अगस्त 2019
अंक - 52 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

धारावाहिक
गवाक्ष:19
 
"मैं जानता हूँ तुम्हारे लिए यह समझना कठिन है किन्तु तुम यह समझ सकते हो कि हम जीवित हैं तो संसार की सभी बातों से जुड़े रहते हैं।आधुनिक युग में मनुष्य की इच्छायें इस कदर आसमान को छू रही हैं कि वह परेशानियों में फँसता रहता है। इसीलिए उसका जीवन कठिन होता जाता है।”  
“ये संस्कार?”  
"संस्कार हमें अपने वातावरण, माता-पिता, गुरुजनों से प्राप्त होते हैं। उनके लिए धन अथवा ‘क्रेडिट-कार्ड’ की आवश्यकता नहीं होती। वे सहज रूप में हमारे भीतर प्रविष्ट करते हैं, सरल जीवन जीने की कला सिखाते हैं। जोअपने पास है, उससे मनुष्य संतुष्ट हो जाता है। वह किसी से ईर्ष्या या तुलना नहीं करता। वह उसमें संतुष्ट हो जाता है जो वह परिश्रम से प्राप्त करता है। लेकिन आज की समाज व्यवस्था से प्रभावित मनुष्य समाज में अपनी इज़्ज़त का दिखावा करने के लिए पहले भौतिक वस्तुओं के प्रति आकर्षित होकर ऋण लेता है फिर उसे उतारने की चिंता में अपना स्वास्थ्य बिगाड़ लेता है। इससे उसके संबंधों पर भी प्रभाव पड़ता है। कभी-कभी ऐसी स्थिति में वह एकाकी भी पड़ जाता है। इससे समाज में वह अपना आदर भी खो देता है और मानसिक शांति भी।"

"क्या यह स्थिति सबके साथ होती है?" कॉस्मॉस को प्रोफेसर की बातें सुनकर भय लगने लगा था। 
"यूँ तो कमोबेश सबके साथ इस प्रकार की घटनायें होती हैं किन्तु मध्यम वर्ग का आदमी इनसे अधिक प्रभावित होता है। अमीर और अमीर होता जाता है। गरीब अपनी भौतिक इच्छाओँ की पूर्ति न हो पाने पर असहज तथा निराश रहता है। वह अपने परिवार की तथा अपनी इच्छा पूर्ण न कर पाने में अपने आपको असमर्थ पाता है और जीवन भर ग्लानि से घिरा रहता है।"        
"आप बार-बार जागृति और चेतना की बात करते हैं। यह किस प्रकार आती है?"
"जहाँ जड़ता न हो, वहाँ  चेतना होती है। चेतना यानि इसकी स्मृति रहना कि हम जीवित हैं। कण-कण में जानने की जीवंत शक्ति है। जीवन का लक्षण जिज्ञासा का बना रहना है। चेतना है, तभी बदलाव है,चेतना का लक्षण ही स्वात्मा की चेतना है। प्राणीमात्र क्या, पेड़-पौधे सभी में तो बदलाव होते हैं। इनमें चेतना है किन्तु अभिव्यक्ति नहीं है। जड़ व्यक्ति किसी का सम्मान नहीं कर सकता। जहाँ चेतना है, वहीं पर प्रेम,आदर आदि संवेदनाएं हैं। देखो न! मनुष्य के भीतर कितनी शक्तियाँ हैं दर्शन की, जिघ्रण की, श्रवण की, महसूस करने की और भी बहुत सी लेकिन इनकी उपयोगिता तभी है जब मनुष्य सचेत हो, जागृत हो।"

"तो ध्यान क्या है?"
"अपने भीतर झाँकना। अपने आपसे एकता महसूस करना ही ध्यान है। शरीर को महसूस करने के बाद चेतना आती है। हमें भान होता है कि हम इस शरीर से भिन्न हैं। हम तो आत्मा हैं। इस ज्ञान के पश्चात हमें कोई दुःख ,परेशानी,जिज्ञासा रह ही नहीं जाती।"
"यह जीवन एक वहम सा लगता है प्रोफ़ेसर!"
"नहीं! जीवन वहम नहीं, यह आस्था है,आस है, विश्वास है। यह ईश्वर प्रदत्त एक आशीष है जिसको यदि हम जीना सीख सकें तो अपने पीछे सुगंध की बौछार बिखेरकर, इस दुनिया में अपने आने को सफल बनाकर जाते हैं।"       
"इसका अर्थ है इस पृथ्वी पर जन्म लेना बहुत सौभाग्य की बात है?"
"बिलकुल! जन्म लेना सौभाग्य है। मनुष्य के रूप में जन्म लेना उससे बड़ा सौभाग्य है और अपने जीवन को कुशल चेतना से जीकर एक उत्सव बनकर, पुष्पों की सुगंध सा जीकर चले जाना और भी बड़े सौभाग्य की बात है।"
"आपके अनुसार मनुष्य जन्म बहुत महत्वपूर्ण है। मुझे भी यहाँ बहुत आनंद आ रहा है, नवीन सूचनाएं प्राप्त हो रही हैं। नवीन संवेदनाओं ने मेरे भीतर प्रवेश किया है लेकिन फिर भी मैं बहुत दुविधा में हूँ। "कॉस्मॉस उलझन में दिखाई दे रहा था।
  
