अगस्त 2019
अंक - 52 | कुल अंक - 54
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्याँकन

ग़ज़ल में हिन्दी कविता-सा परिवेश रचता संग्रह: 'ले चल अब उस पार कबीरा'
- के. पी. अनमोल


 



'ले चल अब उस पार कबीरा' डॉ. सीमा विजयवर्गीय का पहला ग़ज़ल संग्रह है। अलवर (राजस्थान) निवासी सीमा जी के इस संग्रह की एक ख़ास बात यह है कि इसकी लगभग सभी ग़ज़लें फेलुन रुक्न यानी 22 पर आधारित बह्रों में कही गयी हैं। इनकी ग़ज़लों में कल्पना और कोरी लफ्फाज़ी की बजाय आम जन-जीवन की बातें जगह पाती हैं। घर-परिवार, आँगन, तुलसी, पेड़-पौधे, रिश्ते-नाते, समाज और समाज से जुड़े सरोकारों पर इनका शायरी करना सुखद है। आज अधिकतर महिला ग़ज़लकार जहाँ परम्परावादी घिसी-पिटी शायरी करने में लीन हैं, वहीं सीमा जी की ग़ज़लों में सामाजिक सरोकारों का मिलना रेगिस्तान में पानी देखे जाने-सा सुकून देता है।

इनकी ग़ज़लों की कहन चमत्कारिक, घुमावदार या लाग-लपेट की न होकर बहुत आसान-सी है। आम बातचीत की शब्दावली की भाषा में ये अपने आसपास की बातों को अशआर में ढालती हैं। ज़मीनी शायरी और सरोकारों के मिलने के अलावा इनकी ग़ज़लगोई में कई ऐसी ख़ूबियाँ हैं, जो ध्यान खींचती हैं।

इनके यहाँ ग़ज़लों में भी हिन्दी कविता जैसा परिवेश मिलता है। ये भारतीय परिवेश, बिम्ब, प्रतीकों में बात करना पसन्द करती हैं-


मानस में ही आ बैठे जैसे तुलसी
जब माँ ने पढ़ ली चौपाई रात गए
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राई, जीरा, मेथी का वो छौंक लगाती
आँगन में अब भी फैली है माँ की ख़ुशबू
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इस माया से दूर कहीं जाने को उत्सुक
दिल से अब रैदास हुए ये पीले पत्ते
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रुत फागुन की रंग लिए बैठी हाथों में
कर तू इसकी अगुवानी ओ मेरे यारा!


इनकी ग़ज़लों में अलग-अलग तरह के रदीफ़ देखने को मिलते हैं। अलहदा रदीफ़ में ग़ज़ल कहना इन्हें भाता है। ग़ज़ल में अलग तरह के रदीफ़ को निभा पाना बड़ी चुनौती होती है। सीमा जी उन्हें निभाने में पूरी तरह सफल नहीं भी होतीं लेकिन वे यह साहस करती हैं। यहाँ इनका साहस प्रभावित करता है।

आपस में गर प्यार नहीं तो सब माटी है
अपना-सा संसार नहीं तो सब माटी है
रदीफ़- नहीं तो सब माटी है
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इक-इक तारा तोड़ सजा अपने दामन को
ले आ अम्बर सारा बस इक पैर बढ़ा तू
रदीफ़- बस इक पैर बढ़ा तू
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दर्द समेटे क्यों बैठा सारे आलम का
सब अच्छा करते रघुराई तू ख़ुश रह
रदीफ़- तू ख़ुश रह


आज ग़ज़ल पुरानी रूढ़ियों को छोड़कर लोक की बात करने लगी है। हवाबाज़ी की बजाय कुछ सार्थक रचना ही रचनाधर्मिता के धर्म का निर्वहन करना है। अब ग़ज़ल भी यह काम बा-ख़ूबी करने लगी है। साहित्य की अन्य विधाओं की तरह ग़ज़ल के शेरों में भी आम जन और उसकी समस्याओं की बात होने लगी है। एक रचनाकार को चाहिए कि वह 'मैं और हम' के दायरे से बाहर निकल; अपने आसपास पर बात करे। पाठक के सामने ऐसी बातें रखे, जिन पर चर्चा की जानी ज़रूरी हो। डॉ. सीमा ऐसा करती दिखती हैं-

