प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर-दिसम्बर 2015 (संयुक्तांक)
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल
ग़ज़ल
 
किया हर फ़ैसला खुद सुना कुछ भी नहीं
हमें भी ज़िद रही, और कहा कुछ भी नहीं
 
बिछड़ जाने का तेरे बहुत डर था हमें
हुआ कुछ भी नहीं, पर रहा कुछ भी नहीं
 
वफ़ा की राह में यूँ भी हुई है रहज़नी
गया कुछ भी नही और बचा कुछ भी नहीं
 
नसीहत की थी उसने मुझे जाते हुए 
तेरा कुछ भी नही और मेरा कुछ भी नहीं
 
दिए हैं ज़ख्म तुमने मगर उनके लिए
दवा कुछ भी नहीं, है दुआ कुछ भी नहीं
 
मुहब्बत है तिजारत तो फ़िर आलोक जी
वफ़ा कुछ भी नही, और जफ़ा कुछ भी नहीं
 
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ग़ज़ल
 
वहीँ ज़िन्दगी मोतबर हो गयी
तुम्हारी इनायत जिधर हो गयी
 
तवील इस क़दर थी कहानी मेरी
सुनाते सुनाते सहर हो गयी
 
नज़ारा तेरा जो दिखा सामने
किधर थी ये दुनिया किधर हो गयी
 
हवा भी उन्हीं के तआक़ुब में है
जिधर वो गए ये उधर हो गयी
 
दुआ जिसमें शामिल न थी आपकी
दवा भी वही बेअसर हो गयी
 
निहारूँ तुझे आँख भरकर सनम
इजाज़त मुझे आज भर हो गयी
 
रखे हाथ सर पे जो साहब तेरे
तो आलोक समझो सहर हो गयी
 
 
 
मोतबर= सम्माननीय, तवील= लम्बी, सहर= सवेरा, तआक़ुब= प्रभाव

 


- आलोक यादव
 
रचनाकार परिचय
आलोक यादव

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ग़ज़ल-गाँव (1)