"वह भी बता दो। संभव है मैं तुम्हारे प्रश्न का उत्तर देकर तुम्हारी संतुष्टि कर सकूँ। 
"मैंने महसूस किया है कि मनुष्य बहुत सी बातों को अनदेखा करता रहता है। मैंने बहुत से लोगों को यह कहते सुना है, 'सब चलता है!' इस प्रकार त्रुटियाँ करके बार-बार यह कहना औचित्यपूर्ण नहीं है क्या?"
"मनुष्य में अच्छाईयाँ,बुराईयाँ सब हैं। त्रुटि होना स्वाभाविक है, न होना कभी अस्वाभाविक भी लगता है किन्तु जब वह अपनी त्रुटियों को बारम्बार दोहराता है तथा दूसरों को हानि पहुँचाता है तब उसकी सोच कमज़ोर होती जाती है। वह दूसरों की परवाह न करके केवल अपने अहं की तुष्टि में लग जाता है। 'सब चलता है' सोचकर वह अपने व्यक्तित्व को तुच्छ व निंदनीय बनाने लगता है। मनुष्य के लिए त्रुटि करना स्वाभाविक है किन्तु उससे कुछ न सीखना मूढ़ता है। यदि त्रुटि से हम कुछ सीखते हैं तब हमारे व्यक्तित्व में निखार आता है। मनुष्य के पास चिंतन की स्वतंत्रता है तो विवेकशीलता भी है। चेतना ही उसको विवेक का आचरण सिखाती है। चेतना मनुष्य को सिखाती है उसे कहाँ आगे बढ़ना है। कहाँ अर्ध विराम, कहाँ पूर्ण विराम लगाना है।"
 
इस बार काफी सारे पृष्ठ आकर आज्ञाकारी बालकों की भाँति प्रोफ़ेसर के समक्ष रखी थप्पी में एक के पश्चात एक ऐसे जुड़ने लगे मानो किसी फ़ौजी अफसर के आदेश का पालन कर रहे हों। कॉस्मॉस अपलक उन्हें जमता हुआ देख रहा था।            
"अर्थात मनुष्य का अधिकाँश जीवन सही सोच पर निर्भर है और मनुष्य के मस्तिष्क का शरीर के चलने में बहुत महत्वपूर्ण हाथ है?"
"हाँ,वास्तव में जीवन की एकाग्रता, उसका विकास, प्रगति सभी इसी पर निर्भर करते हैं।"
"अच्छा! इसे आज्ञा-चक्र कहते हैं न? लेकिन क्यों?" दूत ने अपने माथे पर भौहों के बीचों बीच उंगली रखकर प्रोफ़ेसर से पूछा। 
"क्योंकि हमारे शरीर में जो कुछ भी घटित होता है, उसकी सर्वप्रथम सूचना मस्तिष्क के पास ही जाती है,जहाँ से हमें आज्ञा प्राप्त होती है। मान लो, शरीर पर कहीं चोट लगती है, तुरंत ही मस्तिष्क के पास उसकी सूचना जाती है और मस्तिष्क से पुन: तुरंत ही हमें सूचना प्राप्त हो जाती है। हमारा हाथ पवन की गति से अपनी चोट पर पहुँच जाता है। इस प्रकार सभी सूचनायें पहले मस्तिष्क के पास पहुंचती हैं, फिर आज्ञा -चक्र से आज्ञा प्राप्त करके हमारे शरीर का संबंधित अंग कार्य करने लगता है।"

