अक्टूबर 2015
अंक - 8 | कुल अंक - 55
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

लघुकथाएँ

सूरज बेटा

पापा मुझे वो चाहिए!
क्या बिटिया?
अरे वो, देखो न ऊपर आसमान में वो सूरज!
“सूरज”!!!!
वही चाहिए मुझे, मैं उसे घर लेकर जाऊँगी। अम्मा रोज माँ को कहती रहती है कि सूरज जैसा एक बेटा हो जाता तो भाग खुल जाते घर के। तीन-तीन बेटियां पैदा कर दीं।
मैं ये सूरज अम्मा को दे दूंगी तो वो माँ को मारेंगी नहीं।

बेटी की बात सुन के पिता अवाक् खड़ा रह गया। बातों-बातों में घर की सारी स्थिति से उसका सामना आज उसी की बेटी ने करा दिया।



बड़ा दिल

टूरिस्ट लोगों को नाव में बैठाकर सैर कराने वाले उस लड़के से साहब ने बहुत मोल भाव किया। बात 10 रूपये पर अटक रही थी, आखिर में वो नाविक कम पैसो में घुमाने को तैयार हो गया।
नाव में घूमते-घूमते ही साहब ने उसे बताया की वो कितनी बड़ी कंपनी के मालिक हैं। तीन गाड़ियों के अलावा ढेर सारी बसें भी किराए पर चलाते हैं। नाविक चुपचाप उनकी बातें सुनता रहा और मुस्कुराता रहा। साहब के पूछने पर उसने बताया कि वो नाव खेने के साथ साथ ही पढाई भी कर रहा है और घर के खर्चें में भी उसका बड़ा योगदान है। पढाई का एक साल रह गया है, उसके बाद वो कहीं नौकरी कर लेगा।
इतने में नाव किनारे लग गयी। साहब ने उतर कर उसे 500 रूपये का नोट दिया और कहा 260 रूपये वापस कर दो। नाविक ने कहा उसके पास छुट्टे नहीं हैं। साहब ने कहा- फिर मेरे पास 220 रूपये ही हैं। नाविक ने कहा- ठीक है साहब! आप 220 रूपये ही दे दीजिये। 20 रूपये मेरी तरफ से अपने बच्चों के लिए रख लीजिये। बहुत प्यारे बच्चे हैं आपके!


- पारुल पंखुरी

रचनाकार परिचय
पारुल पंखुरी

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कथा-कुसुम (1)