प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अगस्त 2019
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्याँकन

प्रवासी हिन्दी कहानी कोश: कोशीय प्रतिबद्धता की ओर एक और क़दम
- डॉ. सुनीता शर्मा



कोशविद्या एवं कोशकला के आधार पर ही कोशकार भाषा एवं साहित्य की सेवा करता है। कोश रचना उसकी कलात्मक एवं वैज्ञानिक बुद्धि का समन्वित रूप है। किसी विषय, भाषा एवं किसी अन्य क्षेत्र विशेष की आवश्यकता की पूर्ति ही इसके निर्माण में प्रेरक कारण बनती है। ‘निघंटु’ भारतीय कोश परंपरा का प्राचीन रूप है। निघंटु कोश का वह रूप है, जिसमें उन शब्दों का विवेचन किया जाता है, जो तत्काल प्रचलित नहीं होते, जिनका प्रचलन लोक से उठ गया होता था। निघंटुओं से आगे बढ़ती यह परंपरा संस्कृत तथा प्राकृत में पुष्ट होती हुई हिन्दी में प्रविष्ट होती है। हिन्दी भाषा और नागरी अक्षरों में पहला कोश पादरी एम. टी. एडम ने तैयार किया था। यह 1829 में कलकत्ता से प्रकाशित हुआ। भारतीयों में मुंशी राधेलाल ने 1872 में पहला कोश ग्रंथ प्रस्तुत किया और बीसवीं शती के प्रारम्भ में काशी नागरी प्रचारिणी सभा ने 1904 में दस खंडों में हिन्दी शब्द सागर के नाम से बृहत कोश प्रकाशित किया और फिर निरंतर विकास करते हुए हर तरह के कोश अस्तित्व में आए। विधागत कोशों में जैसे उपन्यास कोश, नाटक कोश, कहानी कोश की आवश्यकता अनुभव हुई और इनका जन्म हुआ। विशेष बात यह है कि विधापरक कोशों के जन्मदाता रचनाकार ही बने। कहानी के क्षेत्र में अब तक तीन कहानी कोशों के निर्माण का श्रेय प्रोफेसर मधु संधु को ही जाता है।

हिन्दी कहानी लेखिका प्रोफेसर मधु संधु पिछले लगभग पैंतीस वर्षों से कहानी साहित्य में जी रही हैं। उनकी दृष्टि, उनके चिंतन का हर पक्ष कहानी के साथ ही जुड़ा है। सन 70 के बाद की कहानी के हर मोड़ पर उनके हस्ताक्षर अंकित हैं। आज कहानी लेखन, कहानी चिंतन, कहानी समीक्षा में उनका नाम पूरे भारत में जाना जाता है। कहानी जगत को कोशबद्ध करना उनकी विश्लेषणात्मक प्रतिभा की विशिष्ट पहचान बन चुकी है। अपनी कोशकारी कला को साहित्यिक सौंदर्य से सुसज्जित करते हुए उन्होंने साहित्य जगत को चौथा और कहानी जगत को तीसरा कोश ‘प्रवासी हिन्दी कहानी कोश’ प्रदान किया है। इससे पूर्व 1992 में पहला हिन्दी ‘कहानी कोश’ ग्रंथम, दिल्ली से प्रकाशित हुआ एवं 2009 में दूसरा ‘हिंदी कहानी कोश’ नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली से साहित्य जगत को मिला और अब 2019 में नमन प्रकाशन, दिल्ली द्वारा ‘प्रवासी हिन्दी कहानी कोश’ का प्रकाशन हुआ है। इससे पूर्व डॉ. मधु संधु 2003 में गुरु नानक देव विश्व विद्यालय से प्रकाशित होने वाले ‘हिन्दी लेखक कोश’ में सहलेखिका के रूप में अपना नाम दर्ज करवा चुकी है। ‘द सनडे इंडियन’ ने उनकी गणना 21वीं शती की 111 हिन्दी लेखिकाओं में की है।