"और यह सेवा क्या है?"
"जब तुम बिना किसी लालच के किसी के लिए कोई कर्म प्रतिबद्धता से करते हो, वही सेवा है। वास्तव में मनुष्य इस संसार में सेवा के लिए ही आता है। प्रत्येक मनुष्य का सेवा का दायरा भिन्न है।"
"वो कैसे?"
"जब हम अपने कर्तव्य को प्रतिबद्धता से, किसी अपेक्षा के बिना करते हैं,वही सेवा हो जाती है।"      
"इस पृथ्वी पर सबको किसी न किसी उत्तरदायित्व  के साथ प्रेषित किया गया है। बस, हमें वही उत्तरदायित्व पूर्ण करना है जो हमें देकर भेजा गया है।"
" मैं अपना उत्तरदायित्व पूर्ण नहीं कर सका।"
"कॉस्मॉस, फिर से याद आ गया। इसके लिए संकल्प का होना बहुत आवश्यक है। यदि संकल्प नहीं होता तब थोड़े श्रम के पश्चात ही शिथिलता आ जाती है। इससे मन में भी हीनता घर करने लगती है।संभवत: तुम्हारे साथ कुछ ऐसा ही हुआ होगा।"
क्षण भर रुककर प्रोफ़ेसर ने कहा, "मुझे लगता है तुम संभवत: इस पृथ्वी की हलचल को समझने के लिए ही भेजे गए हो जो परिस्थिति हो उसमें निराश होने के स्थान पर उसका पूरी शक्ति व उत्साह से सामना करना आवश्यक है।" 
कॉस्मॉस का मन मयूर की भाँति नृत्य करना चाहता था। कितनी सकारात्मकता से ओत -प्रोत हो रहा था वह! उसके असंवेदन आकार में संवेदनाएं हिंडोले पर चढ़कर झूमने लगी थीं। उसने अब तक कई संवेदनाओं को महसूस किया था। अब उसे वे भीतर से आलोकित कर रही थीं।   
     

6
अचानक फोन की घंटी से प्रो. विद्य की साधना भंग हुई। जो उन्होंने सुना, उससे कुछ विचलित हुए।                      
"क्या  मैं आपकी उद्विग्नता का कारण जान सकता हूँ?" कॉस्मॉस जैसे गहन निद्रा से जागा था। वह प्रोफ़ेसर के मुख से निर्झरित शब्दों की प्रेम-गंगा में डुबकी लगा रहा था। 
"हूँ" एक निश्वांस लेकर प्रो बोले, "मेरे मित्र गौड़ को अचानक ह्रदय का दौरा पड़ा है। उनकी स्थिति ठीक नहीं है। मुझे जाना होगा।"
"वही मंत्री जी, जिनके पास मैं सर्वप्रथम गया था? वैसे ह्रदय का दौरा पड़ने का अर्थ यह है कि उनका अंतिम समय आने वाला है?" कॉस्मॉस ने  भोलेपन से पूछा। 
"हो भी सकता है" प्रोफ़ेसर उद्विग्न लग रहे थे। 
"नहीं ,कैसे हो सकता है? मैं तो अभी दुबारा उनके पास गया भी नहीं!"
"वे ठीक भी हो सकते हैं अथवा उन्हें कोई अन्य कॉस्मॉस ले जा सकता है!"
"उन्होंने मुझसे प्रतिज्ञा की थी, वे मेरे साथ चलेंगे फिर कैसे जा सकते हैं? मैंने भी उनसे एक प्रतिज्ञा की थी। मुझे भी वह पूरी करनी है। वे और किसी के साथ इस प्रकार नहीं जा सकते! मुझे भी वहाँ जाना होगा।" कॉस्मॉस ने अपने व मंत्री जी के मध्य हुआ वार्तालाप सारांश में प्रोफ़ेसर साहब को बता दिया।

