब तक होश सँभाला, जवानी बीत चुकी थी। अजीब लगता है सोचकर कि एक जीवन ऐसा भी जिसमें से बचपन और जवानी ग़ायब हो गए।" (पृ-21) लड़की का महत्व सिर्फ़ लड़के के कारण ही है। अगर किसी माता-पिता के दो लड़कियां हो जाएं तो उन्हें अभागिन कह कर दुत्कारा जाता है। लड़के के जन्म पर खुशियां मनाई जाती हैं। उसे कुल दीपक माना जाता है। अजीत कौर के बाद जब उसके भाई जसबीर का जन्म हुआ तो ही उसे भाग्यशाली माना गया लेकिन पढ़ने-लिखने का अधिकार छीन लिया गया। हाँ, अगर पढ़ाई हुई भी तो घर की चार दीवारी में जो उस पर पिता का अहसान था। उसे उसकी अभिव्यक्ति के एक मात्र साधन साहित्य से भी दूर करने का प्रयत्न किया जाता है। हालांकि आज यही साहित्यिक प्रयत्न पंजाबी व हिन्दी साहित्य जगत में लेखिका की विशिष्ट पहचान है। घर के प्रत्येक काम पर उसे स्कूल से हटा लिया जाता। "बीजी अक्सर बीमार रहती थीं। जब ज़्यादा बीमार हो जाती थीं, मेरा स्कूल जाना बंद हो जाता। जब जसबीर बीमार हो जाता, तब भी मेरा स्कूल जाना बंद। अब तो मुझे खुद ही महसूस होने लगा था कि घर में कोई बीमार हो या घर में मेहमान आ जाएं, मुझे स्कूल नहीं जाना चाहिए।" (पृ-31)
 
लड़के-लड़की में यह भेद करना आज भी समाप्त नहीं हुआ। "किसी वृक्ष की डाल पर चढ़कर संतरे की तरह तोड़कर चाँद को चूस लूँ, तारों की अँजली भरकर चुपचाप अपने तकिए के नीचे छिपा लूँ।" (पृ- 23) जैसी उसकी बचपन की छोटी-छोटी इच्छाओं, स्वप्नों को सिर्फ़ इसलिए दबाया जाता है क्योंकि वह एक लड़की है, उससे उनके कुल, परिवार की मर्यादा जुड़ी है। धीरे-धीरे ऐसे माहौल बनाया जाता है, जिसमें लड़की का अस्तित्व, उसकी अस्मिता को ही समाप्त कर दिया जाता है और सीमोन के कथन अनुसार एक स्त्री को बना दिया जाता। इस तरह का परिवेश लेखिका को अपने चारों ओर मिला। चाहे वो उसकी माँ हो, विधवा बुआ हो, पड़ोस में उसकी सहेली रोहिणी की विधवा माँ हो या उसकी मौसी हो; जिसे उसके पति ने ज़हर देकर मार डाला और वह पत्नि धर्म का पालन करते हुए अंत तक उसके ख़िलाफ़ बयान नहीं देती। लेखिका अपने जीवन में आए ऐसे पात्रों के माध्यम से स्त्री पर होते अत्याचार, शोषण को प्रस्तुत करती हुई मैथिलीशरण गुप्त की इन पक्तियों को सही सिद्ध कर देती है-
                     अबला जीवन हाय! तीहारी यही कहानी
                     आँचल में है दूध, आँखों में है पानी
 
