अगस्त 2019
अंक - 52 | कुल अंक - 55
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

प्रेम जनमेजय के व्यंग्यों में विविध पक्ष
- अकबर अली शेख


व्यंग्य शब्द की व्युत्पत्ति वि+अंग से हुई है। इसे अंग्रेजी में ‘सटायर’ कहते है। व्यंग्य शाब्दिक बाँण है, जिसके प्रहार से व्यक्ति अंदर तक तिलमिला उठता है। हरीशंकर परसाई के अनुसार- "व्यंग्य जीवन से साक्षात्कार करता है, जीवन की आलोचना करता है। विसंगतियों, मिथ्याचारों और पाखंडों का पर्दाफाश करता है। अच्छा व्यंग्य सहानुभूति का सबसे उत्कृष्ट रूप होता है।"1

अनादि काल से व्यंग्य किसी न किसी रूप में विद्यमान है। कृतयुग या सतयुग में भी व्यंग्य के दर्शन होते हैं। नारद इसके सार्थक उदाहरण हैं। जहाँ वे मधुर भाषा में सूचना देने के साथ ही साथ टोंट भी मारते हैं। इसके पश्चात हम संस्कृत, प्राकृत, पालि, अपभ्रंश के साथ-साथ हिंदी साहित्य के आदिकाल, मध्यकाल और आधुनिकाल में व्यंग्य की विकास यात्रा को देख सकते हैं। जहाँ व्यंग्य मात्र कथन की शैली के रूप में प्रचलित थी, आज वही साहित्य के अंतर्गत एक विधा के रूप में अपना अस्तित्व बनाने के लिए संघर्षरत है।

हरिशंकर परसाई, रवीन्द्रनाथ त्यागी, शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल, सुदर्शन मजीठिया आदि आधुनिककाल के व्यंग्यकारों ने अपनी-अपनी रचनाओं के माध्यम से व्यंग्य विधा को समृद्ध किया। इन्हीं की भाँति प्रेम जनमेजय जैसे 21 वीं शताब्दी के व्यंग्यकार इस दिशा में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। व्यंग्य विधा के संवर्धन में इनका विशेष स्थान है। 'अमर उजाला' में तरसेम गुजराल का कहना है कि "प्रेम जनमेजय में व्यंग्य बहुत सहज है, वह अलग तरह के रचनाकार हैं। सामाजिक दायित्व समझते हैं। यह खूबी उनके व्यंग्य को फूहड़ नहीं होने देती।"
प्रेम जनमेजय द्वारा रचित व्यंग्य संग्रह 'भ्रष्टाचार के सैनिक' का प्रकाशन 2017 में हुआ। इस संग्रह में कुल 41 व्यंग्य संकलित हैं। 'बर्फ का पानी', 'मोची भया उदास', 'भ्रष्टाचार के सैनिक', 'एक इलेक्ट्रोनिक होली', 'अहिंसक हिन्दी' आदि इनके बेजोड़ व्यंग्य हैं। 'भ्रष्टाचार के सैनिक' नामक व्यंग्य पर इस संग्रह का नामकरण किया गया है।


प्रस्तुत व्यंग्य संग्रह में तात्कालिक समस्याओं को उद्घाटित करने का प्रयास किया गया है, जिनसे हम दैनिक जीवन में टकराते और जूझते भी हैं। भ्रष्टाचार, सामाजिक विषमता, आर्थिक भेद-भाव, हस्त व्यवसाय का लुप्त होना, छल-कपट, स्वार्थ, बेरोजगारी के चलते व्यक्ति का पश्चिम की ओर मुड़ना, पारिवारिक संबंधों में विघटन आदि पर अपने व्यंग्य द्वारा कटाक्ष किया है। प्रस्तुत व्यंग्य संग्रह में निराकरण के सूत्र भी मिलते हैं, जो सामाजिक समस्याओं को हल करने में सहायक सिद्ध होते हैं।

प्रारम्भिक काल में ‘समाज’ जैसी कोई अवधारणा नहीं थी। प्रायः मनुष्य समूह रूप में रहता था। धीरे-धीरे वह समूह कस्बों, समुदायादी में परिवर्तित होते-होते समाज का रूप धारण कर लिया। तत्पश्चात्य समाज में अनेकानेक समस्याएँ उत्पन्न होने लगीं। समय के साथ कुछ समस्याएँ खत्म हो गयीं तो कुछ समस्याओं ने समाज को अपने आलिंगन में कसा है। साहित्य इन्हीं समस्याओं को दर्शाने के साथ ही साथ निराकरण के सूत्र भी उपलब्ध करवाता है। यथा- "सहितस्य भावः साहित्यम्" अर्थात जिस साहित्यिक रचना में हित का भाव निहित हो, वही साहित्य है।

