प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जुलाई 2019
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ज़रा सोचिए

भावनात्मक स्पर्श
- प्रगति गुप्ता


आज मेरी मुलाक़ात एक अरसे बाद अपनी बचपन की मित्र लेखा से हुई। सुना था कि उसकी शादी एक बहुत ही धनाढ्य परिवार में हुई थी। उसके विवाह का निमंत्रण मुझे मिला था पर मेरा विवाह उससे पहले हो जाने से सुसराल में अपनी ज़िम्मेदारियों की वज़ह से मैं उसके विवाह में जा नहीं सकी थी। फिर अपने-अपने परिवारों में हमारी व्यस्तताओं के चलते काफ़ी समय से एक गैप हो गया था सो अचानक ही आज एयरपोर्ट पर उसको देख; मुझे बेहद अच्छा लगा।

"क्यों विभा, तुम कहाँ जा रही हो?" लेखा ने पूछा।
"लेखा! मेरे काव्य संकलन का विमोचन था, उसी की वज़ह से दिल्ली आना हुआ। फिर मेरी बेटियाँ भी यही हैं तो उनके पास कुछ दिन बिताकर वापस लौट जाऊँगी।" मैंने लेखा को जवाब दिया।
"विभा! तू शुरू से ही बहुप्रतिभामुखी थी। तेरे को कौन नही जानता था। हमेशा क्लास मॉनिटर रही फिर कैबिनट में रही। कॉलेज में भी तेरी पोजीशन आई। स्कूल हो या कॉलेज, कभी भी तेरे बग़ैर स्टेज पर कुछ हुआ हो, याद नहीं आता। लेखन भी तो तेरे ही व्यक्तित्व का हमेशा हिस्सा रहा। हम तो जब भी तेरी बातें करते हैं तेरी कितनी ही बातें और तेरा सौम्य व्यवहार हम सबको याद आता है।" लेखा ने मुझसे मिलने पर एक बार जो कहना शुरू किया तो रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी।
"विभा तुझे याद है, क्लास की टीचर तक तुझ पर कितना भरोसा करती थी। किसी भी चैरिटी के लिए रुपया जमा करना होता तो भी तुझे ही सौंप देती और तू चुपचाप से टीचर्स के काम भी करती और अब मैंने सुना है कि तू लोगों की परेशानियों में समझाइश का काम भी करती है।"
"विभा! तुझे याद है एक बार गिरने से मेरे हाथ में चोट लग गई थी। तूने कितनी मदद की थी मेरी। जाने कितनी ही बार मेरा होमवर्क और क्लासवर्क तू करवाती रही। मुझे तो अक्सर ही तेरी बहुत याद आती थी पर तेरा संपर्क न होने की वजह से तुझसे बात नहीं हो पायी।" लेखा कितना कुछ एक ही साँस में मुझे सुना देना चाहती थी। सच बात तो यह है कि उस समय मोबाइल तो होते नहीं थे और लैंडलाइन नंबर बदल जाने से संपर्क ही कहाँ हो पाता था। आज की तरह फेसबुक भी हमारे समय में नहीं था तो अधिकतर हम जैसे पचास की उम्र से ऊपर के लोग इसको इतना इस्तेमाल भी नहीं करते थे, सो इतने दिनों बाद स्कूल की मित्र का मिलना ईश्वर के द्वारा निमित्त किया हुआ एक संयोग ही कहा जा सकता था।


