अगस्त 2019
अंक - 52 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

यात्रा-वृत्तान्त

पिछली मुलाकात में वादा था मेरा आप सबसे कि अबकी सवारी 'जयपुर' यानि 'गुलाबी नगरी' की तरफ रुख़ करेगी तो चलिये देरी कैसी! हम सफ़र गुड़गांव से शुरू करते हैं अपना बाई रोड़, यहाँ से मानेसर, कोठपुतली होते हुए लगभग साढ़े तीन घंटे में (100-110 किलोमीटर प्रति घंटा) जयपुर टाप लेंगे। दिल्ली से ये 262 किलोमीटर पड़ेगा वहाँ से रेल, वीडियो कोच, हवाई जहाज आदि से कनेक्टिविटी अच्छी है। बल्कि जयपुर भारत के कुछ एक उन शहरों में शुमार है जहाँ पर प्रवेश चारों दिशाओं से संभव है।
राजस्थान की राजधानी जयपुर/गुलाबी नगरी का अर्थ है - "जीत का नगर"...इसे कुशवाह राजपूत राजा सवाई 'जय सिंह, द्वितीय' ने १७२७ में बसाया था। उस समय का यह प्रथम नगर था जो योजनाबद्ध ढ़ंग से बसाया गया था। इसका नक्शा बनाया था वास्तु शिल्पी 'विद्याधर भट्टाचार्य' ने।
'तत्कालीन राजा जय सिंह ने पूरे नगर को गुलाबी रंग से पुतवाया। इसी कारण से तब से आज तलक जयपुर को गुलाबी नगर कहा जाता है।'

वैसे सच कहूँ तो ये मेरी पसंदीदा शॉपिंग डेस्टिनेशन है, बहुत बार इसी सिलसिले में आवक- जावक लगी रहती। यहाँ प्रवेश करते ही मीठी राजस्थानी भाषा,चुनरी,लहरिया,लाख की चूडियाँ, रंग बिरंगी मोज़री,रंगीन साफ़े और छतरियाँ....सब ऐसे मन को ख़ुद में घोल लेते हैं कि मानो...ये प्रेमी और मैं इनकी प्रेमिका हूँ।


एक दफ़ा तो मज़ेदार किस्सा हुआ... फिल्म आई थी "जिन्द़गी ना मिलेगी दोबारा" और सबकी जिद़ कि पहला दिन पहला शो तो ★"राजमंदिर" में ही देखा जायेगा,,बस फिर रात दस बजे हल्की रिमझिम में दौडाई गाड़ी और रुकते - रुकाते अढाई बजे जयपुर।
अगले दिन "राजमंदिर" सिनेमा हॉल...जिसका इंटीरियर आपको मंत्रमुग्ध कर देगा...निगाहें स्क्रीन लॉबी के बाहर ही अटक जायें ऐसा! फोटोग्राफी के शौकीन लोगों की जगह कहूँ तो गलत नहीं...फिल्म देखी और कमाल तो थी ही...बाहर आये तो पता लगा झमाझम बारिश में जमकर भीगा अपना आग उगलता जयपुर! वो भी इतना कि- सड़कों पर उछाल मारता पानी भरा था। थियेटर के बाहर कुछ गरीब बच्चे कठपुतलियाँ बेच रहे थे, हमने भी खरीद लीं और निकल लिये वहाँ से छोटी चौपड़/बड़ी चौपड़ तरफ।
यहाँ अगर आपने सब घूमना है तो समय निकाल कर आइयेगा..हमने तो किश्तों में देखा है जब-जब आते कुछ नया ही।
ख़ास बात यहाँ शहर घुमाने को ख़ास वातानुकूलित कैरावेन डबल डेकर बस भी चलती है जो आपको खिलाते-पिलाते हुये घुमायेगी...हवामहल के पीछे पार्किंग स्टेंड से आप ये मस्त जुगाड़ ले सकते हैं ।


आपणो राजस्थान देशी-विदेशी सैलानियों के लिये खासी लोकप्रिय जगह है, इसकी कलात्मकता,संस्कृति व चितकबरी सुंदरता की अलग ही दीवानगी है।
लोग अमूमन जब भी घूमने की जगहें पता करते हैं तब हवा महल, जन्तर मन्तर, नाहरगढ़, आमेर का किला और जल-महल आदि नामों पर अटकते हैं।
प्रीत आज आपको कुछ नये नामों से भी मिलायेगी।
सबसे पहले जाने-माने नामों की सैर पर चलते हैं ~