गैराज से गाड़ी निकालते हुए प्रोफ़ेसर असहज  थे। उनका सारा आनंद सूचना सुनते ही क्षण भर में काफ़ूर हो गया था। 
"आप इतने विद्वान हैं, जीवन की वास्तविकता से परिचित हैं। क्या आपको भी इस  प्रकार की सूचना से आघात लगता है?" न जाने कब कॉस्मॉस गाड़ी में आकर बैठ गया था। 
"तुम?"
"मुझे भी तो अपनी प्रतिज्ञा पूरी करनी होगी।"
"लेकिन तुम अपनी अदृश्य शक्ति से मुझसे भी शीघ्र पहुँच सकते हो।"
"इतनी देर और आपका साथ बना रहेगा। आपसे कुछ और ज्ञान प्राप्त हो सकेगा।"                
" कॉस्मॉस! मैं धरती के निवासियों के लिए कुछ संदेश छोड़कर जाना चाहता हूँ। मुझे अच्छा लग रहा है कि तुम मेरे इस चिंतन से जुड़ना चाहते हो परन्तु मैं सशंकित हूँ कि यह चिंतन तुम्हारे लिए उपयोगी होगा अथवा नहीं?" कार चलाते हुए प्रोफेसर बोले। "जब आप आवागमन के सत्य से परिचित हैं, स्वीकारते हैं तब भी आप इस सूचना से इतने अधिक बैचैन हो उठे। फिर इस स्थिति में एक साधारण मनुष्य की क्या स्थिति होगी?"
"मैंने तुम्हें बताया था न यह संवेदनाओं की बात है। इनसे मनुष्य बिलकुल अछूता तो नहीं रह पाता। यह श्मशान वैराग्य तो होता ही है।समय बीतते शनैःशनैः पुन: मनुष्य अपनी सामान्य स्थिति पर आ जाता है।"   
 
कुछ ही देर में कार मंत्री सत्यप्रिय के बंगले के बाहर जाकर रुकी। मार्ग में कुछ अधिक वार्तालाप नहीं हो सका था। मंत्री जी के बंगले के बाहर चिकित्सकों की व अन्य कई लोगों की गाड़ियाँ खडी थीं। काफी लोग जमा थे और उनके स्वास्थ्य के बारे में चर्चा कर रहे थे। प्रोफेसर विद्य को देखते ही वहाँ उपस्थित लोगों ने उन्हें आदर सहित भीतर जाने दिया था। वे मंत्री जी के कुछेक उन चुनिंदा लोगों में थे, जिनसे वहाँ के अधिकांश लोग परिचित थे। कॉस्मॉस को अपने छद्म रूप में ही जाना था। अत: दोनों के मार्ग भिन्न थे किंतु लक्ष्य व उद्देश्य एक!
दो -तीन चिकित्सक मंत्री जी के पास थे। दाहिनी ओर के एक और कमरे में देश के और भी कई प्रतिष्ठित सर्जन उनके ह्रदय-रोग के बारे में चर्चा कर रहे थे। उन्हें अस्पताल ले जाने की पूरी तैयारी थी किन्तु उन्होंने हाथ से इशारा करके प्रोफेसर से मिलने की इच्छा प्रगट की थी अत: तुरंत ही उनके पास सूचना पहुंचा दी गई थी। अंदर पहुँचने पर जैसे ही प्रोफ़ेसर ने मंत्री जी के सिर पर अपनत्व भरा हाथ रखा, उन्होंने तुरंत ऑंखें खोल दीं। पास खड़े  चिकित्सक आश्चर्यचकित रह गए। वे लगभग घंटे भर से उनकी आँखें खुलने की प्रतीक्षा कर रहे थे। प्रोफ़ेसर को देखकर मंत्री जी ने सबको बाहर जाने का इशारा किया। उनकी आँखों में एक चमक थी, अनुभव की चमक! दुनिया से दूर जाने की चमक! उल्लास की चमक! कॉस्मॉस स्वयं को रोक नहीं पाया, वह सामने आकर प्रणाम की मुद्रा में खड़ा हो गया।
  
"तुम आ गए?" मंत्री जी के मुख से निकला और उन्होंने प्रोफेसर की ओर देखा। 
"ठीक समझ रहे हो, यह मेरे साथ ही आया है।" 
"मैंने कहा था.." मंत्री जी की साँसें उखड़ रही थीं। 
"चिंता न करो मित्र। इसने मुझे परेशान नहीं किया। इसके साथ मैंने बहुत अच्छा समय व्यतीत किया, जिसे आप लोग 'क्वालिटी टाईम'  कहते हैं।" 
"मेरा यहाँ का समय व कार्य पूरा हो गया है। अब तुम्हारी प्रतिज्ञा पूरी करने का समय आ गया है।" उन्होंने कॉस्मॉस की ओर देखकर कहा। 
"मित्र! क्या सारी तैयारी कर ली हैं?" प्रोफेसर गंभीर थे। 
"मुझे लगता है, मैं अब तत्पर हूँ लेकिन मेरे बेटे मेरे पार्थिव शरीर को  तब तक नहीं ले जाने देंगे जब तक बिटिया भक्ति यहाँ नहीं पहुँच जाती।"
"हूँ....उसे समय लगेगा लेकिन ठीक तो है। क्या वह अंतिम बार तुम्हें देखना नहीं चाहेगी?" उन्होंने मंत्री जी का हाथ हौले से थपथपाया। 
"तुम अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए तैयार हो? मुझे अब किसी समय-यंत्र की आवश्यकता नहीं है।" मंत्री जी सहजता से बोल रहे थे।
 
