प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी 2016
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आख़िरी ख़त
प्रिय मीनू, 
हो सके तो मुझे माफ कर देना। मैंने कभी भी तुम्हारा दिल दुखाना नहीं चाहा था, लेकिन जो कुछ भी हुआ, उसका मुझे जरा भी अहसास नहीं था। हाँ, यह सच है कि तुम्हें और तुम्हारे दिल को उस वाक़ये से तकलीफ हुई होगी। तुम मुझे बेवफा भी समझ रही होगी। कुछ हद तक यह सही भी है, लेकिन वास्तविकता क्या है, इसे सिर्फ और सिर्फ मैं ही जानता हूँ। 
मुझे याद है वह दिन, जब हम मिले थे। तुमसे पहले भी और लड़कियों से मेरा वास्ता था, पर सिर्फ दोस्ताना। तुममें मुझे एक अलग ही क़शिश दिखी और मैं तुम्हारी ओर आकर्षित होता चला गया। हमारी मुलाकातें बढ़तीं चलीं गईं। दिल तो चाहता था कि तुमसे बहुत कुछ कहूँ, पर तुम्हारे सामने आने पर मानो जुबान पर ताले पड़ जाते थे। कहते हैं न, जो बात मुहब्बत में जुबान नहीं कह पाए, वो बात नजरें कह जाती हैं। यही हमारे साथ भी हुआ। समय गुजरता रहा, जुबां खामोश रही... नजरों से बात होती रही और एक दिन...!
 
क्या तुम भूल सकती हो, उस दिन को जब हम एकांत में बैठे थे और मैंने हौले से तुम्हारे हाथों को अपनी हथेली से दबाकर तुम्हारे कानों में अपने प्यार का इजहार किया था। इसके बाद हमारे दिलों में प्यार का जो लावा था, वह फूट पड़ा था। तुमने भी अपने प्यार का इजहार किया और हम एक दूसरे के साथ ज़िंदगी की खुशियों और ग़म को साथ-साथ काटने की ख़्वाहिश के साथ चलने लगे। 
समय पंख लगाकर उडऩे लगा। दिन, महीनों में और महीने साल में बदलने लगे। हाँ, पूरे तीन साल हो रहे थे, हमें मिले हुए। एक दूसरे के साथ ये तीन साल कैसे गुजर गए, पता ही नहीं चला। इन गुजरे वर्षों में हमारे दरमियाँ प्यार और तकरार का खेल चलता रहा। एक दूसरे से रूठना और फिर मान जाना, सच में इसका भी एक अलग ही मजा है और इस पल को खूब जिया हमने। 
 
कितनी हँसी शाम थी वह, तुम मेरी पसंदीदा रंग की प्यारी सी सलवार और कुर्ते में मुझसे मिलने आई थीं। साथ ही मेरे उसी पसंदीदा गुलाबी रंग की जैकेट और उस पर काले धागे की कसीदाकारी तुम्हे और भी खूबसूरत रूप दे रही थी। तुम्हारा जन्मदिन था, उस दिन, मुझे अच्छी तरह याद है। मैं यह भी नहीं भूला था कि जन्मदिन पर नायाब तोहफा देने का वादा किया था मैंने। मुझे यकीन है, मेरे उस तोहफे को तुमने आज भी सहेज कर रखा होगा। आज भले ही हमारे बीच दूरियाँ बढ़ गईं हों, लेकिन यह सच है कि हम कभी एक-दूसरे के करीब थे। बहुत करीब। वक्त गवाह है, हमारी मुहब्बत का। 
मैं चाहता था कि तुम्हें कभी भी किसी बात की कमी न हो और इसके लिए जरूरी था पैसा। पैसे के लिए काम। मैं अब तुम्हें कम समय दे पाता था। मेरा अधिकांश समय काम में निकल जाता था। वैसे भी मैं उस पेशे से जुड़ा हुआ हूँ जिसमें समय की कोई पाबंदी नहीं होती, किसी भी समय कोई भी काम निकल आता था। हमें मिले तीन साल हो गए थे। तुम्हारे घर में तुम्हारी शादी के लिए भी दबाव बढ़ता जा रहा था, ऐसे में मुझे खुद को जल्द से जल्द बेहतर तरीके से स्थापित कर तुम्हारे घरवालों से बातचीत भी करनी थी। 
 
