प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी 2016
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

लघुकथाएँ
जज़्बात
 
बादलों की ओट से रह रह कर निकलते चांद की चमक में वो दुश्मन को टारगेट कर ढेर कर रहा था कि अचानक एक ओर से आई गोली उसके हाथ को ज़ख़्मी कर उसे निहत्था कर गयी। हमलावर की ओर नज़र पड़ते ही उसके मुँह से अनायास निकला। "ज़फ़र!"
चाँद की हल्की रौशनी में कुछ ही फ़ासले पर खड़े वो दोनों कुछ पल को जड़ हो गए। उन कुछ पलों में ही उसकी आँखों में इमरान भाईजान के बेटे को अपने बेटे जैसा दिया लाड प्यार जीवन्त हो उठा।
 
"ज़फ़र तुम यहां! ये सब क्या है?" करीब सात वर्ष पहले पिता के इंतकाल के बाद देश छोड़ सरहद पार चले गए परिवार के इकलौते वारिस को इस रूप में देखकर वो हैरान हो गया।
"ये हमारी आज़ादी का मिशन है चाचू, हमारे रास्ते में मत आओ।" ज़फर का जवाब चोट देने वाला था।
"बेटा छोड़ो ये पागलपन, ये सब क्या कर रहे हो तुम?"
"चाचू, मैंने आप की बाहों में बचपन बिताया है। मैं आप को नुक्सान नहीं पहुंचाना चाहता।"
"बेटा! जज़्बात की बात करते हो तो समझो हमारे जज़्बात और लौट आओ अपनी सरहद की ओर।" उसने उसे समझाना चाहा।
 
"मेरी कौम और मेरा मज़हब ही मेरी सरहद है बस। अब और कुछ नहीं जानता मैं। मुझे मजबूर मत करो। पीछे लौट जाओ।" ज़फ़र की आँखों में आग नज़र आने लगी।
"मैं एक हिन्दुस्तानी फौजी हूँ, मैंने पीछे हटना नहीं सीखा बेटा। चलाओ गोली।" कहता हुआ वो आगे बढ़ने लगा।
ज़फ़र की आँखों में मज़हब की आग तेज होने लगी। उसने टारगेट लिया और गोली चला दी, लेकिन तब तक वो उस तक पहुँच चुका था। निशाना चूक गया और बाज़ी पल भर में ही पलट गयी और ज़फ़र की गन उसके हाथ में आ गयी।
 
"बेटा सरहद की दीवारें मज़हब से नहीं बना करतीं। ये दीवारें तो बनाते हैं तुम जैसे अमन के दुश्मन, अलविदा।" बात पूरी होने तक गन आग उगल चुकी थी।
आसमान में बादल छंट चुके थे और चाँद की हल्की रौशनी में वो सरहद के दुश्मन को गोद में लिए अपने आंसूओं को जज़्ब करने की कोशिश कर रहा था।
 
 
 
 
निर्णय
 
"माँ जी, रीमा एयर फोर्स ज्वाइन करना चाहती है, मैंने अपना निर्णय आपकी सहमति पर छोड़ दिया है।" कहती हुई बहू 'फॉर्म' सामने टेबल पर रख चली गई और मेरे सम्मुख अतीत के दृश्य चलने लगे।
"मानती हूँ तेरी बात कि बेटी बेटा एक समान है लेकिन वंश का नाम तो.........।" पोती के रूप में रीमा के आने पर मन की बात बेटे से बॉटने की कोशिश में थी कि अवि ने मेरी बात बीच में ही काट दी थी।
"क्या माँ? आप भी, फिर वही बात। आप देखना माँ मेरी बेटी भी परिवार की परम्परा को आगे बढ़ायेगी और मेरे बाद.........।" और इस बार मैंने अवि के मुँह पर हाथ रखकर उसकी बात को काट दिया था।
 
कभी कल्पना भी नही की थी कि पति की तरह बेटा भी आंतकवाद के ख़िलाफ़ लड़ते हुए शहीद हो जायेगा। लेकिन ये समय ही है जो सब कुछ समाप्त करने के बाद भी फिर से जीना सिखाता है। अवि के जाने के बाद बहू और बारह वर्षीय रीमा के साथ जीने की कोशिश करना ही शायद एक लक्ष्य रह गया था। देश प्रेम की भावना तो जैसे कहीं पीछे छूट गयी थीं या शायद शहीदों की परम्परा से मोह भंग सा हो गया था।
 
"दादी, लगती हूँ ना पापा की तरह हैंडसम।" सामने अवि की यूनिफार्म पहने रीमा ने सैल्यूट मारकर मुझे अतीत की गहराई से फिर वर्तमान में ला खड़ा किया। मुझे लगा, अब समय आ गया है जब मुझे रीमा को अपना निर्णय बता देना चाहिए, जो मैं बरसो से सोचती आ रही थी। लेकिन रीमा की कही अगली बात ने मेरे हर विचार, हर निर्णय को एक क्षण में बदल दिया।
"दादी! क्या शहीदो की परम्परा सिर्फ बेटा ही निभा सकता है, बेटी नही?"

- विरेंदर वीर मेहता
 
रचनाकार परिचय
विरेंदर वीर मेहता

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कथा-कुसुम (1)