कॉस्मॉस में जो परिवर्तन हो चुके थे और शनैः शनैः हो रहे थे। उनसे वह अवाक भी था और असमंजस में भी। क्या धरती पर मृत्यु इतनी सहज भी होती है? उसने ऐसे समय में बहुत से लोगों को चीखते-चिल्लाते, ज़ोर-ज़ोर से चीखें मारकर रोते देखा व सुना था। मंत्री जी के साथ उसने जितना भी समय बिताया था, उसमें ही वह उनसे प्रभावित हो गया था और उसे महसूस हुआ था कि उस ‘ढोंगी’ स्वामी के अतिरिक्त वह जितने लोगों से भी मिला है। इस दुनिया में उन सबकी कितनी आवश्यकता है! कितने महत्वपूर्ण हैं ये सभी! उसे ज्ञात नहीं था कि उसके स्वामी यमदूत उसके साथ क्या करने वाले हैं। क्या दंड प्राप्त होगा उसे? वह उन बदलावों को समझ पा रहा था जो उसके भीतर होते जा रहे थे किन्तु उनसे छुटकारा प्राप्त करने का कोई मार्ग नहीं सोच पा रहा था मानो उस पर किसी ने कोई जादू कर दिया था।   
 
प्रोफ़ेसर श्रेष्ठी कॉस्मॉस की मानसिक अवस्था से परिचित थे। वे परिस्थिति समझ रहे थे। सत्यव्रत इंसान के रूप में एक अच्छा समाजसेवी, उनका परमप्रिय मित्र, लोकहितार्थ कार्यों में मग्न रहने वाला एक सच्चा व्यक्ति था जो अपने कार्यों को पूर्ण करके यहाँ से लौटने के लिए तत्पर था। सत्यव्रत का दुनिया छोड़ने का समय आ गया था जो सुनिश्चित था। उनके अधूरे कार्य पूर्ण हो चुके थे और कॉस्मॉस दुनिया के प्रति आकर्षण के कारण अपनी शक्ति क्षीण करता जा रहा था। 
"क्या तुम मंत्री जी को दिया हुआ वचन पूरा कर सकोगे?"
"मुझे लगता है संभवत: नहीं। मेरी स्वामी द्वारा प्रदत्त शक्तियाँ क्षीण हो रही हैं। अब मुझमें वह शक्ति नहीं जो उस समय थी जब मैंने मंत्री महोदय को वचन दिया था।" वह शर्मिंदा था, उसके नेत्रों से अश्रु छलकने लगे थे।
"तो मेरी अंतिम इच्छा पूरी नहीं हो सकेगी?" मंत्री जी के मुख से अस्फुट शब्द निकले, वे उदास हो उठे।
"संभवत: कुछ देर के लिए इनकी श्वांस रोक सकता हूँ चिकित्सक जाँच करके मंत्री जी की मृत्यु के बारे में घोषणा कर देंगे किन्तु अभी ये अपने शरीर व आत्मा से केवल विलग होंगे और आत्मा के नेत्रों से वह सब देख सकेंगे जो इनकी इच्छा है।"
 
