अगस्त 2019
अंक - 52 | कुल अंक - 55
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

संस्मरण
अप्पा का प्रतिरूप
 
बचपन अप्पा के साथ कैसे बीत रहा था? मुझे समय की गति कहाँ पता चल रही थी? मेरा बस चलता तो मैं समय को पकड़ लेती। मेरा तो मानना है कि खुशनुमा पल कभी गुजरता नहीं है। वो तो बस उस समय के साथ ही ठहर जाता है। जैसे मेरी जिंदगी आज तक अप्पा के साथ ठहरी हुई है और इस युवावस्था में भी अपने बचपन और बालपन की चंचलता  को नहीं खोया। तभी तो मुझसे मिलने वाला हर शख्स दो वाक्य जरूर दोहराता है। पहला_"अब तू बड़ी हो गई है। बच्चों की तरह हरकत छोड़ दें।"और दूसरा "तू अभी तक बच्चों जैसी बातें करती है। तुझमें दिमाग नहीं है।"अर्थात् मैं एक छोटी सी अप्पा की वहीं बच्ची हूं जो उन्नीस साल पहले थीं। जब जब अप्पा का स्मरण करती हूँ तो मैं वहीं मूर्ख बच्ची बन जाती हूँ। मूर्ख बच्ची का अर्थ है कि अप्पा की प्रिय बच्ची। इसलिए मैंने कभी खुद को बड़ी होने ही नहीं दिया। बचपन में अप्पा मुझे तमिल भाषा का एक शब्द मोटची कहकर संबोधित करते थे। "मोटची" अर्थात् टकली बच्ची। क्योंकि बचपन में मेरे बाल बहुत छोटे-छोटे थे और हमारे परिवार में सबके बाल घने और लम्बे थे। यहाँ तक कि मेरी सबसे छोटी बहन रूकमणि उर्फ़ दलों के बाल भी बहुत घने और लम्बे थे और मुझे लम्बे बाल रखने में कोई रूचि नहीं थी इसलिए मैं कटवा लिया करती थी। तो अप्पा को मुझे मोटची कहने का मौका मिल जाता। कभी-कभी मैं अपने अप्पा से कहती थी कि अप्पा मैं कहाँ मोटी हूं। मुझे क्यों मोटची कहते हो? तब अप्पा बोलते कि तमिल भाषा में मोटची मतलब टकली होता है और खीं-खीं करके हँसने लगते। अप्पा कहते कि तु मेरी मोटची हैं या नहीं? तो मैं भी उनकी हाँ में हाँ मिलाती और सहजता से स्वीकारा करती थी कि मैं अप्पा की मोटची हूँ।
 
मैं एक रोज अप्पा की गोद में सुकून से बैठी थी। अप्पा में जितना बचपना था। उनकी कभी-कभी बातें गंभीर भी होती थी। जो जीवन के मर्म को उजागर किया करती थीं। पता नहीं क्यों मुझे वो जिंदगी के सही मायने सिखा रहे थे। लगभग आठ साल की बच्ची के दिमाग में जिंदगी के मायने क्या होते हैं? मैं तो नहीं जानती थी। अप्पा की गंभीरता भरी बातें मेरे समझ से परे थे। मुझे जीवन की वास्तविकता से कुछ लेना-देना नहीं था। मुझे तो अप्पा की मनोरंजक बातें ही रूचिकर लगती थी। ताकि हम सब मिलकर उल्टे-सीधे काम करें और अप्पा को पैदमा से डांट पड़े और हम सब पैदमा और अप्पा की लड़ाई को देखकर खूब हँस-हँसकर लोट पोट हो सके। क्योंकि पैदमा और अप्पा की लड़ाई तो हमारा मनोरंजन थी। हमारे लिए पैदमा और अप्पा कॉमेडी मूवी के एक्टर थे।
 