पंजाब में प्रचलित लोकगीत "साड़ा चिड़िया दा चंबा वे बाबुल असां उड़ जाना" और लोक प्रचलित रूढ़िगत धारणाओं जैसे "लड़की तो पराया धन होती है"। के पीछे एक विकृत पितृ सत्तात्मक सोच ही काम करती है। जिसके अनुसार लड़की का कोई घर नहीं होता। वह विवाह के पहले माता-पिता के घर में पराया धन होती है और विवाह के बाद सास-ससुर के घर में पराई होती है। ऐसे में वह यहीं सोचती रहती है कि उसका अपना घर कौनसा है। लेखिका अपनी पहली आत्मकथा 'खानाबदोश' और दूसरी आत्मकथा 'कूड़ा-कबाड़ा' में ऐसे ही प्रश्नों से जूझती रहती है। लेखिका के कथन अनुसार "मैं तो बीजी के कथनानुसार 'पराया धन' थी।  पराए घर जाना था मुझे। पढ़ाई-लिखाई करके मुझे कौनसी कलक्टरी-बैरिस्टरी करनी थी! चूल्हा चौका ही तो सँभालना था। वही सीखना ज़रूरी था मेरे लिए।" (पृ- 30) दूसरे घर जाने के लिए उसे शिक्षा दी जाती कि कैसे धीमी आवाज़ में बोलना है, कैसे नर्म लहज़े में बात करनी है, कैसे निगाहें नीची रखनी हैं, चिक उठा उठाकर बाहर नहीं झाँकना, धमक-धमककर सीढ़ियाँ नहीं उतरनी ....वग़ैरह....वग़ैरह..। ऐसे समाज में लड़की की अस्मिता घर में पड़ी एक वस्तु की तरह होती है जिसकी न तो कोई चाह, न कोई मुहब्बत होती। जिसे विवाह के समय बैल की भांति एक खूंटे से खोलकर दूसरे खूंटे से बाँध दिया जाता। उसकी शिक्षा उसे केवल सहनशील बनाने तक ही सीमित होती है।" हिन्दू लड़कियों को देवनागरी के अक्षर पढ़ने सिखा दिए जाते ताकि वे रामायण-गीता पढ़ सकें, सिक्ख लड़कियों को गुरमुखी के अक्षर सिखा दिए जाते ताकि वे पाठ कर सकें, और मुसलमान लड़कियों को कुरान की कुछ आयतें कंठस्थ करवा देनी काफ़ी समझी जाती थीं।" (पृ-130) अजीत कौर को सिर्फ़ अपने पिता की इच्छापूर्ति के लिए विवाह करना पड़ता है। शादी से पहले लड़की का मालिक उसका पिता होता है, शादी के बाद पति ।" जहाँ उसके पति को पूरा-पूरा अधिकार होता है कि वह जब जी चाहे उसके साथ बलात्कार कर सकता है। क़ानून उसे 'दाम्पत्यमूलक अधिकार' का नाम देता है।" (पृ-79) भारतीय सामाजिक विवाह पद्धति जिस पर स्त्रीत्ववादी चिंतकों ने सबसे अधिक प्रश्न उठाया है। जिसमें स्त्री की सहमति न के बराबर होती है और ऐसी असहमति पर आधारित रिश्तों में स्त्री-पुरुष संबंधों (सेक्स) में स्त्री की सहमति-असहमति को दरकिनार कर दिया जाता है। उसे मात्र बच्चे (बेटे) पैदा करने की मशीन के रूप में ही देखा जाता है। जहां उसे न चाहते हुए भी गर्भ धारण करना पड़ता है। कुछ ऐसा ही लेखिका के साथ था। "डोली अभी छ: महीने की ही थी कि एक रात वो मेरे पलंग पर आए और बड़ी सर्द, ठंड़ी आवाज़ में कहा, "मुझे मेल चाइल्ड चाहिए।" और दो क्षणों में अपना बीज मेरे जिस्म की धरती में रोपित कर चले गए, जैसे किसी ज़रूरी काम से निबट गए हों।" (पृ-104) क्योंकि स्त्री के जिस्म का मालिक पुरुष है। आज स्त्रीवादी चिंतन में देह की स्वतंत्रता का और यौन संबंधों की स्वतंत्रता की बात जो चल रही है, वह इसी विकृत पृष्ठभूमि की प्रतिक्रिया है जो नितांत स्वाभाविक है। लेखिका उन लोगों के समक्ष प्रश्न उठाती है जो आर्थिक स्वतंत्रता, आत्मनिर्भरता को ही स्त्री लिबरेशन की पहली शर्त मानते है। "क्या किसी मुकाम पर औरत को सही अर्थों में लिबरेशन मिल सकती है? लिबरेशन हासिल करने के लिए उसे कौनसा रास्ता अख़्तियार करना चाहिए? लिबरेशन के पुराने सभी अर्थ मेरे सामने दम तोड़ रहे थे। अगर औरत खुद कमाए, अपनी ज़रूरतों के लिए किसी की मोहताज न रहे, तो वह सदियों पुरानी गुलामी की ज़ंजीरें तोड़कर फेंक सकती है। यही आम धारणा थी। लेकिन क्या आर्थिक स्वतंत्रता, आत्मनिर्भरता ही लिबरेशन की पहली शर्त है।" (पृ-145)
 
