प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितम्बर - अक्टूबर 2019 (संयुक्तांक)
अंक -53

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन
मुस्कुराहटें
 
नहीं बदल सकती इतिहास
मेरी मुस्कान
फिर भी उसने मुस्कुराते हुए कहा था
स्माइल प्लीज़
 
तीन सेकंड के लिए कहा था
चीज़...बत्तीसी दिखाने की जुगत में
पर कैमरे के एक क्लिक ने सहेजा ऐसा
कि खिलखिलाहटों के साथ
कह उठी वो
मुस्कुराया करो दोस्त
कभी भी
नहीं लगोगे
आउट ऑफ फैशन
दर्द को जज़्ब करते हुए
लाल चेहरे के साथ
जब एक पल को अनायास
उसी को देख
मुस्काया था
तो उलझनों का भारी बोझ
पता नहीं कैसे
उतर आया था
 
उसी ने कभी एक पल को समझाया
उम्मीदों आकांक्षाओं को
अगर दे सकते हो तिलांजलि
तो देखना
कैसे मुस्कुराहटों की झोली
तुम्हारे होंठों से लटक जाएगी
 
आईने ने भी कभी-कभी
की कोशिश
कि बता सके
मुस्कुराते चेहरे की अनमोल क़ीमत
 
और साथ ही
ख़ुद-ब-ख़ुद
ढूँढ़ने लगे मौके और कह दिया स्वयं को
ऑलवेज कीप स्माइलिंग
ऐ सदा मुस्कुराते रहने वाले दोस्त!
तुम्हारी मुस्कुराने की अदा
मेरी उलझनों को सुलझा कर
देती है दिलासा
छोटी-सी ज़िन्दगी
क्यों न हँस कर गुज़ार दूँ
आओ मुस्कुराहट की भाषा अपनाएँ
उसी को संवाद का
नया पैमाना बनाएँ
 
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प्रेम और विज्ञान
 
जड़त्व के नियम के अनुसार ही
वो रुकी थी, थमी हुई
निहार रही थी बस स्टैंड के चारों ओर
था शायद इंतज़ार बस का
या किसी और का तो नहीं?
 
जो भी हो पर बस आयी, रुकी, फिर चली भी गयी
पर वो रुकी रही...स्थिर!
यानी हुआ नहीं उसका अवस्था-परिवर्तन
 
तभी एकदम से सर्रर्र से रुकी एक बाइक
न्यूटन के गति के प्रथम नियम का हुआ असर
वो बाइक पर चढ़ी, चालक की कमर में थी बाँहें 
और फिर दो मुस्कुराती शख्सियतें फुर्र-फुर्र
 
प्यार व आकर्षण का मिश्रित बल
होता है गजब की शक्ति से भरपूर
इसलिए दो विपरीत लिंगी मानवीय पिण्डों के बीच की 
संवेग परिवर्तन दर
होती है समानुपाती उस प्यार की; जो दोनों के बीच पनपता है
ओह! प्यार की पराकाष्ठा क्या न करवाए
न्यूटन गति का द्वितीय नियम प्यार पर हो गया भारी
 
सुना था न!
प्रत्येक क्रिया के बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया
तभी तो
मिलती नज़रें या बंद आँखों में सपनों का आकर्षण
दूसरी सुबह को फिर से क़रीबी के अहसास के साथ
पींगे बढ़ाता प्यार
न्यूटन के तृतीय नियम की सार्थकता के साथ
 
गति नियम के
एक- दो- तीन करते हुए प्यार की प्रगाढ़ता
ज़िन्दगी में समाहित होती हुई
उत्प्लावित होता सम्बन्ध
विस्थापित होते प्यार की तरलता के बराबर
 
जीने लगते हैं आर्कीमिडिज के सिद्धांत के साथ
दो व्यक्ति
एक लड़का- एक लड़की!
 
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घिसी हुई चप्पल
 
घिसी हुई चप्पल
पड़ी थी पायताने में
थी एक उल्टी पड़ी
एक थी सीधी
औंधा पडा था चेहरा मेरा
तकिये में दबी पड़ी थीं आँखें
था आँखें मींचे
सोच रहा था देखूँ कोई हसीं सपना
पर बंद आँखों के परिदृश्य में
नीचे पड़ी
घिसते चप्पल की बेरुखी
दिख ही जा रही थी
बता दे रही थी अपने तलवे के प्रति बेरुखापन
तभी खुल गयी आँख
ख़ुद से ख़ुद ने कहा
लगता है जाना है किसी यात्रा पर
तभी तो दिख रही है चप्पल
पर ये टूटी चप्पल ही क्यों
क्योंकि बता रही मुझे
मेरी स्थिति की परिस्थिति
साम्राज्यवाद के प्रतीक पलंग पर लेटे हुए
मजदूरवाद को जीवंत करती हुई
घिसी हुई चप्पल
बार-बार मस्तिष्क में डेरा जमा कर
खुलती बंद आँखों में पर्दा हटाते हुए
बता रही थी
कि चलो किसी यात्रा पर
झंडे का डंडा पकड़े
ताकि सार्थक क़दमों के
एक, दो, तीन, चार के क़दमताल के साथ
हम भी समझ पाएँ
चप्पल की अहमियत
 
एक पल को मुस्काते हुए
हुई इच्छा कि ख़ुद को कहूँ
मत चलो नंगे पाँव
चुभ जाएँगे कील या कोई नश्तर
पर
वीर तुम बढ़े चलो- कि देशभक्तिपूर्ण शब्दों से
मर्द के दर्द को पी जाने की व्यथा
आ गयी चेहरे पर
नींद टूट चुकी थी
पहन ली थी चप्पल
जा रहा था .........!
नई चप्पल को ख़रीदने
ताकि
चेहरे की इज़्ज़त बरक़रार रहे पाँवों में!
 
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मैया
 
मैया कर देती थी तुरपाई
स्नेहसिक्त धागे से
मेरे हर दर्द की
मैया की अँगुलियों की छुअन
सहेज रखी है मैंने
कुछ पुराने उधड़े बुशर्ट पर
जो है
अलग-अलग रंग के धागे की सिलाई में
या फिर से टंके बटन पर!
शायद तभी उन दिनों
शर्ट की सिलाई ज़्यादा उधडती थी
ज़्यादा टूट जाते थे बटन भी!
 

- मुकेश कुमार सिन्हा
 
रचनाकार परिचय
मुकेश कुमार सिन्हा

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कविता-कानन (2)