उस रोज अप्पा मुझसे बोले:- "तू बड़ी होकर एक अच्छा इंसान बनना।"
जब मेरे कानों में "अच्छा इंसान" शब्द सुनाई दिया। मेरे मन में तुरन्त क्रोध पनपा। क्योंकि एक अच्छा इंसान बनना कितना मुश्किल होता है? यह मैं कुछ हद तक समझने लगी थी । अच्छा इंसान होने का परिचय भी अप्पा के कठिन जीवन से ही मिला था। मैंने अप्पा के जीवन में यह देखा था कि वो एक अच्छे इंसान थे। और वो कितना ही अच्छा बन जाए। उनके घरवाले उनका सम्मान नहीं करते थे।वो किसी की मदद करे तो भी उनको इसके लिए जलीकटी सुननी पड़ती थी। अप्पा  के घर वाले किसी न किसी बात को लेकर अप्पा की नुक्ताचीनी करते ही रहते थे। लेकिन मेरे अप्पा में एक गुण था- सहनशीलता और विनम्रता।
(इसका मतलब यह नहीं है कि उनके घरवाले अप्पा से प्यार नहीं करते थे। बस वो चाहते थे कि मेरे अप्पा अपने भोलेपन को त्याग कर दुनियादारी सीखें। और लोगों द्वारा बेवकूफ  बनने से बचें।)
मैंने उनको तमतमाते हुए जवाब दिया:-"मैं अच्छा इंसान नहीं बनूंगी।"
 
मेरे जितने तीखे शब्द थे ‌। उनका प्रतिउत्तर उतना ही विनम्रतापूर्ण मिला। वो मुझसे बोले, "क्यों  अच्छा इंसान नहीं बनना चाहती?"
मैंने उनसे कहा, "आप इतने अच्छे इंसान हो। फिर भी सब आपके साथ बूरा व्यवहार करते हैं। आप सबके सामने मौन रहते हो। तो सब आपको जलीकटी सुनाते हैं और आप चुप रहते हैं तो आपको सब डरपोक समझते हैं। आप कितना ही अच्छा काम करो। कोई आपकी प्रशंसा नहीं करता। उल्टा आपको  भला-बुरा बोलते हैं। कोई आपका सम्मान नहीं करता हैं। क्या अच्छे इंसान की यही जिंदगी होती है?"
अप्पा मेरी बातों से तनावग्रस्त होकर बोले, "चाहें दुनिया में लोग कितने ही बुरे क्यों नहीं हो जाए? हमको तो अच्छा ही बनना चाहिए।"
मुझे और क्रोध आने लगा और मैंने अप्पा से कहा, "मैं कभी अच्छा इंसान नहीं बनूंगी। मैं दुनिया की सबसे बूरी इंसान बनना चाहती हूँ। मैं आपकी तरह विनम्र नहीं बनना चाहती। मुझे कोई कुछ कहेगा तो मैं चुप नहीं रहूंगी। सबको जवाब दूंगी।"
 
अप्पा मेरी बातों को सुनकर बहुत ज्यादा तनाव में आने लगे। जैसे वो मुझे अपना प्रतिरूप बनना चाहते थे। लेकिन असफल हो रहे थे।
वो मुझसे विनम्रता से पेश आते हुए बोले, "ऐसा क्यों बेटा? तू इस दुनिया में अच्छा इंसान क्यों नहीं बनना चाहतीं?"
मैंने उनसे स्पष्ट कहा, "मैं अच्छी इंसान नहीं बनूंगी। मैं दुनिया की सबसे बुरी इंसान बनना चाहती हूँ और आप मुझे अच्छा इंसान बनना चाहते हैं तो मेरा साथ छोड़ दीजिए। क्योंकि मैं अच्छा इंसान नहीं बनने वाली हूँ।"
अप्पा फिर विनम्रता से बोले, "मैंने साथ छोड़ने को कब कहा?"
मैंने कहा, ठीक है। अगर फिर कभी अच्छा इंसान बनने को कहा तो मैं आपसे बात नहीं करूंगी। मैं अच्छा इंसान नहीं बनना चाहतीं।"
मैंने तो बस एक ही रट लगा ली।
 