किसके हिस्से माँ आएगी, किसके बापू
दालानों-चौबारों को भी डर लगता है
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आँगन-आँगन पेड़ों पर पड़ते थे झूले
मल्हारें, सावन, सिंजारे चुप-से क्यों हैं
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शुद्ध हवा-पानी के दिन तो बीत चुके हैं
साँसें भी बेहाल सुनो ये मुल्क है मेरा
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मत कर आँगन में दीवारें ऊँची-ऊँची
मेरा हक़ भी ले ले भाई तू ख़ुश रह
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खौफ़ज़दा चेहरों पर मातम-सा छाया है
जीना अब जंजाल सुनो ये मुल्क है मेरा


उस्ताद ग़ज़लकार दादा दरवेश भारती जी के अनुसार "जिन मुद्दों को ग़ज़ल में पुरुष नहीं उठा सकते यानी उनको उसका अनुभव नहीं होता और अनुभव न होने की वजह से ग़ज़ल में वो बातें नहीं आ सकतीं, जो महिलाओं को पता होती हैं.......बहुत सारे शेर ऐसे हैं जिन्हें महिलाओं ने लिखे हैं, वो पुरुष कभी नहीं लिख सकता।" इसी नज़रिये के कुछेक शेर इनकी ग़ज़लों में भी यहाँ-वहाँ मिलते हैं। साथ ही एक पूरी ग़ज़ल ही इसी नज़रिये की है, जिसका रदीफ़ ही सबकुछ बयान कर देता है- 'मैं औरत हूँ'।

चोटों पर चोटें सहती मैं औरत हूँ
फिर भी घर को ख़ुश रखती मैं औरत हूँ

आँगन की तुलसी से लेकर चौके तक
हर ख़ुशबू में मैं बहती मैं औरत हूँ
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मेरा नाम नहीं है घर की दहलीज़ों पर
पर घर की दीवारों से कल सुनना मुझको
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आग से लड़ना सीख रही हूँ
वक़्त बदलना सीख रही हूँ


इनकी ग़ज़लगोई की एक और ख़ास बात ने मुझे प्रभावित किया। वह यह कि इनकी ग़ज़लों में एक सूफ़ियानापन का अहसास है। ग़ज़ल कहते-कहते वे इस लोक से उस लोक में रंगती दिखती हैं। लौकिक से अलौकिक का भाव यहाँ इनके शेरों में कई जगह नज़र आता है।

घोर अँधेरा ढँक लेता है जब भी मुझको
जिस्मो-जाँ को तू ही तो रोशन करता है
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कितना सुन्दर, कोमल, प्यारा, नाज़ुक होगा
हर ज़र्रे में जिसका अक्स उभर आता है
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क्या देखूँ मैं तुझको छूकर
तेरा तो अहसास बहुत है


ग़ज़ल के शिल्प की पकड़ में सीमा जी भले ही अभी पारंगत न हों लेकिन ग़ज़ल के साथ तारतम्य बैठाना उन्हें बा-ख़ूबी आता है। और अगर किसी को ग़ज़ल के साथ एक बार तारतम्य बैठाना आ गया फिर वो उसकी मुट्ठी में आते देर नहीं लगाती। सीमा जी का ग़ज़ल कहने का अन्दाज़ उन्हें दूर तक ले जा सकता है बशर्ते वे इसी तरह समर्पण के साथ ग़ज़ल से ताल मिलाती रहें। किताब की 112 ग़ज़लों के ज़रिए इनके ग़ज़ल लेखन से परिचित होकर अच्छा लगा। किताब की बधाई के साथ-साथ इन्हें भविष्य के लिए शुभेच्छाएँ।





समीक्ष्य पुस्तक- ले चल अब उस पार कबीरा
विधा- ग़ज़ल
रचनाकार- डॉ. सीमा विजयवर्गीय
प्रकाशक- अमृत कल्प आयुर्वेद (अलवर, शिमला, चंडीगढ़)
संस्करण- प्रथम, 2019
पृष्ठ- 128
मूल्य- 199 रुपये


- के. पी. अनमोल

रचनाकार परिचय
के. पी. अनमोल

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