कॉस्मॉस पृथ्वी पर होने वाली चालाकी भी सीख गया था। प्रोफेसर मुस्कुराए और उन्होंने अपने मित्र के मस्तक पर एक स्नेह-चुंबन अंकित कर धीमे से एक बार गले लगा लिया। यह उनकी अंतिम मुलाकात थी। चिकित्सकों ने मंत्री जी को मृत घोषित कर दिया। मंत्री जी के सुपुत्र पहले ही से उपस्थित थे। पिता के न रहने की सूचना जानकर उनकी ऑंखें अश्रु-पूरित हो गईं लेकिन मनों में जायदाद के बँटवारे की योजना प्रारंभ हो गई थी। बहन भक्ति के पहुँचने की प्रतीक्षा करनी ही थी। मंत्री जी अपने कमरे से निकलकर आत्मा के स्वरूप में कॉस्मॉस के साथ अपने आँगन के वृक्ष पर जा बैठे। वे दोनों केवल प्रोफेसर के ज्ञान-चक्षुओं को दिखाई दे रहे थे। डॉ. श्रेष्ठी नीचे अन्य लोगों के साथ बैठे थे। मंत्री जी के दोनों पुत्र पिता की अंतिम यात्रा की तैयारी में संलग्न थे। अचानक उनके कानों में उनके  स्वर सीसे से घुल गए, "अभी तो मैं अंदर ही हूँ। मेरा पार्थिव शरीर अभी पाँच तत्वों में विलीन भी नहीं हुआ। कुछ दिनों बाद बँटवारे की चिंता कर लेना।" दोनों पुत्र चौंक उठे, कुछ घबरा से भी गए। एक शर्मिंदगी का सा भाव उनके मुख पर छलक उठा लेकिन वे कुछ समझ न पाए कि उनके मृत पिता किस प्रकार उनके कान में यह बात कह सकते हैं!
"कॉस्मॉस! देखा? धरती पर मनुष्य कुछ देर के लिए भी भौतिक साधनों के आकर्षण से नहीं बचा रह पाता।" 
"यह सत्य है लेकिन मैंने जो ज्ञान प्रोफ़ेसर से प्राप्त किया है। उसके अनुसार यदि मनुष्य जागृत रह सके तो अपने ऊपर नियंत्रण भी रख सकता है।"
"यही तो परेशानी है कॉस्मॉस। मनुष्य पृथ्वी पर आते ही भूल-भुलैया में पड़ जाता है।" मंत्री जी कॉस्मॉस के साथ वृक्ष पर बैठे हुए पूरे वातावरण का जायज़ा लेकर आन्दित हो रहे थे।
मंत्री सत्यव्रत जी के पार्थिव शरीर को बड़े कमरे में दर्शनों के लिए रखवा दिया गया था। रेशमी चादर पर पुष्प बिछाए गए थे। उस पर मंत्री जी स्वयं को लेटे हुए देख रहे थे।                                           
 
"कितना अद्भुत होता है इस प्रकार से स्वयं को देखना! लेकिन जब हम शरीर में होते हुए भी स्वयं को उससे भिन्न देख पाते हैं तब हमारे लिए इस स्थिति की कल्पना आसान हो जाती है।" उनके मुख से निकला।
"क्या तुम जानते हो कि पूर्व-काल में पृथ्वी पर यौगिक बल द्वारा प्राणों का त्याग किया जा सकता था एवं वे योगी अपने योग से स्वयं को आत्मा से विलग होते हुए देख सकते थे, महसूस कर सकते थे। लेकिन यह विद्या कुछ ही योगियों के पास थी।" मंत्री जी ने कहा।   
"आज आप देख पा रहे हैं, महसूस कर पा रहे हैं। आप भी योगी बन गए।" कॉस्मॉस ने मंत्री जी से चुहल की।    
"नहीं कॉस्मॉस, यह तुम्हारे कारण संभव हुआ है। मैं कहाँ का योगी हूँ।इसके लिए तुम धन्यवाद के पात्र हो, देह त्याग के पश्चात यही मेरी इच्छा थी।"   
"और यह भी कि आपकी अनुपस्थिति में लोग आपके बारे में क्या सोचते हैं, आप यही देखना चाहते थे न?" कॉस्मॉस यह सब पहली बार देख रहा था। मंत्री सत्यव्रत जी मुस्कुरा उठे।