अब हम पहले की तरह रोज नहीं मिल पाते थे। हमारी मुलाकात मेरी साप्ताहिक छुट्टी के दिन ही हो पाती थी। एक दिन तुम्हारे घर जाने पर मुझे मालूम हुआ कि तुम अपने मामा के घर यानि दूसरे शहर गई हो और अब वहीं रहोगी। मुझे तुम्हारी सहेलियों से यह भी पता चला कि तुमने अपने मामा के शहर में कॉलेज में दाखिला भी ले लिया है। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ, यह सोचकर कि किस रंग के कपड़े पहनने से लेकर हर बात मुझसे पूछकर करने वाली मेरी मीनू ने इतनी बड़ी बात की जानकारी मुझे नहीं दी!
खैर, मैँ यह सोचकर शांत रहा कि हो सकता है तुम्हारी कोई मजबूरी रही हो। वास्तविकता का पता तो तुमसे मिलकर ही चलेगा। मैंने तुम्हारे मामा के घर का पता तुम्हारे घर से लिया और वहाँ जाने का मन बनाने लगा। एक शाम आफिस से लौटकर जब मैंने घर का ताला खोला तो चौखट पर एक पत्र मुझे मिला। पत्र में तुम्हारी लिखावट में मेरा नाम और पता लिखा देख मैं खुद को एक पल भी नहीं रोक पाया। लिफाफा खोलकर पत्र को पढऩे लगा। पत्र में लिखे एक-एक वाक्य मुझे कांटों की तरह चुभने लगे और मुझे दुनिया घूमती हुई नजर आने लगी। तुम्हारी बेरुख़ी और मुझ पर बेवफ़ाई का इल्ज़ाम लगाने का कारण मुझे समझ नहीं आया। तुम्हारे खत का मजमून कुछ ऐसा ही था ना...
 
राज, 
मैं तुमसे दूर जा रही हूँ, हमेशा-हमेशा के लिए। जी तो चाहता है कि खुद को समाप्त कर लूँ और मुक्त हो जाऊँ, लेकिन फिर यह सोचकर जीना कबूल किया कि बेवफ़ाई तुमने की तो मैं अपनी ज़िंदगी क्यों समाप्त करूँ। हाँ, मैं जीऊंगी और तुम्हें दिखा दूँगी कि प्यार में धोखा खाने के बाद भी जिया जा सकता है। 
एक वह समय था जब हम दोनों रोज मिलते थे, फिर हमारे दरमियाँ दूरियाँ बढ़ती गईं। कभी-कभी मेरे मन में यह विचार आता था कि कहीं तुम मुझसे ऊब तो नहीं गए, फिर अपने विचारों को एक ही पल में झटक देती और अपने ही आप से कह उठती कि नहीं, ऐसा नहीं हो सकता, मैं यह कैसे सोचने लगी। मैंने तुम्हारी हर बात पर आँख बंद कर विश्वास किया। मैं यही सोचती कि तुम्हारा पेशा ही ऐसा है, जिसमें वक़्त बस में नहीं, लेकिन तुम...?
तुम्हारी हर गलती को मैं यह सोचकर नजरअंदाज कर देती कि अब तुम सुधर जाओगे। कभी-कभी तुम गुस्से में आकर मुझे उल्टा-सीधा कह देते तो मैं अवाक रह जाती। सोचती कि तुम कितने बदल चुके हो। हाँ, बहुत बदल गए थे तुम इन तीन सालों में, तुम्हारे स्वभाव में मुझे चिड़चिड़ापन साफ झलकने लगा था। फिर भी मैं तुम्हारा विरोध नहीं करती थी, आखिर हमने प्यार किया था और प्यार में सहना पड़ता है सब। तुम ही कहते थे न कि प्यार में 'मैं' और 'तुम' की भाषा नहीं चलती, प्यार में इन दोनों को मिलाकर 'हम' बनाना पड़ता है। मैंने तो 'हम' में जीना सीख लिया था, पर तुम क्यों भूलने लगे?
 
