अगस्त 2019
अंक - 52 | कुल अंक - 54
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम
रिजेक्शन
 
धीरज जैसे ही बाइक खड़ी कर हेलमेट उतारता है, वैसे ही  बगल वाली सविता आंटी की आवाज़ आती है,
"क्यों धीरज बेटा, इंटरव्यू देकर आ रहे हो? 
"जी आंटी"
"अब तक तो कई इंटरव्यू दे चुके हो, कहीं कुछ बात नहीं बनी क्या?"
होठों पर नकली मुस्कान लाते हुए धीरज कहता है,
"आंटी, कोशिश कर रहा हूँ।" और तुरन्त गेट खोलकर अंदर चला जाता है।
 
सविता आंटी हाउस वाइफ हैं। उससे कहीं ज़्यादा सोसायटी की सीसीटीवी। किसके घर में क्या चल रहा है, कौन आ रहा, कौन जा रहा है, उनको सबकी ख़बर रहती है।
"अरे आ गया बेटा, हाथ मुंह धो लो। कुछ खाने को लेकर आती हूँ।" किचन से धीरज की मां की आवाज़ आती है।
लेकिन धीरज बगैर कुछ सुनें अपने कमरे में जाता है और धड़ से दरवाज़ा बन्द कर देता है।
दरवाज़े की ज़ोर से बंद करने की आवाज़ सुनकर धीरज की मां अनीता किचन से दौड़ पड़ती हैं।
थोड़ी ही देर में ना आने कितने सवाल उनके दिमाग में घूमने लगते हैं। 
दरवाज़े को थपथपाते हुए कांपती हुई आवाज़ में वो कहती हैं,
"धीरज बेटा, क्या हुआ, दरवाज़ा क्यों बन्द किया। बता तो सही, किसी ने कुछ कहा क्या? अजी...सुनते हो, जल्दी आइए। देखिए धीरज दरवाजा नहीं खोल रहा है।"
अनीता की आवाज सुनकर धीरज के पापा यानि महेश जी तुरन्त बगल वाले कमरे से निकलर धीरज के कमरे के पास पहुंचते हैं।
 
"धीरज बेटा, दरवाज़ा खोलो। ये क्या नादानी है बेटा। "
थोड़ी देर बाद धीरज दरवाज़ा खोलकर पास में ही रखी एक कुर्सी पर बैठ जाता है।
धीरज पिछले कई महीनों से नौकरी की तलाश में था। लेकिन उसे हर जगह से सिर्फ रिजेक्शन ही मिल रहा था। 
"पापा मै टूट चुका हूं। थक गया। जहां भी इंटरव्यू के लिए जाता हूँ, उससे पहले सिफारिशी फ़ोन पहुंच जाते हैं। ऊपर से आरक्षण, काबिलियत तो देखी ही नहीं जाती, और लोगों के ताने अंदर तक चोट करते हैं।"
 
महेश जी बेटे का हौसला बढ़ाते हुए कहते हैं,
"इतना जल्दी हार मान गए बेटा, अभी तुम्हारा बाप ज़िंदा है। दो वक्त की रोटी बड़े प्रेम से तुम्हारी माँ बनाकर खिला सकती है। तुम अपनी कोशिश जारी रखो बेटा।"
बेटे को सीने से चिपकाते हुए अनीता जी कहती हैं। 
"लोगों के ताने, रिजेक्शन से घबराना नहीं है बच्चे। इनको अपनी ताकत बनाओ। देखना जिस दिन तुम कुछ बन जाओगे ना, इन सबके बोल बदल जाएंगे।" 
बेटे धीरज की तरफ पानी का गिलास आगे बढ़ाते हुए वो कहती है,
"चलो उठो और अपना मूड ठीक करो।"
तभी फोन की घन्टी बजती है, महेश जी फोन उठाने ड्रॉइंग रूम की ओर बढ़ते हैं,
"धीरज, तुम्हारा फ़ोन है बेटा"
धीरज तुरन्त अपने कमरे से भागता हुआ फ़ोन लपक लेता है।
"हलो मिस्टर धीरज, आप इंटरव्यू में सिलेक्ट हो गए हैं। कल आकर एचआर से मिल लीजिएगा।"
 
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दोस्ती
 
दिल्ली का टू बीएचके प्लैट। जहां तीन दोस्त रहते थे। संजीव, राकेश और राजेश। कॉलेज में तीनों मिले और अब तक साथ थे। तीनों ही बैचलर। करियर की जदोजहद, पैसे की तंगी और कुछ कर गुजरने की तमन्ना लिए। संजीव और राकेश प्राइवेट कंपनी में काम करते थे। राजेश पिछले एक साल से बेरोजगार था।  मंदी में छंटनी का शिकार। नई नौकरी के लिए दौडधूप जारी थी। फिलहाल पूरे घर की जिम्मेदारी राजेश के जिम्मे थी। राजेश जब भी नौकरी की तलाश में घर से निकलता तो उसे तकिए के पास दो सौ रुपये रखे मिलते और एक नोट मिलता। जिसमें लिखा होता था, 
"चुपचाप रख ले। कोई सवाल नहीं। बाद में निपट लेंगे।"
राजेश बगैर किसी से पूछताछ किए रुपए रखता और निकल पड़ता।
 
राजेश आज बहुत खुश था। किचन में खाना बनाने में भिड़ा हुआ था। तभी दरवाज़े की घन्टी बजती है।
"अरे संजीव, तुम इतना जल्दी ऑफिस से आ गए।"
"हाँ यार, जल्दी फ्री हो गया। वो मेड को भी  बात करने के लिए बुलाया है"
"खाना कौन बना रहा है।" थके-हारे संजीव ने पूछा।
"मैं ही बना रहा हूँ। हम सबके लिए खुशखबरी है।" 
संजीव के गले लगकर राजेश खुशी से चिल्लाया...."फाइनली मुझे नौकरी मिल गई।" 
दोनों बहुत खुश होते हैं। तभी दफ्तर से राकेश भी आ जाता है। तीनों पार्टी करते हैं। एक साल के बाद तीनों को खुशी नसीब हुई थी।
"यार, मुझे नहीं मालूम कि एक साल तक तुम दोनों में से किसने मेरे तकिए के पास पैसे रखे। तुम लोग नहीं होते तो मैं आज यहां नहीं होता। ये अहसान मैं ताउम्र नहीं चुका पाऊंगा।" ये कहते-कहते राजेश का गला भर आया।
"अब ज़्यादा इमोशनल मत कर, हम रो पड़ेंगे। हम तुझे टूटता, बिखरता नहीं देखना चाह रहे थे। तू चिंता मतकर सब हिसाब कर लेंगे।" संजीव ने कहा।
 
"अच्छा ये तो बताओ, आज खाने में क्या स्पेशल है?" चहकते हुए राकेश ने पूछा।
तभी दरवाज़े की घन्टी बजती है। सामने मेड खड़ी-खड़ी भुनभुना रही थी।
"क्या हुआ तुम्हें, आते ही नखरे दिखाने लगी।" राकेश ने पूछा।
"क्या साहब, एक टाइम तो खाना बनवाते थे उसमें भी कभी बुलाते हो, कभी छुट्टी कर देते हो। बताइए आज क्यों बुलाया है?"
"छुट्टी???? हमने कब दी।" संजीव आश्चर्य से पूछता है।
पुछिए राजेश भइया से, पिछले एक साल से खुद खाना बना रहे हैं। "
राजेश....क्या दोस्त। तीनों की आँखें डबडबा गईं थीं।
 

- विभा वत्सल

रचनाकार परिचय
विभा वत्सल

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कथा-कुसुम (1)