"अरे साँस तो ले-ले लेखा। अभी मेरी फ्लाइट में समय है। मेरे लिए ही बोलती रहेगी या अपना भी कुछ बताएगी। आजकल कहाँ है तू? कैसी है तू? कितने बच्चे हैं तेरे? और भी बहुत कुछ जो तू बता सके अपने बारे में, मुझे भी बता।" मैंने लेखा से कहा।
"विभा! एक बात कहूँ, तुझे देखकर मुझे न जाने क्यों मेरी उस चोट का ख़याल आया, जब तू मेरे साथ थी। बहुधा अन्तरंग मित्रों से मिलने पर सबसे पहले वो चोटें याद आती हैं, जिन पर मरहम लगाने में मित्रों की भूमिका स्मृतियों में हमेशा विद्यमान रहती है।
"विभा! तुझे पता है जिस दिन तू स्कूल नहीं आती थी, मुझे स्कूल अच्छा नहीं लगता था। पता नहीं तेरे से कैसा आत्मिक सम्बन्ध था।” आज जब लेखा उस बात को याद कर रही थी तब भी उसकी आँखों की नमी उमड़ आई थी।
"लेखा, तू ठीक है न? ख़ुश तो है?" मैंने लेखा से पूछा।
"हाँ विभा, ऐसे तो मैं ठीक हूँ। तुझे पता है मेरा विवाह बहुत ही पैसे वाले घर में हुआ है। मेरे घर में रहने वाले परिवार के सदस्य कम और नौकरों की फ़ौज ज़्यादा है। सवेरे से लेकर रात तक काम के लिए आवाज़ लगाने भर की देरी रहती है, सभी चीज़े हाथों में थमाई जाती है। पर कुछ है विभा जिसकी वजह से मैं बहुत खुश नही हूँ। इतने साल गुज़र गये पर कुछ है जो रीता है।" बोलकर लेखा चुप हो गई।


"शुरू कर लेखा मुझे अपने बारे में बता ना, शायद मैं तेरे कुछ काम आ सकूँ। हालांकि यहाँ वक़्त कम है फिर भी बता तो सही। हम बाक़ी फ़ोन पर अपनी बात जारी रखेंगे। मुझे एक लंबे समय बाद तुझे देखकर दिल से बहुत अच्छा लगा है। वैसे भी स्कूली मित्र एक अलग असीम-सा आभास देते हैं। जो मुझे महसूस हो रहा है।" लेखा से अपनी बात कहकर मैं उसको सुनने के लिए उसकी बातों का इंतज़ार करने लगी।
"विभा! तुझे तो पता ही है। मेरे पापा और मम्मी कॉलेज में पढ़ाते थे। उन्होंने हमको खूब पढ़ाया, समर्थ बनाया और अच्छे परिवारों को देख हमारा विवाह किया। किस्मत की बात है कि मेरा विवाह बहुत पैसे वाले परिवार में हुआ पर ससुराल का माहौल मेरे परिवार से बहुत अलग था। हर बात हर चीज़ का आकलन रुपयों-पैसों में। हालांकि मुझे नहीं कहना चाहिए यह सब क्योंकि मैं भी अब इस परिवार का हिस्सा हूँ पर मुझे यहाँ लोगों की आँखों में भाव नहीं रुपयों की नाप-तौल ज़्यादा नज़र आती है। बहुत कोशिश करती हूँ, सबको बहुत कुछ भावों से देने की उनको महसूस करवाने की पर कभी-कभी ख़ुद ही हँसी का पात्र बन जाती हूँ। चूंकि सुसराल में रुपया बहुत था तो मुझे बहुत पढ़ी-लिखी होने के बावजूद नौकरी नहीं करने दी गयी। बस मेरे पति मुझे अक्सर ही कहा करते थे कि महारानी हो घर की, बस हुक़ूमत करो और हुकुम चलाओ। मुझे तुम ऐसे ही बहुत अच्छी लगती हो। शुरू-शुरू में तो मुझे इतना महसूस नहीं हुआ विभा क्योंकि बच्चे छोटे थे, उनके साथ समय निकल जाता था पर अठारह-उन्नीस साल गुजरने के बाद जैसे ही बच्चे बड़े हुए तो मेरे न चाहते हुए भी घर के ही माहौल के जैसे मेरे बच्चे बड़े होने लगे। तब मेरा मन बहुत उदास होने लगा। बहुत कोशिश करती कि मेरे बेटे रुपयों-पैसों को कमाने के अलावा भी बहुत कुछ सीखें पर मुझे लगता है मैं जैसा चाहती थी वैसा नहीं कर पायी। भावों के बिना विभा तुमको नहीं लगता जीवन बगैर साँसों का सा लगता है।" लेखा बोलकर चुप हो गई।