प्रेम जनमेजय के व्यंग्य संग्रह में निहित विविध पक्षों को हम निम्नलिखित बिन्दुओं में देख सकते हैं-

आर्थिक विषमता
मम्मट जैसे प्रभुत्व आचार्य ने अर्थ को महत्व दिया है तो वही सामान्य वर्ग के लिए जीविकोपार्जन का साधन है। आर्थिक विसंगतियाँ एक परंपरा के रूप में चली आ रही हैं। अर्थ के आधार पर शोषण होता आ रहा है, जिसे निराला की कविता 'वह तोड़ती पत्थर' से समझा सकता है। अर्थ के आधार पर समाज दो हिस्सों में विभक्त है। इन दोनों हिस्सों को लेखक प्रेम जनमेजय ने बखूबी चित्रित किया है।
"जिस व्यक्ति की मृत्यु हुई थी, वे जे जे कॉलोनी के दो कमरे के मकान में अपने कुल के साथ रहते थे। उस कॉलोनी का श्मशान भी निवासियों की तरह गरीब होता है। न पंखा और न बैठने का उचित स्थान। लाश को निबटाने का मन करता है। पॉश कॉलोनियों का श्मशान भी पॉश होता है। यहाँ बार-बार मरकर आने का मन करता है"।2


आधुनिक मनुष्य में भौतिक सुख ग्रहण करने की तीव्रता बढ़ रही है। निम्न वर्ग तो उठ ही नहीं रहा है और मध्यवर्ग आगे बढ़ने के लिए छटपटा रहा है। एक गहरी खाई निम्न और उच्च वर्ग के बीच बन गयी है। जिसे भरने की आवश्यकता है। निम्न एवं मध्य वर्ग के लोगों को समान अवसर प्रदान किए जाने चाहिए ताकि वे भी उच्च वर्ग में शामिल हो। यही मार्क्स का भी मूल सिद्धांत है- अर्थ का विकेंद्रीयकरण।
“छोटे लड़के को शायद प्यास लग आती थी। वह धीरे-धीरे पानी पीने के लिए उस ओर बढ़ रहा था, जहाँ पानी का टब पड़ा था। वहाँ पहुँचकर उसने हथेलियों से ओक बनाकर पानी माँगा था, परंतु उस अधनंगे विभत्स बच्चे को सामने देखते ही वहाँ खड़े सज्जन ने उसे डाँट दिया था। उस लड़के ने दोबारा पानी माँगा तो वे सज्जन दाँत पीसते हुए उसे मारने को दौड़े।”3


सबसे पहले तो बच्चे को अधनगे विभत्स कहना तात्कालिक व्यवस्था पर चोट है जहाँ अमीर आसमान को छु रहा है और गरीब जमीन में धसता चला जा रहा है। भारत जैसे देश में जहाँ जातिगत भेद-भाव हुआ करते थे अब आर्थिक स्थिति पर भी भेद-भाव हो रहे हैं जिसका उदाहरण जे जे कालोनी है। जहाँ गरीब कालोनी का श्मशान गरीब है और अमीर कालोनी का श्मशान अमीर है। जिस जगह मनुष्य जाने से कतराता है वहाँ भौतिक सुख ग्रहण करने के लिए बार-बार जाने को तैयार है।

लेखक प्रेम जनमेजय उस व्यक्ति का बच्चे के प्रति बर्ताव देखकर व्यंग्य के बाण छोड़ते हैं। वे कहना चाहते हैं कि एक शव के लिए बर्फ की सिल्ली मँगवाई गयी है परंतु मासूम से बच्चे को चिलचिलाती धूप में एक ग्लास पानी तक नहीं दिया जा रहा है। प्रेमचंदयुग में जहाँ लोगों को जीते जी तन ढकने के लिए कपड़े नहीं मिलते थे और मरने के बाद कफन लाया जाता था वही प्रेम जनमेजय ने देखा है कि एक ओर बच्चा पानी के लिए तरस रहा है, दूसरी ओर एक शव को बर्फ पर लेटाया गया है। यह तत्कालीन व्यवस्था पर चोट है, जहाँ वर्ग भेद पर लोगों का शोषण किया जाता है। यदि धार्मिक दृष्टि से देखा जाए तो उस बच्चे को पानी पिला देना चाहिए था। क्योंकि हिंदू धर्म में यह मान्यता है कि मृत्यु के दिन यदि किसी गरीब को भोजन दिया जाये तो उसकी आत्मा को शांति मिलती है। लेकिन यहाँ भी दोहरा रवैया अपनाया जाता है। वह तो केवल नाम का सज्जन है, जिसे न तो धर्म का ज्ञान है और न ही संवेदनशील है।