अप्पा बोले, "बेटा, मैंने तुम्हें कुछ ग़लत काम करने को बोला क्या?"
अप्पा मेरे जीवन को सही नींव देने का भरसक प्रयास करने लगे। मैं समझ गई कि मुझे अप्पा की हर अनोखी बातों की तरह यह बात भी मनवाना चाहते हैं। मैं अप्पा की गोद से तुरंत उतर गई और पैदमा के पास भागी और उनसे जाकर बोलने लगी, "तुमको पता है पैदमा, अप्पा मुझे खुद के जैसा बनने को कह रहे हैं। खुद के जैसा मतलब अच्छा इंसान।"
पैदमा ने कहा, "इनके जैसा इंसान तु कभी मत बनना। इस दुनिया में यह एक ही काफी है। अगर इस दुनिया में तेरे अप्पा जैसे बहुत सारे इंसान हो जाए न,तो यह दुनिया चौपट हो जाएगी। तेरे अप्पा बहुत बेवकूफ है। तुम समझदार इंसान बनो। इनकी तरह बेवकूफ नहीं।"
 
जब पैदमा और मेरा संवाद अप्पा के सामने हो रहा था तो अप्पा मौन मुद्रा में सहज भाव से सुन रहे थे। आज सोचती हूँ  कि उनको कितना बुरा लगा होगा। जब एक अच्छे इंसान को लोग बेवकूफ होने की संज्ञा दे तो? कई बार तो मैं अप्पा के लिए सबसे झगड़ती थी। तब मैं अप्पा के पक्ष में होकर पैदमा के विरूद्ध हो जाया करती थी और उनसे बोलती कि क्यों मेरे अप्पा को ऐसी ऐसी बातें सुनाते हो? मेरे अप्पा तो बहुत अच्छे इंसान हैं।
तब पैदमा भी मेरे अबोधपन पर मुस्कुराती हुई कहती कि इतने अच्छे हैं तो ले जाओ अप्पा को अपने घर पर। मैं तो इस आदमी से बहुत दुखी हूँ।
और मैं भी उनको बहुत गुस्से से कहती थी कि ले जाऊंगी अप्पा को हमेशा के लिए अपने घर पर। लेकिन मेरे अप्पा को बेवजह सुनाने की जरूरत नहीं है।
लेकिन आज मैं पैदमा के पक्ष में और अप्पा के विरूद्ध थी। क्योंकि इस दुनिया के लिए मुझे पैदमा की ही बातें उचित लगी। अप्पा तो मुझे महात्मा गांधी जी की तरह बनाना चाहते थे। और मैं भला क्यों महान इंसान बनूं?
 
अक्सर मैंने सुना है कि जो जैसा इंसान होता है वो वैसी ही शिक्षा देता है। अप्पा खुद अच्छे इंसान थे। इसलिए अप्पा मुझे अच्छा इंसान बनने की शिक्षा दे रहे थे। हमारे भारतीय शास्त्रों में कहा गया है कि अगर हम संतों की संगत में रहते हैं तो कुटिल से कुटिल व्यक्ति भी अपनी कुटिलता त्याग देता है और विनम्र बन जाता है। अर्थात् एक विनम्र व्यक्ति की संगत से दुर्गण का अपने आप पतन हो जाता है। मैंने अच्छा इंसान बनने को नकार दिया था‌। लेकिन पता नहीं कैसे? मुझमें अप्पा का प्रतिरूप हावी होने लगा। मुझमें विनम्रता, सादगी-सरलता, निष्कपटता इत्यादि जैसे बहुत सारे गुण मेरे व्यवहार में खुद-ब-खुद ढलने लगे।
 
