प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितम्बर - अक्टूबर 2019 (संयुक्तांक)
अंक -53

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव

ग़ज़ल-

रुख़-ए-इंसानियत पर भीगे जूते मार देती है
यहाँ पर भूख जब मासूम बच्चे मार देती है

हमें मालूम है नाजायज़-ओ-जाइज़ है क्या लेकिन
शिकम की आग तो सारे सलीक़े मार देती है

मेरे दिल में भी जज़्बे हैं, तमन्नाएँ मचलती हैं
मगर ग़ुरबत मुहब्बत के इरादे मार देती है

मुहब्बत अजनबी लोगों से रिश्ता जोड़ लेती है
क़ुदूरत हद से बढ़ जाये तो रिश्ते मार देती है

हम अपनी माँ की नज़रों में वही मासूम बच्चे हैं
चपत वो प्यार से अब भी हमारे मार देती है

मुझे 'मश्कूर' उससे जब शिक़ायत होने लगती है
वो नम आँखों से मेरे सारे शिक़वे मार देती है


शिकम= पेट, ग़ुरबत= ग़रीबी, क़ुदूरत= मलिनता
***********************


ग़ज़ल-

ऐसा नहीँ दुआओं में माँगा नहीं तुझे
क़िस्मत में ही नहीँ था जो पाया नहीँ तुझे

दिल तो अक़ीदतों की हदों से गुज़र गया
वो तो ख़ुदा का ख़ौफ़ था, पूजा नहीँ तुझे

सब मुन्तज़िर थे मेरी निगाहें किधर उठें
मैंने भी एहतियात में देखा नहीं तुझे

शायद पलट के देख ले तू ही मेरी तरफ़
मैंने इसी उम्मीद पे रोका नहीँ तुझे

तेरे ख़याल साथ थे मेरे क़दम-क़दम
मैं तो किसी क़दम पे भी भूला नहीँ तुझे

अंदेशा-ए-जुदाई के डर में जिया हूँ मैं
ये मत समझ के टूट के चाहा नहीँ तुझे

वो पल हराम हो गया 'मश्कूर' के लिये
जिस पल तसव्वुरात में पाया नहीँ तुझे


अक़ीदत= श्रद्धा, मुन्तज़िर= प्रतीक्षारत
एहतियात= सावधानी, तसव्वुरात= कल्पनाएँ


- मश्कूर ममनून कन्नौजी
 
रचनाकार परिचय
मश्कूर ममनून कन्नौजी

पत्रिका में आपका योगदान . . .
ग़ज़ल-गाँव (1)