जयपुर में राजस्थानी व मुगल शैलियों की जुगलबंदी आपको शहर के मध्य बने पूर्व शाही निवास ★" सिटी पैलेस" में देखने मिल जायेगी यहाँ भूरे संगमरमर के स्तंभों पर टिके नक्काशीदार मेहराब, स्वर्ण व रंगीन पत्थरों की फूलों वाली कारीगरी का अद्भुत समागम है ये।
यहाँ हर जगह जैसे स्थानीय संग्रहालय भी है जो राजस्थानी राजपूती शान की दास्तान खुद कह देता है यहाँ अनेक आकारों वाली तराशी हुई रंगीन मूंठ की तलवारें भी हैं, जिनमें मीनाकारी के जड़ाऊ काम व जवाहरातों टंके है ,साथ ही मुगलों के हथियार, पोशाक आदि का अच्छा संग्रह है। संगमरमर के दो नक्काशीदार हाथी प्रवेश द्वार पर प्रहरी की मानिंद मिलेंगे। महल में एक कला दीर्घा भी है जिसमें खगोलशास्त्र का तामझाम, विविध लघुचित्र, कालीन, शाही उपयोगिता के सामान,अरबी, फारसी, लेटिन व संस्कृत में दुर्लभ खगोल विज्ञान की रचनाओं का उत्कृष्ट संग्रह है। कहते हैं कि राजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने खगोल विज्ञान में अपनी रुचि व अध्ययन हेतु इनको एकत्र किया था।
यही नहीं सिटी पैलेस से तनिक ही दूरी पर स्थित है, जयपुर का "जंतर-मंतर",यह एक पत्थर की वेगशाला है, मान्यता है कि जयसिंह जी की पाँच वेगशालाओं में से सबसे विशाल है।
इसका वैज्ञानिकी विन्यास,आकार, जटिल यंत्र, मध्ययुगीन भारत के खगोल विज्ञान के उच्च सूत्रों का प्रतिनिधित्व करतें हैं,प्रभावशाली रामयंत्र व तारों की गणना में उपयोग आने वाले कई उपकरण महत्वपूर्ण हैं।


"हवा महल" मेरा पसंदीदा इलाका है,यहाँ बड़ी चौपड़,छोटी चौपड़ नाम के पुराने स्थानीय स्थायी बाजार हैं,,, आप यहाँ एक तरफ एक ही से करीने की पंक्तिबद्ध दुकानें देख हैरान होंगे और वहीं दूसरी ओर की दुकानों में रंग बिखरे पडे हैं राजस्थानी.... पैदल चलना ही मज़ा देगा...सर्राफा और चूड़ी बाजार के बीच मान्यता वाला गणेश मंदिर भी है...यहीं।
हवा महल ईसवी सन् १७९९ में निर्मित खूबसूरत नक्काशीदार इमारत है जो कि राजपूतों का मुख्य प्रमाण चिन्ह कहलाती है, पुरानी नगरी की मुख्य गलियों के साथ यह पाँच तलीय भवन गुलाबी रंग में अर्धअष्टभुजाकार और परिष्कृत छत्तेदार बलुए पत्थर के महीन झरोखों से सुसज्जित है।
यह महल शाही घरानों की स्त्रियों के लिये बनवाया गया ताकि वे नगर का दैनिक जीवन व जुलूस आदि देख सकें...इसकी संरचना कुछ ऐसी है कि अंदर से बाहर तो देखा जा सकता है, लेकिन बाहर से अंदर नहीं। यहाँ से नगर का काफी हिस्सा आसानी से देखा जा सकता है। फोटोग्राफी के लिये मस्त जगह है ये ! अपना कैमरा तैयार ही रखें आप। गौरतलब है कि आप अगर यहाँ खड़े हैं तो जयपुर की शान से रूबरू हो रहे हैं।
राजस्थानी खाने पीने,खरीदारी का सस्ता ,सुंदर,टिकाऊ इलाका...हवा महल के चारों ओर मगर यहाँ आपको बार्गेनिंग आना जरूरी है और खरीदी की पहचान भी हो तो सोने पर सुहागा ।

(टिप- यहीं मेरी पसंद के ऑक्सीडाइज्ड चाँदी के सुनार भी हैं जो प्रमाणित पक्का बिल देते हैं, बाकी जयपुर पुराने और नये सभी तरह के स्वर्णाभूषणों का गढ़ है,जड़ाऊ,पोलकी,कुंदन,थेवा,मीनाकारी आदि ,साथ ही लाख और चूडियो,कंगनों की विविध रेंज भी )
इसके अलावा अच्छी और सस्ती टकशॉपिंग के लिये आप "बापू मार्केट" का फेरा भी ले सकते हैं।


स्टैच्यू सर्किल राजस्थान की राजधानी जयपुर का केन्द्र है। इस गोल चक्कर के मध्य सवाई जयसिंह की मूर्ति बहुत ही उत्कृष्ट ढंग से संस्थापक को श्रद्धांजलि देने हेतु बनाया गया है।