जब भी  कोई मेरी अच्छाई की प्रशंसा करता तो मैं झेंप जाती और मुझे शर्मिंदगी महसूस होने लगती थी। क्योंकि मुझे अप्पा जैसे नहीं बनना था। मैं खुद को इस योग्य नहीं समझती थी। यदि हम जीवन में सरलता को अपनाते हैं तों इसका मतलब है कि हम दुनियादारी से दूर सबसे मूर्ख इंसान कहलाते हैं। इस वजह से मेरी विद्यालय की सखियां मुझे मूर्ख समझने लगती थीं और मुझे बहुत बुरा लगता था। मुझे यह लगता था कि अप्पा की संगत का ही यह परिणाम है। मुझे अप्पा का संग छोड़ देना चाहिए। लेकिन भविष्य और आज,वर्तमान में इतना काम आएगा। मुझे इतना पता नहीं था। तभी तो एक रोज अप्पा से बोली, "सही कहती हैं मेरी पैदमा, तुम्हारे साथ रह-रहकर हम सभी बेवकूफ हो गए हैं। तुमने मुझे बचपन से लेकर आज तक इतना बेवकूफ बनाया है कि मैं बेवकूफ ही बनकर रह गई हूँ। अब मैं तुम्हारे साथ नहीं रहूंगी।"
लेकिन अप्पा ने मुझे इसपर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। जैसे वो पैदमा की बातें सहज भाव से सुन लिया करते थे। वैसे ही उन्होंने मेरे बातें भी सहजता से सुनी।
(वैसे  विनम्रता, सादगी-सरलता, निष्कपटता यह स्वभाव ईश्वरीय कृपा है। यदि आपके पास अच्छा स्वभाव है तो ईश्वर को आभार व्यक्त कीजिए। क्योंकि उन्होंने दुनिया का सबसे दुर्लभ और प्यारा उपहार आपको भेंट दिया।आप बहुत सौभाग्यशाली हैं। मेरा अच्छा स्वभाव ईश्वरीय कृपा है? या अप्पा की रहमत का असर? मुझे इतना सौभाग्यशाली किसने बनाया है? इसलिए अनभिज्ञ होने के कारण दोनों को आभार व्यक्त करती हूं। अक्सर मेरे स्वभाव की प्रशंसा में मुझे ईश्वर से कहीं ज्यादा अप्पा ही स्मरण आते हैं। क्योंकि यदि कोई मुझसे यह कहे कि आपके माता-पिता ने आपको अच्छे संस्कार दिए हैं तो मैं इसको स्वीकार करने के बजाय यह स्वीकारती हूँ कि माता-पिता ने नहीं मुझे मेरे अप्पा ने अच्छे संस्कार दिए हैं।) 
 
लेकिन मैंने अप्पा की तरह मौन रहते हुए अपनी बातों को विराम नहीं दिया और पैदमा के पास गई और बोली,"पैदमा,तुम सही कहती हो कि हम लोगों को अप्पा से दूर रहना चाहिए। अप्पा के वजह से मैं भी मूर्ख बनती जा रही हूँ।"
पैदमा बोली, "मैं तो हमेशा से ही सही कहती थी कि इनकी तुम कोई भी बात मत माना करो। तुम भी इनकी तरह बेवकूफ बन जाओगे।"  
हमारे इस संवाद को अप्पा मौन पूर्वक सुन रहे थे। मैं अप्पा को देख रही थी जैसे वो बेपरवाह थे। कोई प्रतिक्रिया नहीं। हमारे संवाद से उनको शायद ठेस तो पहुँची होगी। लेकिन मैंने निश्चय किया कि मैं अप्पा का साथ छोड़ दूंगी। चूंकि मुझे उनकी तरह बेवकूफ और अच्छा इंसान नहीं बनना।
 
वास्तविकता में अप्पा का साथ कभी भी नहीं छोड़ पाई। मैं इतने प्यारे इंसान का साथ कैसे छोड़ सकतीं थीं? उनकी अच्छाई हमेशा मुझे आकर्षित करती रही थीं। और मैं उनकी अच्छाई और विनम्रता की ओर खिंचती चली गई। धीरे धीरे मैं अप्पा का प्रतिरूप बन गई। बिल्कुल उनकी तरह एक मूर्ख इंसान। मुझे मूर्ख कह लो या एक अच्छा इंसान बनाने में अप्पा सफल हो गए और मैं उनकी अच्छाई के सामने हार गई। मैंने कहने भर के लिए बूरा बनने का निश्चय जरूर किया था। जब मैं उनकी विनम्रता देखती तो उनकी विनम्रता मेरे हृदय में प्रवेश कर जाती और मेरा क्रोध हृदय से किसी प्रवाह की तरह बाहर निकल जाता था। जब मैं उनकी मौन रहने क्षमता या सहनशीलता को देखती तो वहीं सहनशीलता मुझमें भर जाती। जब मैं उनकी परोपकार की भावना को देखती। फिर तो हृदय कह उठता कि मुझे बड़ी होकर अप्पा जैसा ही बनना है। जब मैंने देखा कि ईश्वर ने इस दुनिया में अप्पा जैसी सुन्दर कृति बनाई है। मैं सदा ऐसी ही सुन्दर कृति को अपने जीवन में अपनाना चाहती थीं। मैं उस समय कोई साहित्यकार नहीं थी।शायद मुझमें सहजात गुण रहा होगा। तभी मैं इन सुकोमल विचारों में संलग्न थी और संवेदनशीलता से परिपक्व थी। 
 