 
जन्मते समय सब रोते हुए आते हैं किन्तु जब कोई हँसता हुआ जीवन से प्रयाण करता है, उसका जीवन सफल हो जाता है। वह जीवन की वास्तविकता को स्वीकार चुका होता है तथा आवागमन को सहजता से स्वीकार करता है जो बहुत कम लोग कर पाते हैं, केवल वे ही जो जागृत होते हैं। सत्यव्रत को अपनी दिवंगत पत्नी स्वाति की स्मृति हो आई, जिसने उन्हें जीवन की वास्तविकता से परिचित करवाया 
था। उनके चेहरे पर अपनी प्रिय पत्नी स्वाति की स्मृति से एक शांत मुस्कुराहट फ़ैल गई।        
सत्यव्रत देख रहे थे, उनके बंगले के बाहर कितने झुण्ड एकत्रित हो गए थे जिनमें भाँति-भाँति के लोग सम्मिलित थे। कुछ लोग मंत्री जी के न रहने की सूचना से वास्तव में दुखी थे जिनमें अधिकांशत: स्त्रियाँ व बच्चे थे जिनके लिए मंत्री जी ने कई संस्थाओं की  स्थापना की थी। सत्यव्रत को उनके नेत्रों में आँसू दिखाई दिए।
एक झुण्ड में ऐसे भी लोग थे जो वैसे तो मंत्री को अंतिम विदाई देने आए थे किन्तु उनके चेहरे पर एक सुकून पसरा हुआ दिखाई दे रहा था। अपने कलफ लगे धवल चमकीले कुर्ते-पायजामों में उनके चेहरे भी अपने वस्त्रों की भाँति कड़क अभिमान युक्त प्रदर्शित हो रहे थे। अपने चेहरे पर दर्प के कलफ़ से सपाट चेहरे जैसी कलफ़ लगी चुन्नटों वाली कुर्ते की आस्तीनों को ऊपर चढ़ाते हुए वे वार्तालाप कर रहे थे, "चलो, एक काँटा तो निकला। जब देखो समाज में बिखरी गरीबी की दुहाई देता रहता था।"
"हाँ, हम व्यापार करते हैं, सदाबरत के लिए धन और लोग थोड़े ही पाल रखे हैं! जब देखो किसी न किसी संस्था को दान लेने के लिए भेज देते थे। मंत्री जी को मना भी कैसे किया जाए?"
" हूँ...अगर उन्हें कुछ दे-दुआकर छुट्टी हो जाती तो बात भी समझ में आती लेकिन हमारे यहाँ मंगते लोगों और मंगती संस्थाओं की कोई कमी है क्या?" दूसरे ने नाक-भौं सिकोड़ते  हुए मन में भरा गुबार निकाला।
 
अलग-अलग विचार, अलग-अलग मुख! अलग-अलग बातें! संस्थाओं के लोग इसलिए दुखी थे कि उनसे करुणा व सहानुभूति रखने वाला मसीहा चला गया था। पंडाल लगाने वाले,फूल वाले, स्मारक बनाने वाले सभी का मजमा लगा हुआ था।
मंत्री सत्यव्रत जी की इतनी साख थी, इतना सम्मान था किन्तु सभी उपस्थित लोगों के मन में विभिन्न विचारों के झंझावात! कुछ स्वार्थी लोग उनकी मृत्यु पर भी मुनाफा ढूँढ़ रहे थे। राजनीति से जुड़े हुए कुछ लोग अपने प्रिय मार्ग-दर्शक की अंतिम यात्रा में शामिल होने आए थे लेकिन बेटी भक्ति के आने पर ही यह यात्रा होगी, जानकर अपने प्रिय नेता के दर्शन करके वापिस लौट रहे थे। भीड़ छँटनी आरंभ हो गई। लोग यह कहते हुए लौटने लगे थे कि मंत्री जी की अंतिम यात्रा में दुबारा आ जाएंगे। विभिन्न मीडिया वहाँ अंगद के पाँव जमाए हुए थे। विभिन्न चैनलों से जुड़े पत्रकार सीधा प्रसारण कर रहे थे। प्रत्येक चैनल इस जल्दी में था कि वह सबसे पहले अपने चैनल पर समाचार प्रेषित कर सके। कभी बाहर के वृक्ष पर चढ़कर कैमरे घुमा-घुमाकर मंत्री जी की  पार्थिव देह को विभिन्न 'ऐंगल्स' से दिखाया जाता तो कभी पूरी मुस्तैदी से तैनात पुलिस की आँखें चुराकर किसी खिड़की अथवा रोशनदान पर कैमरा चिपका दिया जाता तो कभी बंगले के बाहर की ऊँची चाहरदीवारी के बाहर से उचक-उचककर, विभिन्न अखबारों से जुड़े पत्रकार, कंधे पर कैमरे लटकाए फोटोग्राफर्स पूरी रात भर मंत्री जी से जुड़ी सूचना लेने का प्रयत्न करते रहे थे।
 
