प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अगस्त 2019
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम
यह मेरा नहीं! 
 
 
समय कैसा -कैसा बदलता है।
बिट्टू को लेने जब उपाध्याय जी कालोनी से बाहर पहुँचे, तब तेज़ लू चल रही थी।
वह लपक कर सड़क किनारे बने नए शैड के नीचे पहुँचे और कुर्सी पर  जा बैठे । शरीर अब शिथिल होता जा रहा है। पहले वाली चुस्ती नहीं रही। बहू घर के कामों में व्यस्त रहती है। बिट्टू को लेने वह चले आते हैं। 
 
पोते का मोह भी क्या अजब होता है। जब वह स्कूल चला जाता है, तो उपाध्याय जी का मन सब कुछ करते भी , उखड़ा रहता है। नाश्ता करके,अख़बार पढ़ते रहते हैं। फिर गीता का कोई अध्याय खोल कर बैठ जाते हैं। अद्भुत ग्रंथ है। एक -एक श्लोक का चिंतन - मनन करने लगो तो हर बार नए ही अर्थ खुलते चले जाते हैं । उपाध्याय जी के कई लेख गीता पर देश की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं।
अध्ययन के बाद, थोड़ी मानसिक थकान अनुभव करने पर वह नींद का हल्का ठोंका मार तरोताज़ा हो जाते हैं। बिट्टू की बातें , उसके भोले सवाल , उसकी शरारतें , उन्हें हर दम फ़िट रखती हैं। 
2 बजते ही वह जूते पहन तैयार हो जाते हैं। बहू मना करती रहती है कि वह न जाएँ, बाहर बड़ी गर्मी है। वह स्वयं बिट्टू को लिवा लाएगी, लेकिन उनका मन नहीं मानता। वह उसे लेने चल पड़ते हैं।
 
बस, लिफ़्ट से नीचे उतर लगभग 1 किलोमीटर  चलना पड़ता है, कॉलोनी के बाहर वाले गेट तक। यहाँ गेट किनारे बने प्रतीक्षा  शैड में बैठ बिट्टू की पीली ए.सी बस का इन्तज़ार करना पड़ता है। 
बिट्टू बस की खिड़की से ही उन्हें देख हर बार की तरह पुलक रहा है। बस के स्टैंड पर थमते ही, कंडक्टर बिंट्टू को उठा कर उनकी गोद में दे देता है। दादू, उसका बस्ता अपने कंधे पर लटका कर चल पड़ते हैं। थोड़ी ही देर बाद बिट्टू गोद से उतर, दादू की उँगली पकड़ ठुनकते, नाचते , उपाध्याय जी के साथ -साथ चल पड़ते हैं। अपने स्कूल की सूचनाएँ देने का उनका सिलसिला चल पड़ता है।
 
उपाध्याय जी जब बिट्टू के बस्ते को हाथ से पीछे से आगे की ओर कर सीधा करते हैं, तो उनके हाथ में पानी वाली बोतल नहीं आती। घूम कर देखते हैं तो वह नदारद है।
“बिट्टू! बोतल कहाँ हैं बेटा?” 
“खो गई दादू।” बिट्टू अपने नन्हें गोल -गोल हाथ घुमा कर बतलाता है।
बोतल खोने का यह सिलसिला कई बार हो चुका है। 500रु की कम से कम आती है यह बोतल। कई बार तो यह क्लास में भूल आते हैं, जो अगले दिन उनकी टीचर उन्हें सौंप देती है और कई बार अपनी बस में छोड़ आते हैं जो कंडक्टर अगले दिन उन्हें सौंप देता। फिर भी 5-6 बोतलें बिट्टू जी खो ही चुके हैं।
 
बिट्टू को उसकी मम्मी को सौंप, उपाध्याय जी अपने कमरे में आकर ए . सी ऑन कर बैठ जाते हैं। पसीने से उनकी क़मीज़ भीग गई है। उन्हें फिर से बिट्टू की पानी की बोतल खो जाने का ध्यान हो आता है। सहसा उनके भीतर एक खटका सा होता है और वह अपने बेटे सनी के बचपन तक घूम आते हैं।
उन दिनों बरसाती दिन थे। सनी, अपने साथ पानी की बोतल, टिफ़िन और एक सुंदर छोटे छाते को भी लेकर जाता। छाते पर बड़े ही सुंदर नन्हें -नन्हें फूल बने थे। वह सनी को बड़ा ही प्यारा था। वह तमाम रास्ते उससे खेलता चलता। 
 
एक दिन सनी से उसका छाता खो गया। वह क्लास में ही उसे छोड़ आया। बाद में बहुत खोजने पर भी वह उसे नहीं मिला। मायूस चेहरा लिए सनी घर लौटा। वेतन तब कम थे। आज वाला आर्थिक बेफ़िक्री का आलम न था कि बच्चा हँसता हुआ घर में घुसे,” पापा , मेरा छाता गुम हो गया।” और पापा एक बार भी यह न पूछे,” कैसे , कहाँ गुम हो गया ?” अपितु प्रत्युत्तर मे हंस कर कहे,” वाह बेटा ! कोई बात नहीं, आज शाम को दूसरा ला देते हैं।” 
अगले ही दिन सनी को उसकी माँ ने निर्देश दिया कि वह अपना छाता खोने की सूचना अपनी क्लास टीचर को दे कि वह उसका खोया छाता ढूँढने में सहायता करे। सनी की क्लास टीचर ने सभी बच्चों से पूछ -ताछ की। सनी का छाता तो नहीं मिला लेकिन क्लास टीचर को एक दूसरा नया सुंदर छाता, बच्चों के डेस्क से मिला। बहुत पूछने पर भी किसी बच्चे ने उस पर अपना हक़ न जताया।
क्लास टीचर ने सनी को अपने पास बुलाया और कहा,” सनी बेटा। यह छाता मिला है। हो सकता है कोई बच्चा भूल से अपने छाते के बदले तुम्हारा छाता ले गया हो। इस छाते को कोई अपना नहीं बतला रहा है। इसे तुम ले जा सकते हो।” 
 
“लेकिन मैम! यह मेरा नहीं है।” 
“ वह तो ठीक है सनी बेटा , लेकिन जब तुम्हारे वाला नहीं मिल रहा, तो इसे ले जाओ। मैं कह रही हूँ।” 
“ सॉरी मैम। मैं किसी दूसरे की चीज़ नहीं ले सकता।” सनी ने उत्तर दिया था।
उस दिन सनी महोदय विजेता मुद्रा में स्कूल से घर लौटे थे।
यह बात अलग है कि उन्हें दूसरा छाता, अगली बरसात में ही मिल पाया था।
“ दादू, कहाँ हो? चलो न खाना खाएं। मम्मी ने मेज़ पर कब का लगा दिया है।” 
“ हाँ , हाँ चलो “ , उपाध्याय जी बेटे ,सनी के बचपन से होते हुए पोते बिट्टू के बचपन तक तुरंत वापिस लौट आए। 

- डॉ. आदर्श
 
रचनाकार परिचय
डॉ. आदर्श

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कथा-कुसुम (1)