मैं नहीं जानती थी कि तुम बेदर्द होने के साथ-साथ बेवफ़ा भी हो सकते हो। उस दिन जब तुम्हारे एक दोस्त ने मुझे तुम्हारे बारे में कुछ बातें बताईं तो मैं सन्न रह गई, पूरी बातें मैं सुन नहीं सकी और वहां से चली गई, लेकिन सारी बातें साफ हो गई थीं। तुम्हारा वो रूखा व्यवहार, तुम्हारी चिड़चिड़ाहट, मुझसे बढ़ती दूरियाँ... अब और सुनने-समझने के लिए क्या रह जाता है। तुम जानते थे कि मैं सब कुछ सह सकती हूँ लेकिन यह कभी नहीं सह सकती कि तुम पर मेरे सिवा कोई और अपना हक़ जताए। तुमने मेरे विश्वास को ठेस पहुंचाई है, मैं जा रही हूँ, तुमसे दूर, बहुत दूर...। नई ज़िंदगी की तो अब तलाश नहीं है, लेकिन पुरानी ज़िंदगी भी काटने लगी है मुझे। 
अलविदा....
-मीनू
 
मीनू, 
तुमने मुझ पर बेवफ़ाई का इल्जाम तो लगा दिया परंतु एक बार तुम्हें मुझसे बात तो करनी थी। इतना बड़ा फैसला तुमने स्वयं कर लिया। क्या तुम्हें मुझ पर यकीन नहीं था? अरे तुम कहती हो मैं 'हम' को भूल गया... नहीं, मुझे आज भी याद है। शायद तुम भूल गईं, तभी तो चली गईं, अकेले ही फैसला कर। 
 
जिंदगी में कई ऐसे मौके आते हैं, जब इंसान को कई बातें सुननी पड़ती हैं। कुछ बातें सही होती हैं, कुछ गलत। दुनिया में बनाने वाले बहुत कम होते हैं, जबकि बिगाडऩे वालों की संख्या असंख्य होती है। तुमने मुझ पर बेवफ़ाई का इल्जाम लगाया है, कैसी बेवफ़ाई का? इसका खुलासा तुमने नहीं किया है। मेरी समझ में यह नहीं आता कि मेरे किस दोस्त ने तुम्हें मेरे खिलाफ भड़काया है। प्यार की डोर विश्वास के कच्चे धागे से बंधी होती है, जो हल्की सी चोट पर टूट जाती है। मैं तुम्हें कोई सफाई नहीं दे रहा हूँ, क्योंकि सफाई देने की स्थिति तो तब आती है, जब कोई गलती की गई हो। हाँ, इतना जरूर कहूंगा कि मेरी जिंदगी में तुम्हारे सिवा कोई दूसरा नहीं है।
तुमने लिखा है कि दूर जा रही हूँ, बहुत दूर! जबकि मुझे नहीं लगता कि हम दूर हैं। प्यार का अहसास हमें एक दूसरे से जोड़े हुए है। यदि तुम्हें मेरी बातों का यक़ीन हो तो इस  पत्र के मिलते ही मुझे पत्र लिखना, अन्यथा मैं समझूंगा कि मेरा यह आख़िरी ख़त है तुम्हें!
तुम्हारा 
- राज
 

- अतुल श्रीवास्तव
 
रचनाकार परिचय
अतुल श्रीवास्तव

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कथा-कुसुम (1)'अच्छा' भी होता है! (1)