मंत्री जी कॉस्मॉस के साथ वृक्ष पर बैठकर अपनी मृत्यु का तमाशा देखकर अपने बीते दिनों में पत्नी स्वाति के पास पहुँच गए थे। वे अपने पुत्रों के बारे में भी सोचते रहे थे। काश! मेरे बेटों को भी उनकी माँ स्वाति जैसी समझदार जीवन-साथी मिल सकती!  
बिटिया भक्ति में माँ की  समझदारी व गुण सहज रूप से आए थे। मनुष्य-जीवन प्राप्त हुआ है तो मनुष्य की सेवा मनुष्य का धर्म है। आज की परिस्थितियों में जागृत मनुष्य के कुछ कर्तव्य बनते हैं। वह केवल अपने जीवन को ही अपना लक्ष्य समक्ष रखकर नहीं चल सकता। समाज के प्रति जागरूकता उसका दायित्व है। भक्ति स्वामी विवेकानंद के विचारों से बहुत प्रभावित थी। वह प्रो.श्रेष्ठी की छात्रा थी, भारतीय-दर्शन की पुरज़ोर हिमायती! वह कहती, "गांधी को हमने नोट पर छापकर अदृश्य सूली पर लटका दिया है। कहाँ है सादगी, सरलता!उनके विचार! पल-पल गांधीवाद का गला घोंटा जा रहा है। यदि कुछ लोग उनके निर्णयों से अप्रसन्न भी हैं तब भी सादगी,सरलता, सहजता के मापदंड के लिए वे कौनसा पैमाना लायेंगे? मैं उनकी राजनैतिक स्थिति के बारे में कुछ नहीं कहना चाहती। मैं उस गांधी का चित्र प्रस्तुत करना चाहती हूँ जिसने दूसरों के प्रति करुणा सिखाई, दूसरों की बेचारगी से जो पीड़ित हुए।"
 
मंत्री जी का चोला रेशमी चादर पर पुष्पों से ढका था। पूरी रात चहलकदमी रही और वे अपने बेटों की खुसफुसाहट सुन रहे थे जिन्हें भय था कि कहीं पिता के न रहने पर भक्ति अपने भाग के जायदाद की मांग न कर बैठे। मंत्री सत्यव्रत केवल एक मंत्री नहीं थे, वरन उच्च धनाढ्य परिवार के एकमात्र वारिस भी थे जो उनके पुत्रों के विचार में अपनी दौलत बेसहारा तथा ज़रूरतमंद लोगों पर लुटाने की मूर्खता करते रहे थे, जिससे दोनों पुत्रों का सदा अपने पिता से छत्तीस का आँकड़ा रहा था।
"परेशानी तो यह है कॉस्मॉस कि जब हम दूसरे के विचारों से बिना सोचे-समझे प्रभावित होते हैं तब न केवल हम दुखी होते हैं वरन अपने से जुड़े सबको प्रताड़ित करते हैं।" इस चोले को त्याग करने की बेला में भी मंत्री जी का अप्रसन्न रहना कॉस्मॉस को पीड़ित कर रहा था किन्तु वह उनकी बात पूरी तरह से समझ नहीं पा रहा था।
"महोदय! वैसे तो आप स्वयं अपनी देह त्याग के लिए तत्पर हो गए हैं, आपके अनुसार आपके सभी महत्वपूर्ण कार्य पूर्ण हो चुके हैं फिर भी आपके मुख पर मैं एक अजीब सी बैचैनी महसूस कर रहा हूँ।" 
"तुम मेरी बैचैनी को ठीक भाँपे हो कॉस्मॉस! तुम्हारी संवेदनशीलता बढ़ती जा रही है। मैं अब तक अपने बेटों के लिए कुछ नहीं कर पाया। इन्हें अच्छाई-बुराई की तहज़ीब नहीं सिखा पाया, बस उनके लिए ही थोड़ी सी कसक मन में रह गई है। मैं जानता हूँ इस समय यह सोच व्यर्थ है किन्तु अभी भी इस नश्वर संसार में हूँ न, सो मन न चाहने पर भी कभी उद्विग्न हो जाता है।" 

 
सत्यव्रत जी कॉस्मॉस से इन्हीं सब बातों की चर्चा करते रहे व बीच में कई बार भीतर जाकर मित्र प्रोफेसर के गले मिल आए। बेटों के भीतर चलती गुपचुप मंत्रणा से परिचित थे ही। अंत में समय पर भक्ति की गाड़ी बंगले के अहाते में प्रविष्ट हुई। उसने ड्राईवर के दरवाज़ा खोलने की प्रतीक्षा किए बिना गाड़ी का दरवाज़ा खोला और अंदर भागी। बीच में खड़े लोगों ने उसे मार्ग दे दिया था। वह किसी की ओर देखे बिना पिता की निश्चेष्ट देह से चिपट गई। 
'अरे! मंत्री जी अचानक कहाँ चले गए?" कॉस्मॉस ने चौंककर देखा और उसके चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई। 


_______________ क्रमशः __________
 

 


- डॉ. प्रणव भारती