भारतीय और पाश्चात्य महिला कथा लेखन के तुलनात्मक संदर्भों पर कार्य करते हुए उन्होंने विदेश में रहने वाली प्रवासी लेखिकाओं की संवेदना को पहचानना बहुत पहले आरम्भ कर दिया था। उनकी हर कहानी की अपने ढंग की व्यथा कथा ने उन्हें एक स्थान पर मंच सांझा देने के लिए प्रेरित किया। फल स्वरूप कोश की रूपरेखा ने आकार लेना शुरू कर दिया, जिसका साकार रूप आज हिन्दी जगत के सामने है। उनका कथन है, “कहानियाँ मात्र पढ़ी या समझी ही नहीं जाती, एक-एक कहानी मनसा जी भी जाती है।” इसीलिए इस कोश को पढ़ते समय ऐसा लग रहा था कि कहानी कोश में प्रविष्टि नहीं ले रही हैं, अपितु डॉ. मधु संधु इस की पुनर्रचना कर रही हैं, तभी तो एक के बाद एक कहानी पढ़ते चले जाते हुए विदेशी तिलस्म जाल में ऐसा खो गई कि अंत तक पहुँचने पर ऐसा लगा कि यह मात्र एक कोश नहीं है, यह तो उन कहानीकारों के जीवन के वह अछूते पक्ष हैं, जिन पर कोश लेखिका ने अपने हस्ताक्षर करके उन्हें प्रामाणिक बना दिया है। ये कहानियाँ विदेश में अस्तित्व चेतना की विशेष जद्दोजहद की कहानियाँ हैं।

यह ‘प्रवासी हिन्दी कहानी कोश’ केवल प्रवासी महिला कहानीकारों की 437 कहानियों का भारतीय एवं प्रवासी संसार है। लगभग सभी लेखिकाएँ भारतीय मूल की हैं और विश्व के भिन्न देशों में प्रवास कर रही हैं। इसीलिए यहाँ लगभग चालीस प्रदेशों की संस्कृति के दर्शन होते हैं। जैसे- स्कॉटलैंड, डेन्मार्क, अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, कुवैत, फ़्रांस, इंग्लैंड, मलेशिया, केनेडा, इराक, मेक्सिको, मारिशस, अफ्रीका, यूगांडा, युगोस्लावाकिया, आयरलैंड, सूरीनाम आदि। यह कोश उस महान कुम्भ के समान है, जिसमें अलग-अलग देशों के लोग डुबकी लगाते हुए प्रतीत होते हैं। कभी तो पाठक का साक्षात्कार किसी मलेशियन से होता है (मेनका शेरदिल- वो मलियान लड़का), कभी अमेरिका की संस्कृति का जीवंत रूप मिलता है (सुषम बेदी- चिड़िया और चील), कभी ब्रिटेन का (उषाराजे सक्सेना- वॉकिंग पार्टनर), कभी डेनमार्क का (अर्चना पेन्यूली- डेरिक की तीर्थ यात्रा)।

इन कहानियों का चयन कोश लेखिका ने उनके प्रकाशित संग्रहों, संकलनों के साथ-साथ प्रकाशित पत्रिकाओं और अंतर्जालीय पत्रिकाओं से किया है। हर कहानी का कथासार, पात्र परिचय, कथ्य देने के साथ-साथ कहानी का प्राप्ति स्त्रोत, प्रकाशन वर्ष, प्रकाशक और सम्पादकीय संपर्क भी दिये गए हैं- जो इस कोश की महती विशेषता है। सबसे अधिक 40 कहानियाँ दिव्या माथुर की हैं। सुषम बेदी की 39, इलाप्रसाद की 36, उषा राजे सकसेना की 33, उषा प्रिंयम्वदा की 32, अर्चना पेन्यूली की 22, सुधा ओम ढींगरा की 19, अनिल प्रभा कुमार की 16, सोमवीरा की 15, सुदर्शन प्रियदर्शिनी की 14, कादंबरी मेहरा की 13, नीना पॉल और शैल अग्रवाल की 11-11, जाकिया जुबेरी की 9, पूर्णिमा बर्मन, लावण्या शाह, उषा वर्मा, रचना श्रीवास्तव और भावना सक्सेना की 8-8 कहानियों की प्रविष्टियाँ हैं। अचला शर्मा, अनीता कपूर, अमिता तिवारी, उषादेवी कोलहटकर, कमला दत्त, कविता वाचकनवी, कुंती मुखर्जी, दीपिका जोशी, देवी नागरानी, नीरा त्यागी, नीलम जैन, मनीषा श्री, मेनका शेरदिल, शैलजा सक्सेना, स्नेह ठाकुर, स्वाति भलोटिया, सुनीता जैन, सीमा खुराना, स्वदेश राणा, हंसा दीप आदि लेखिकाओं की कहानियाँ भी इस कोश का अलंकरण बनी हैं।