मैं यह सोचती थी कि अप्पा भी एक इंसान ही हैं। अगर यह इंसान होकर भी इतने विनम्र और सहनशील है और कभी भी अपनी अच्छाई को नहीं त्यागते है। हमेशा अच्छाईयों के बदले में बुरा परिणाम मिलने पर भी अच्छे बने रहना ही चाहते हैं। तो क्या मुझे इनका साथ नहीं देना चाहिए?
इस प्रकार अप्पा का प्रतिरूप मुझमें हावी होने लगा।
और जैसे जैसे समय बीता। "मैं अप्पा का कि तु अच्छी इंसान बनना"~इस वाक्य की अहमियत समझने लगी। शायद अप्पा अपने जीवन में बहुत बुरे लोगों से मिले होंगे। इसलिए वो मुझे एक अच्छा इंसान बनना चाहते थे। ताकि मैं अपने जीवन में किसी भी इंसान का बुरा न कर सकूं। मैं काफी हद तक उनके जीवन से परिचित थी। उनकी अच्छाई और उनके भोलेपन का कई लोगों ने फायदा उठाया था। तभी तो पैदमा उनको बेवकूफ इन्सान कहकर संबोधित किया करती थी। अप्पा चाहते थे कि मैं एक अच्छी इंसान बनूं और मुझे अच्छा इंसान बनाकर उनका जीवन भी सफल हो जाए।
 
यह कहावत है कि अच्छा इंसान खोजना बंद करो। खुद अच्छे बन जाओ। ताकि अच्छे इंसान की खोज करने वालो  की खोज आपसे मिलकर पूरी हो जाए। और मेरी खोज भी पूरी हो गई थी मेरे अप्पा से मिलकर। अक्सर मैं कई लोगों से यह सुनती हूं कि आजकल अच्छे इंसान कहां? आज भी अच्छे इंसान होते हैं। जैसे मेरे अप्पा और मैं भी एक अच्छी इंसान हूँ। और आप भी एक अच्छे इंसान बन जाए तो? आप भी अच्छे इंसान को दुनिया में पाओगे। मैं शुक्रगुजार हूँ परमपिता परमेश्वर की, कि उन्होंने मुझे अप्पा के सिवा भी कई अच्छे लोगों से मिलवाया और मेरा विश्वास अच्छे लोगों में दृढ़ किया। कहते हैं कि बूंद बूंद से घड़ा भरता है। मैंने बचपन से लेकर युवावस्था तक अप्पा के जीवन से अच्छाईयां ही ग्रहण की। मैंने भी अप्पा के जीवन को देखकर निश्चय कर लिया कि मैं अच्छी इंसान बनकर ही रहूंगी हू-ब-हू अप्पा की तरह अच्छी।
 
अगर मैं भी बूरी इंसान बन जाती हूँ तो ईश्वर का मुझे अप्पा के साथ रहने का सुनहरा अवसर देने का क्या लाभ होगा? अच्छे इंसानों से ही दुनिया खूबसूरत बनती हैं और मैं इस दुनिया को खुबसूरत बनाना चाहती हूँ। मैंने अपनी बुरी आदतों को सुधारा, अप्पा के लिए और मेरे भगवान श्री कृष्ण के लिए।जिनकी प्रेरणा से मैं अच्छी इंसान बनने में सफल हुई हूँ।
वर्तमान में जब मुझसे मिलने वाले लोग मेरे स्वभाव की प्रशंसा करते है तो मुझे अप्पा याद आते हैं। मैं आभार मानती हूं कि उन्होंने मेरे जीवन को सही नींव प्रदान की। जो मुझे सभी से प्रेम और सम्मान मिला है। भगवान श्री कृष्ण और अप्पा का बहुत बहुत आभार व्यक्त करती हूँ कि उन्होंने मुझे इतनी सुन्दर जिंदगी भेंट स्वरूप दी

- तुलसी पिल्लई

रचनाकार परिचय
तुलसी पिल्लई

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