अगस्त 2019
अंक - 52 | कुल अंक - 54
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

जयतु संस्कृतम्
राष्ट्राष्टकम्
             
येऽनर्गलं सततमत्र वदन्ति वाक्यं
ये जातिधर्मविषदा विलिखन्त्यहृद्यम्।
ते नैव सन्तु सुहृदो मम मित्रयोग्या:
काव्यप्रियास्तु विलसन्तु  सुमित्रसूच्याम्। 1
                            
ये संस्कृतिं  स्ववसुधां  बहु कामयन्ते
ये संस्कृतं च वचसा नितरां श्रयन्ते।
ते देशभक्तमनुजा: मम मित्रयोग्या
नान्ये कदापि निजराष्ट्रविरोधभावा:।। 2
 
राष्ट्रैकसूत्ररचने रचयन्ति नित्यं
वाक्यावलिं सुमतयो गतवैरभावा:।
ते शुद्धभावहृदया मम मित्रयोग्या
नैते समाजहतका मलिनस्वभावा:।। 3
 
ये मन्दिरं गुरुगृहं ननु चर्चमेते
वा मस्जिदं प्रविशतो निजभारतीयान्।
स्निग्धं नमन्ति सदया: किल देशभक्तान्
तिष्ठन्तु ते मम सुमित्रमहानुभावा:।। 4
 
ये सारयन्ति न कदापि तु वैरभावं
साधुस्वभावमनुजा: प्रतिकारशून्या:।
ते मित्रमण्डलचणा मम भारतीया:
चेतो हरन्तु नितरां चतुरा न चान्ये।। 5
 
घण्टानिनाद इह शङ्खरव: स्वदेशे
गुञ्जेत् सदैव बहवो निजधर्मघोषम्।
वा घोषयन्तु मुदिता अभयं सुराष्ट्रे
नो शत्रव: प्रविलसन्तु सुमित्रसूच्याम्।। 6
 
कश्मीरभूस्तु विदुषां नगरी युगेभ्यो
नातङ्कवादिविपिनं किल मन्वते ये।
ते मित्रमण्डलमणीन्द्रमहाशया मे
विद्योतयन्तु निखिला: महतीं सुमैत्रीम्।। 7
 
राष्ट्रं मदर्थमतुलं प्रथमं सदैव
स्थानं वदामि शपथेन हृदारविन्द:।
आजीवनं सुखदभारतदेशधूलिं
वन्दे स्वतन्त्रशुभपर्वणि साभिमानम्।। 8

- डॉ. अरविन्द तिवारी