भ्रष्टाचार
तात्कालिक अवधि में भ्रष्टाचार केन्द्रीय नब्ज है। सर्वत्र उसी का बोलबाला है। जिसे व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय जी ने बखूबी से एक सूत्र में पिरोया है। उन्होंने अपने व्यंग्य संग्रह का नामकरण भी इसी आधार पर किया है- ‘भ्रष्टाचार के सैनिक’।

भ्रष्टाचार एक ऐसा शब्द है जिसके विषय में लगभग सभी ने सुना है। सुना ही नहीं बल्कि देखा और किया भी है। यदि कोई व्यक्ति भ्रष्टाचार नहीं करना चाहता, पर भ्रष्टाचार किए बिना उसका कार्य का होना मुमकिन नहीं, तो मजबूरन वह भी बहती गंगा में हाथ धो लेता है। गिरगिट की तरह बदले वाला व्यक्ति चाहे कह दे की उसने भ्रष्टाचार नहीं किया है लेकिन उसकी अंतरात्मा उसका कच्चा-चिट्टा जानती है। कौनसी मनहूस घड़ी में भ्रष्टाचार पनपा किसी को नहीं पता। जिसने सभी को अपने चपेट में ले रखा है। आधुनिक काल में भ्रष्टाचार ने अपनी जड़े मजबूत कर ली है, जिससे कोई अछूता नहीं बल्कि भ्रष्टाचार करने पर मजबूर हो जाता है।


प्रेम जनमेजय जी ने भ्रष्टाचार के सैनिक नहीं बल्कि कीड़े-मकोड़ों की दुखती नब्ज पर हाथ रखा है। जिससे वे तिलमिला उठते हैं। जिसे हम व्यंग्य में उल्लिखित एक छोटे से प्रसंग द्वारा समझ सकते हैं। लेखक ने तीन राजनीतिक योद्धा का वर्णन किया है। “जो एक-दूसरे से पीठ किए खड़े थे। वे सैनिक नहीं थे पर सैनिक की वेशभूषा में थे। उन तीनों के सर पर टोपियाँ थी पर उनके रंग जुदा-जुदा थे। उन्हें लड़ने का दिखावा करना था इसलिए उनके हाथों में लकड़ी के हथियार थे। उन्हें मार-काट नहीं मचानी थी, उन्हें जुबानी जंग लड़नी थी और हथियार से डरना था”।4

उपर्युक्त गद्यांश के द्वारा लेखक राजनीतिक नेताओं की पोल खोलते हैं कि हाथी के दाँत दिखाने के कुछ और खाने के कुछ और। जिस तरह भगवतीचरण वर्मा के दो बाँके नाम मात्र के लिए लड़ते हैं उसी प्रकार नेता भी। उन योद्धाओं पर कटाक्ष किया है जो जनता के सामने वीर बनते हैं और एक दूसरे के चेहरे पर कालिख पोतते हैं वही रात के अंधेरे में गले भी मिलते हैं। रचनाकार मुक्तिबोध की पंक्तियाँ निम्नलिखित है-

“सूरज के चेहरे को
डामर से पोत दो
बदल के मैले उस
गदहे पर बिठलाकर
निकालो जुलूस तुम
कलमुंहे सूरज का-अम्बर में।”5


अर्थात मुक्तिबोध उन नेताओं पर कटाक्ष करते है जो रात के अंधेरे में एक दूसरे से गले मिलकर जश्न मानते हैं। ऐसे नेताओं का असली चेहरा रात में ही देखने को मिलता है। इसलिए उनकी सच्चाई जनता के समक्ष न आए वे सूरज के चेहरे पर कालिक पोतकर उसका जुलूस निकालना चाहते हैं।