"गैटोर" नामक जगह सिसौदिया रानी के बाग में फब्वारों,नहरों, व चित्रित मंडपों के साथ पंक्तिबद्ध बहुस्तरीय बगीचे हैं व बैठकों के कमरे हैं। अन्य बगीचों में, विद्याधर का बाग बहुत ही अच्छे ढ़ग से संरक्षित बाग है, इसमें घने वृक्ष, बहता पानी व खुले मंडप हैं। इसे शहर के नियोजक विद्याधर ने निर्मित किया था।

विद्याधर नगर जंगल : यह विद्यानगर स्टेडियम के पीछे स्थित है, विद्याधर का बाग बहुत ही अच्छे ढ़ंग से संरक्षित है, इसमें घने वृक्ष, बहता पानी व खुले मंडप हैं। इसे शहर के नियोजक विद्याधर ने निर्मित किया था ,यह जगह भी उन लोगों को काफी पसंद आयेगी जिन्हें फोटोग्राफी का शौक है।

गलता मंदिर......गुलाबी नगर में स्थित गलता मंदिर की खास बात यह है कि इस मंदिर में एक बहुत बड़ा कुण्ड है जहाँ पर स्नान करने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु आते है। कहा जाता है कि इस कुण्ड में वर्षों से गो माता के मुखर बाँध से पानी आ रहा है जिसमे नहाने से लोग पवित्र हो जाते है।

जल-महल...... जलमहल भारत के राजस्थान राज्य की राजधानी जयपुर के मान सागर सरोवर के बीच में बना हुआ है। 18 वीं शताब्दी में आमेर के महाराजा जय सिंह द्वितीय ने यहाँ पैलेस और जलमहल का निर्माण किया था। “जलमहल को आँखों को भाने वाले मनमोहक रूप में बनाया गया है।”
यहाँ नौका विहार का आनंद ले कर जलमहल तक जा सकते हैं और सडक की दूसरी तरफ आप हाथी और ऊँट की शाही सवारी भी कर सकते हैं। पानी साफ रखने के लिये वाटर पंप भी लगे हैं।


इसके अतिरिक्त....आप जयगढ दुर्ग ,नाहरगढ़ दुर्ग,आमेर दुर्ग की गरिमा,संरचना,इतिहास और उस काल की राजाशाही व्यवस्था को समझ सकते हैं.... देख सकते हैं.... ये जयपुर से जरा सा आउटकट्स में अरावली पर्वत श्रंखला का हिस्सा हैं....।
"नाहरगढ़" किले के इतिहास में भूतिया कहानियों का समावेश भी पायेंगे। यह जयपुर को घेरे हुये है । यहाँ से सूर्यास्त बहुत ही सुन्दर दिखता है।
"जयगढ़ "स्वयं में जीत का किला कहा जाता है,जो आमेर की सरहदों में महफ़ूज़ है।
"आमेर" के किले को आंबेर का किला भी बोला जाता है,राजस्थान के आमेर क्षेत्र में एक ऊँची पहाड़ी पर स्थित एक पर्वतीय दुर्ग है। यह जयपुर का प्रधान,विशाल पर्यटक आकर्षण है। लाल बलुआ पत्थर एवं संगमरमर से निर्मित यह आकर्षक एवं भव्य दुर्ग पहाड़ी के चार स्तरों पर बना हुआ है, जिसमें से प्रत्येक में विशाल प्रांगण हैं। इसमें 'दीवान-ए-आम' अर्थात जन साधारण का प्रांगण, दीवान-ए-खास अर्थात विशिष्ट प्रांगण, शीश महल या जय मन्दिर एवं सुख- निवास आदि भाग हैं। सुख निवास भाग में जल धाराओं से कृत्रिम रूप से बना शीतल वातावरण यहाँ की भीषण ग्रीष्म-ऋतु में अत्यानन्ददायक होता था।
विदित है कि कम्बोडिया में वर्ष २०१३ में आयोजित हुए विश्व धरोहर समिति के ३७वें सत्र में राजस्थान के पाँच अन्य दुर्गों सहित आमेर दुर्ग को भी युनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया है।