अब मैं लेखा की बातों को सोचूँ तो मुझे उसकी बातें बहुत छू रही थीं। आज इंसान रुपया कमाने या ऊँचाइयों पर चढ़ने की होड़ में या दौड़ में इस क़दर मशगूल है कि भावों से ख़ुद को ही नहीं, साथ चलने वालों को भी तोड़ रहा है। बड़े-बड़े व्यापारिक परिवारों में रुपयों-पैसों के फेर में जब लेखा जैसी पढ़ी-लिखी औरतों को जीवन गुज़ारना होता है तो अन्तर्द्वंद कुछ ज़्यादा ही ऐसे व्यक्तित्व को घेरते हैं। जब बचपन से बड़े होने तक माँ-बाबा के साथ सिर्फ भावों को ही महसूसा हो तो कितनी भी शान-शौकत में इंसान रह ले, उसको भावों की कमी बहुत कचोटती है। यही शायद लेखा की उदासी का सबसे बड़ा कारण भी था। नौकर-चाकर ज़रूरतों के साथी होते हैं, आपके अन्तः के भागीदार नहीं।

"विभा! मुझे बहुत अच्छा लगता अगर मैं अपने पति और बच्चों को ख़ुद खाना बनाकर परोसती और उनके चेहरे पर आए भावों को पढ़ती। अपने बच्चों को ख़ुद घुमाने ले जाऊँ और भी बहुत कुछ वो करूँ जिससे परिवार के सभी लोगों के बीच विशिष्ट भावनात्मक रिश्ता बने। पर विभा जैसा मैं सोचती थी, वैसा नहीं होने से मेरे लिए अवसाद का कारण बन रहा था।
"विभा, ऐसा नहीं है कि मेरे बच्चे भावों से अनभिज्ञ हैं, उनको बहुत कुछ समझ आता है पर जब भी अपने भावों को किसी के भी प्रति प्रकट करने का समय आता है परिवार के माहौल के जैसे वो दोनों ही अपने आपको संकुचित कर, प्रकट करना अपनी हीनता मान लेते हैं, जो कि मुझे बहुत आहत करता है। मेरे पति के हिसाब से भावों को प्रकट करना दूसरों के सामने ख़ुद को कमज़ोर करना होता है। मेरे पति के हिसाब से भावनात्मक इंसान सफल व्यापारी नहीं बन सकता। अगर मैं उनकी बातों में कुछ हस्तक्षेप करती हूँ तो कलह होता है। बस विभा यही सब कुछ मुझे इतना कचोटता है कि मुझे स्वयं से वितृष्णा होने लगती है कि मेरे इतने पढ़े-लिखे होने का क्या फ़ायदा हुआ जबकि मैं बच्चों को भावों से नहीं जोड़ पायी और विभा जानती हूँ मैं, बहुत अच्छे-से मुझे मेरी हार स्वीकार्य नहीं हो रही है तभी शायद अवसाद मुझे घेरे रहता है और मुझे मेडिसिन भी लेनी पड़ती है।" लेखा इतना कुछ बोलकर अब चुप हो गई थी।


कैसी स्थिति है एक स्त्री की जो भावों से लबालब है, शिक्षित है, बच्चों को भावनात्मक रूप से बहुत कुछ देना चाहती है, सिखाना चाहती है पर अति सम्पनता, जहाँ नौकर-चाकरों से सभी काम करवाना और रुपयों-पैसों से सभी बातों की नाप-तौल करना ही वैभव का आँकलन माना जाता है। कितना मुश्किल रहा होगा लेखा के लिए यह मुझे दिल से महसूस हो रहा था। शायद उसका इस तरह अवसाद की गिरफ्त में आना, मेरे दिल को कचोट रहा था। इतना रुपया होने पर भी रुपया उसके सिर चढ़कर नहीं बोल रहा था बल्कि वो तो अपने प्रयत्नों की हार से परेशान थी। दूसरी ओर आज की स्थिति-परिस्थितियों का जब हम आँकलन करते हैं- महिलाएँ काम ही नहीं करना चाहतीं। उनके लिए नौकरों से काम करवाना स्टेटस सिंबल है। कोई भावों में जीकर ख़ुश रहना चाहता है और कोई भावों के भाव ही नहीं समझना चाहता।