इन प्रसंगों के माध्यम से व्यंग्यकार तात्कालिक स्थितियों के प्रति जनता का ध्यान आकर्षित करते हैं। आज पूरे भारत में भ्रष्टाचार बड़ी तेजी के साथ फैल गया है। केवल राजनीतिक ही नहीं बल्कि सरकारी, गैर-सरकारी, अर्ध-सरकारी, शैक्षिक आदि सभी क्षेत्रों में भ्रष्टाचार अपने किसी न किसी रूप में विद्यमान हैं।

श्रीमद भगवद्गीता के अनुसार-
लिङ्‌गं एवाश्रमख्यातौ अन्योन्यापत्ति कारणम् ।
अवृत्त्या न्यायदौर्बल्यं पाण्डित्ये चापलं वचः ॥


आज सत्य के मार्ग पर चलने वालों की कोई कीमत नहीं हैं। उन्हें तो दर-दर की ठोकरे खानी पड़ती है। हर क्षण उनका अपमान होता है। जबकि घुस देने वाले व्यक्ति को सर आखों पर बैठाया जाता है। उसे ही न्याया प्राप्त होता है। जबकि उसका हकदार कोई और है। कलयुग में छल-कपट, धोखा-धड़ी, स्वार्थी लोगों को ही विद्वान माना जाता है। गीता में वर्णित श्लोक आज भी सच हो रहे है।


निष्कर्षतः कहा जा सकता है की भ्रष्टाचार ने अपने मजबूत भुजाओं में सबको बाँध रखा है जिसमें साँस भी लेना मुश्किल है। उल्लेखित समस्या के सामने अन्य समस्याएँ गौनतम नजर आती है। क्योंकि अन्य समस्याएँ समय के साथ खत्म होती है।
हस्त कार्य का लुप्त होना महात्मा गाँधी ने मशीनीकरण के स्थान पर हस्तचालित युक्ति को महत्त्व दिया। गांधी जी हस्तचालित चरखा का इस्तेमाल करते थे और दुसरों को भी प्रेरित करते थे। जिससे सूत तैयार किया जाता था। भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में यह आर्थिक स्वावलम्बन का प्रतीक बन गया था। इसी प्रकार धोबी, नाई, भिश्ती, मोची आदि समाज के अभिन्न अंग थे। जो धीरे-धीरे डूबने के कगार पर है।   


तकनीकी युग में नाना प्रकार के मशीनों का निर्माण किया गया है, जो एक व्यक्ति की तरह कार्य करता है। अब लोगों को पैसे देकर काम करवाने की जरूरत नहीं है। वे सभी कार्य मशीन कर रहे है जो मनुष्य करते है। परिणाम स्वरूप भिश्ती, महावरीन आदि विषय मात्र बनकर रह गए है।
“जैसे कोई शिकारी शिकार के खोज में निकलता है उसी प्रकार वे चप्पल सिलवान के लिए मोची के खोज में निकल पड़ते हैं। मोची उदास बैठा था। मक्खियाँ नहीं थी फिर भी उन्हें मार रहा था। वे मोची से कहते हैं कि मेरी चप्पल टूट गयी है क्या इसे गाँठ दोगे। प्रत्युत्तर में मोची कहता है- हम बैठे किस लिए हैं?”6

मोची के कथन में आक्रोश है। यहाँ मोची अकेला नहीं है। वह तो समस्त भारतवर्ष का प्रतिनिधित्व कर रहा है। जहाँ धीरे-धीरे हस्तकार्य पतन की ओर अग्रसर है। मोची के माध्यम से बाजार व्यवस्था, अभावग्रस्त जीवन, हस्तकार्य का समापन आदि को दर्शाने का प्रयास किया गया है।

व्यंग्य का शीर्षक पढ़ते ही प्रश्न खड़ा होता है कि मोची क्यो उदास है? अन्ततः पता चल जाता है मोची सहित नाई, धोबी, कुमार, भिश्ती आदि का अस्तित्व खतरे में है।






संदर्भ-
1. हरिशंकार परसाई, सदाचार का ताबीज, पृ.- 10
2. बर्फ का पानी, प्रेम जनमेजय, पृ.- 13
3. बर्फ का पानी, प्रेम जनमेजय, पृ.- 15
4. भ्रष्टाचार के सैनिक, प्रेम जनमेजय, पृ.- 20
5. काव्यलोक, कहते हैं मुझको-मुक्तिबोध, पृ.- 39
6. मोची भय उदास, प्रेम जनमेजय, पृ.- 17


- अकबर शेख

रचनाकार परिचय
अकबर शेख

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