लेखिका विवाह के बाद खुद कमाती थी। आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर लेकिन पैसे उसके पति के पास रहते। घर की, बच्चों की छोटी-छोटी जरूरतों को पूरा करने के लिए उसे पति से पैसे मांगने पड़ते और छोटी बातों पर घर से निकाल दी जाती है। यह केवल लेखिका की ही स्थिति नहीं, ऐसी स्थिति आज भी पता नहीं कितनी ही मध्यर्वीगय भारतीय स्त्रियों की है। ऐसे में लेखिका लिबरेशन का अर्थ स्त्री का पहले स्वयं को स्वीकारना, अपनी अस्मिता को स्वीकारना, सदियों पुरानी मन के भीतर घर कर चुकी उन परम्पराओं को तोड़ना मानती है जो सिर्फ़ उसे कूड़ा-कबाड़ा मानती है। लेखिका के स्वयं के शब्दों में "लिबरेशन बाहरी क़ैद की दीवारें टूटने का नाम नहीं। अपने ही मन में बनी किसी काल-कोठरी के ढहने का नाम है। उस काल-कोठरी की नींव सदियों पुरानी परंपराओं से भरी गई है। माँ की माँ की माँ की नसीहतें। मन में बैठा यक़ीन कि औरत महज़ कूड़ा-कबाड़ा है।" (पृ-148) जिसका अहसास उसे पति से अलग होने के बाद भी नहीं होता, यही द्वंद्व है भारतीय स्त्री का जो पुरुष का संरक्षण चाहती है। घर में एक पुरुष के होने पर ही स्वयं को सुरक्षित अनुभव करती है। जब लेखिका घर में एक किन्नर को रख लेती है तो यह  द्वंद्व उजागर होता है। "जब वह मर्दाना कपड़े पहन लेता, मर्दों की तरह बाल बना लेता, तो हम अपने आपको सुरक्षित सा महसूस करतीं। आख़िर एक मर्द है घर में-कन्हैया।" (पृ-166) इसका एक कारण यह भी है, समाज में अकेली रह रही स्त्री को शक और अश्लीलता की दृष्टि से देखा जाता है। उसके चरित्र पर शक किया जाता है। ऐसी परिस्थितियों में स्त्री का अपने भीतर के डर से उभरना ही तो लिबरेशन है। लेखिका के जीवन में यह मोड़ तब आता है जब उसकी बेटी कैंडी की मौत होती है। "सोचती हूँ, यही वह मुकाम था जब मैं सही अर्थों में लिबरेट हो गई थी। सारी परंपराओं के ख़ौफ़ों से, डरों से आज़ाद। पुरानी अजीत कौर की राख में से पैदा हुई ये बिल्कुल मुख़्तलिफ़ अजीत कौर।" (पृ-190-191) और अंतत: लेखिका अपनी दूसरी बेटी अर्पणा में अपने को देखती है और उसे एक सफल चित्रकार के रूप में उभरता देख, सफल देख सोचती है "कम-से-कम एक शाहकार तो है ही जो मैंने अपनी पूरी लिबरेटिड रूह से, स्वतंत्र अस्तित्व से पैदा किया है।" (पृ-190) 
 
स्त्री लेखिकाओं ने आत्मकथाओं के माध्यम से साहित्य में भोगे हुए यथार्थ को प्रस्तुत किया है। अजीत कौर की आत्मकथा 'कूड़ा-कबाड़ा' का उसमें विशेष स्थान है। 'कूड़ा-कबाड़ा' लेखिका के बाह्य और आंतरिक परिवेश से संघर्ष की आत्मकथा है, जिसमें वह पुरुष सत्तात्मक परिवेश में निर्मित स्त्रीपन से छुटकारा पाकर अपनी अस्मिता को एक आकार प्रदान करती है और अंतत: वह अपने लेखन के माध्यम से साहित्य में एक विशेष स्थान प्राप्त करती है।
 
 
 
 
समीक्ष्य पुस्तक- कूड़ा-कबाड़ा
विधा- आत्मकथा
लेखक- अजीत कौर
प्रकाशन- किताबघर प्रकाशन, नयी दिल्ली

- सुशील कुमार शैली
 
रचनाकार परिचय
सुशील कुमार शैली

पत्रिका में आपका योगदान . . .
कविता-कानन (1)मूल्यांकन (1)