प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी 2016
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल
ग़ज़ल-
 
इंसानियत का दोस्तो जज़्बा बना रहे
हर हाल में ये प्यार का पौधा हरा रहे
 
हो काश मुझपे आपकी ऐसी इनायतें
दिल में हमेशा प्यार लबों पर दुआ रहे
 
ये है कमाल आपके हुस्नो-जमाल का
देखा है जिसने आपको बस देखता रहे
 
नज़दीकियाँ तो ठीक हैं, होनी भी चाहिए
वाजिब ज़रा-सा यार मगर फ़ासला रहे
 
माना रदीफ़ का है बहुत ध्यान आपको
लेकिन ज़रा दुरुस्त कुँवर क़ाफ़िया रहे
 
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ग़ज़ल -
 
मेरे दिल पर जब से उनकी हुक्मरानी हो गई
और कुछ रंगीन उल्फ़त की कहानी हो गई
 
डूबकर यादों में उनकी सोचने जब लग गया
बे-बहर ग़ज़लों में भी अच्छी रवानी हो गई
 
ज़ुल्फ़े-जानाँ का यकायक ही झटकना देखकर
झूमती काली घटा भी पानी-पानी हो गई
 
आपसे महकी है इस दिल की दरो-दीवार तक
आपकी मुझ पर यक़ीनन मेहरबानी हो गई
 
पूछने लगते हैं अक्सर ही मेरे अहबाबो-दोस्त
यार बतला दो मुझे भी क्या कहानी हो गई
 
मुझपे इस बढ़ती उमर का कुछ नहीं होता असर
देख लीजे आप ही फिर से जवानी हो गई
 
अब मुझे क्या खूब जाड़ा हो या गर्मी खूब हो
मेरी खातिर तो कुँवर हर रुत सुहानी हो गई

- कुँवर कुसुमेश
 
रचनाकार परिचय
कुँवर कुसुमेश

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ग़ज़ल-गाँव (1)