प्रस्तुत कोश में रचनाकारों ने प्रवासी परिवेश में बसे भारतीयों के जीवन के विविध पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए अनेक विचित्र समस्याओं से पाठक को परिचित करवाया है। दूसरी ओर ये सभी लेखिकाएँ भारतीय परिवेश में पली-बढ़ी हैं। भारतीय संस्कृति के वैशिष्टय से परिचित हैं, इसी लिए यहाँ एक तुलनात्मक परिवेश का सृजन हुआ है।

‘प्रवासी हिन्दी कहानी कोश’ की अधिकतर कहानियाँ उन पुरुषों को केंद्र में रख कर लिखी गई हैं, जिन्हें डॉलर की चमक, उन्मुक्त यौनाचार और निरंकुश जीवन इतना प्रभावित करता है कि वहाँ की नागरिकता पाने की, ग्रीन कार्ड लेने की जद्दोजहद में लग जाते हैं (सुनीता जैन- काफी नहीं, सुधा ओम ढींगरा- फंदा क्यों, रचना श्रीवास्तव- भरोसा, नीना पॉल- किश्तों का भुगतान, दिव्या-माथुर- मेड इन इंडिया)। लिव-इन का फ़ैशन तो सिर चढ़ कर बोल रहा है (उषा राजे सक्सेना- वॉकिंग पार्टनर, अचला शर्मा- दिल में एक कस्बा है, सुषम बेदी- रण भूमि, अर्चना पेन्यूली- मैंने सही चुनाव किया न)। ‘प्रवासी हिन्दी कहानी कोश’ की इन कहानियों में एक ओर अनाथ, बेसहारा बच्चों के संरक्षण के लिए वेलफ़ेयर स्टेट के चिलड्रेन होम, फ़ास्टर होम जैसी संस्थाओं का भी उल्लेख है (इला प्रसाद- आधा पाठ, उषा राजे सक्सेना- बीमा बीसमार्ट, वह रात)। हैफ़ फादर- हैफ़ मदर की अवधारणा भी कम चौंकाने वाली नहीं है। सौतेले बच्चों की प्रताड़ना, हत्या, अत्याचार, यौन शोषण हैफ़ फादर ही नहीं माँ के प्रेमी भी कर रहे हैं। (नीना पॉल- ऐसा क्यों, जाकिया जुबेरी- बाबुल मोरा) जबकि उषा राजे सक्सेना की ‘डैडी’ जैसी कहानियों में स्नेहिल हैफ़ फादर भी मिलते हैं। दूसरी ओर वृद्धावस्था की त्रासदी भी यहाँ चित्रित है (सुधा ओम ढींगरा- कमरा न. 103, इला प्रसाद- उस स्त्री का नाम)। प्रवास व्यक्ति को अकेला भी कर रहा है और कुंठित भी। समलैंगिकता (सुधा ओम ढींगरा- आग में गर्मी कम क्यों, अनिल प्रभा कुमार- कतार से कटा घर), परामनोविज्ञान (पूर्णिमा वर्मन- उड़ान), नस्लवाद (सुषम बेदी- अजेलिया के फूल), नारी उत्पीड़न (दिव्या माथुर- नीली डायरी) और सशक्तिकरण (उषा राजे सक्सेना– आण्टोप्रन्योर) पर भी अनेकों कहानियाँ हैं।


अत: ‘प्रवासी हिन्दी कहानी कोश’ भारतीय मूल की प्रवासी लेखिकाओं की कहानियों का गहन पुनर्पाठ है। कोशकार डॉ. मधु संधु ने मानों इन कहानियों के विदेशी तिलस्मी संसार में प्रवेश कर उन्हें हर ओर-छोर से महसूसा और एक विशेष फ्रेम में कोशाभिव्यक्ति दी है। प्रवासी लेखिकाओं को पहचान दिलाने में यह कोश मील का पत्थर सिद्ध होगा।




समीक्ष्य पुस्तक: प्रवासी हिन्दी कहानी कोश
विधा: कहानी कोश
रचनाकार: डॉ. मधु संधु
प्रकाशक: नमन प्रकाशन, दिल्ली
प्रकाशन वर्ष: 2019
मूल्य: 650/-


- डॉ. सुनीता शर्मा
 
रचनाकार परिचय
डॉ. सुनीता शर्मा

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