शिला देवी मंदिर ...आमेर महल में स्थित इस मंदिर के विषय में स्थानीय लोगों से मिली जानकारी अनुसार शिला देवी जयपुर के कछवाहा राजपूत राजाओं की कुल देवी रही हैं। इस मंदिर में लक्खी मेला लगता है जो काफ़ी प्रसिद्ध है। इस मेले में नवरात्र में यहां भक्तों की भारी भीड़ माता के दर्शनों के लिए आती है। शिला देवी की मूर्ति के पास में भगवान गणेश और मीणाओं की कुलदेवी हिंगला की मूर्तियाँ भी स्थापित हैं। नवरात्रों में यहाँ दो मेले लगते हैं एवं देवी को प्रसन्न करने के लिए पशु बलि दी जाती है,,,यह मंदिर जलेब चौक से दूसरे उच्च स्तर पर मौजूद है अतः यहाँ से कुछ सीढ़ियाँ चढ़ कर मंदिर तक पहुंचना होता है। ये शिला देवी मूलतः अम्बा माता का ही रूप हैं एवं कहा जाता है कि आमेर या आंबेर का नाम इन्हीं अम्बा माता के नाम पर ही अम्बेर पड़ा था जो कालान्तर में आम्बेर या आमेर हो गया। माता की प्रतिमा एक शिला पर उत्कीर्ण होने के कारण इसे शिला देवी कहा जाता है।

सांगानेर: यह टोंक मार्ग पर स्थित है। इसके ध्वस्त महलों के अतिरिक्त, सांगानेर के उत्कृष्ट नक्काशीदार जैन मंदिर है। दो त्रिपोलिया (तीन मुख्य द्वार) के अवशेषों द्वारा नगर में प्रवेश किया जाता है। शिल्प उद्योग के लिए शहर महत्वपूर्ण केन्द्र है और ठप्पे व जालीदार छपाई की इकाइयों द्वारा हाथ से बने बढिया कपड़े यहाँ बनते हैं। जिसे ब्लॉक प्रिंटिंग कहा जाता है ।

चंदलाई झील यह खूबसूरत सी चंदलाई झील जयपुर से दो किमी दूर जयपुर-कोटा हाइवे पर स्थित है। यहाँ आपको आकर आपर शांति का एहसास होगा, आप इस झील तक चंदलाई टोल प्लाजा क्रॉस कर पहुंच सकते हैं।

कानौता डैम जयपुर से करीबन १५ किमी दूर आगरा जयपुर नेशनल हाइवे ११ पर स्थित है। यहाँ शाम के हमेशा ही यंगस्टर्स का जमावड़ा लगा रहता है।


नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क जयपुर से करीबन १२ किमी दूर जयपुर दिल्ली हाइवे पर स्थित है। यह बायोलॉजिकल पार्क ७२ वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ बेहद खूबसूरत जंगली जीवों वाला इलाका है ।

सांभर झील जयपुर से ६५ किमी दूर नेशनल हाइवे8 के पास पर स्थित है, यह झील खारे पानी की झील है जोकि समुद्र तल से १२०० फुट की ऊँचाई पर स्थित है। जब यह भरी रहती है तब इसका क्षेत्रफल ९० वर्ग मील रहता है। इसमें तीन नदियाँ आकर गिरती हैं। इस झील से बड़े पैमाने पर नमक का उत्पादन किया जाता है।

आमेर झील आमेर के राजा सवाई जयसिंह ने आमेर और जयगढ़ महल के बीच में एक मानवनिर्मित कृत्रिम झील का निर्माण करवाया था। यह झील अरावली की पहाड़ियों से घिरी हुई है. इस वजह से इसे ना तो शहर की तरफ़ से और ना ही किले से देखा जा सकता है।

इसके अतिरिक्त यदि आप जंगली जानवरों और प्रकृति प्रेमी हैं तो....★सरिस्का वाइल्डलाइफ सेंचुरी और ★रणथम्भौर टाइगर रिजर्व भी देख सकते हैं।
चटोरों को बता दूँ कि सरिस्का के अंदर महाभारत कालीन हनुमान मंदिर है पहाडी पर....और वहाँ हर मंगलवार को कढ़ी -कचौड़ी मिलती है बहुत स्वादिष्ट।



स्पेशल टिप :-

नोट:- खाने पीने के शौकीन चटोरे और तंदूरी चाय पीना चाहते हैं तो जयपुर के राम निवास बाग के 'मसाला चौक' लपक कर पहुँचें 😀

जयपुर रुकना है तो "घूमर" पर भरोसा न करें।
जेब आराम और खुशी देती हो तो "वैशाली नगर स्थित ★सरोवर पोर्टिको" होटल (3500 ब्रेकफास्ट बुफे) बेहतर होगा।
और यदि...आननफानन में गये हैं तो सबसे सुंदर,सस्ती जुगाड़ जहाँ सफाई,खाना और सर्विस सब बेस्ट है और वजट में भी तो " वानी पार्क में ★'मुस्कान पैलेस'(1100-1300 )
पलक पैराडाइज,तारा नगर-डी भी सोर्ट स्टे को ठीक रहेगा।
रात को सुरापान का शौक रखने वाले आठ बजे के पहले खुद इंतजाम कर लें वरना बार में अवै तवै खर्चे करने होंगे।

 


- प्रीति राघव प्रीत