"लेखा, मुझे नहीं पता था तुम इतनी ज़्यादा संवेदनशील हो। कितना कुछ तुमने मेरा भी अपनी स्मृतियों में सहेज कर रख छोड़ा है। इससे पता लगता है कि तुम भूलती किसी को नहीं हो। बहुत प्यारी हो तुम और जैसा किसी भी एक अच्छे और प्यारे इंसान को होना चाहिए वैसी हो तुम। एक बात हमेशा ध्यान रखना हम सभी माताओं की अपने बच्चों को सिखाने की जिम्मेवारी एक निश्चित उम्र तक ही होती है। उसके बाद हर बच्चा अपने जीवन को किस तरह जीये, ख़ुद चयन करता है। जहाँ तक परिवार के माहौल की बात है कुछ हद तक हो सकता है तुम अपने हिसाब से उसे बदल पायी हो पर पुरानी परम्पराओं और सोच को बदलने में काफ़ी लम्बा समय लगता है। स्वयं को इस निरंतर चलने वाले सोच के चक्र से निकालने की कोशिश करो लेखा और एक वादा करो मुझसे हर ऱोज थोड़ी देर ज़रूर बात करोगी ताकि तुम अच्छा महसूस करो और तुमको किसी तरह कि दवाई कि ज़रूरत न पड़े।”

मेरी बातों को सुन; लेखा ने सहमति से सिर हिलाया। फ्लाइट का समय हो जाने से हम दोनों ने एक-दूजे से विदा ली। लेखा के जाने के बाद मेरे मन में इतनी उथल-पुथल हो रही थी कि एक संवदनशील व्यक्ति ग़लत न होते हुए भी किस तरह आहत हो सकता है। पैसा कमाने की हवस इंसान को धीरे-धीरे भावविहीन तो कर ही देती है, इसमें लिप्त व्यक्ति इतना मगन हो जाता है कि भावों और संवेदनाओ की पहुँच उस तक पहुँचती ही नहीं क्योंकि दिखावा करने के लिए रुपया बहुत काम आता है। बड़े मकान, नौकर-चाकर, गाड़ियाँ ऐसे व्यक्तियों की आत्मिक संतुष्टि से जुड़े होते है। ऐसा नहीं है कि भावों की भाषा इनको समझ नहीं आती क्योंकि ज़रूरत पड़ने पर ऐसे लोग भी भावों को ही खोजते हैं, पर भावों को प्रकट करना हेय समझते हैं। दूर से देखने पर सभी को यह लगता है कि इस व्यक्ति के पास इतना पैसा है तो इसको कष्ट क्या होगा। यह तो सबसे ज़्यादा सुखी व्यक्ति है। पर ऐसे घरों में लेखा जैसे शिक्षित संवेदनशील व्यक्ति भी होते हैं, जिनको सक्षम होते हुए भी अक्षम होने का अहसास होता है। ऐसे लोग मन ही मन बहुत टूटते हैं, जब अपने जायों को संस्कारित करते समय परिवार का माहौल उनको बहुत अपने-से भावात्मक स्पर्श देने में बाधक बनता है। जबकि जीवन को बहुत जीए-सा महसूस करने के लिए ऐसे ही भावों की आवश्यकता होती है। बेशक बहुत रुपया कमाया जाए पर रूपये की इमारत खड़ी करते समय भावों और संवेदनाओं का सीमेंट ज़रूर लगाया जाये ताकि इमारत बहुत मजबूत बने हर तरह से। भावों और संवेदनाओं को छोड़कर सिर्फ रुपया-पैसा व्यक्ति को ज़िन्दा नहीं रख सकता। सोचकर ज़रूर देखिये।


- प्रगति गुप्ता