प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जुलाई 2019
अंक -53

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम
लघुकथाएँ
 
गर्व
 
रवि अपने माता - पिता का लाड़ला बेटा था। सबसे अच्छी बात ये थी कि इस लाड़ प्यार के बावजूद उसके पांव जमीं पर ही थे। आज उनका  परिवार साधन - सम्पन्न था लेकिन  रवि ने अपने माता - पिता के साथ मुफलिसी का दौर भी देखा था। उसे पता था कि एक धनी परिवार की बेटी थी उसकी माँ.... पर उन्होंने पापा के एक कमरे के घर को भी अपने संतोषी स्वभाव और प्रेम से स्वर्ग बना दिया था। उन्होंने कभी पापा से कुछ नहीं मांगा। उनके इस समर्पण के कारण ही पापा अपना काम तनावमुक्त होकर कर पाए। आज जब पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर रवि की शादी को बातें हो रही थी, रवि असमंजस में था कि क्या उसकी भावी पत्नी उसके परिवार को दिल से अपना पाएगी। वो इसी सोच में था कि डोर बैल बजी। पापा मम्मी किसी शादी में गए हुए थे और अगले दिन आने वाले थे। रविवार का दिन था। शाम के 6 बजे थे। उसने दरवाजा खोला तो अपने सामने एक लड़की को पाया.... जिसकी उम्र लगभग 20 - 22 साल रही होगी। चेहरे पर मासूमियत लिए बोलती आंखों वाली वो लड़की कुछ हांफती हुई सी आई थी। उसे याद आया कि वो उनकी गली के कोने वाले घर में रहती थी अपनी माँ के साथ। वो कुछ पूछता इससे पहले ही वो बोल पड़ी कि "उनके पास  वाले घर में, जिसमें एक अंकल अकेले रहते हैं। दो दिन से कोई हलचल नहीं है, आप देखिए ना!"
 
रवि तुरन्त साथ हो लिया था उसके। दरवाजा तोड़ना पड़ा था। अंदर का दृश्य देखकर होश ही उड़ गए थे। अंकल आंगन पर औंधे पड़े थे। अपनी जान गंवा चुके थे। बाद में पता चला उन्हें अटैक आया था। वो लड़की रोए जा रही थी। वो कह रही थी कि  "अंकल का बेटा सिंगापुर  में नौकरी करता है और अंकल यहां अकेले रहते थे। उसे उनसे लगाव सा हो गया था। ऐसा लग रहा है कि जैसे परिवार का कोई सदस्य चला गया हो। उसने बताया कि उसने एक दो पड़ोसियों से कहा था कि वो अंकल को संभालें। पर दो दिन से दरवाजा ना खुलने के कारण शायद सबको उनकी मृत्यु का अंदाजा हो गया था। कोई पुलिस के लफ़ड़े में नहीं पड़ना चाहता था। आपने दरवाजा खोला और मदद की इसलिए आपका धन्यवाद।" रवि ने कहा " बिना किसी करीबी रिश्ते के आपने एक बुजुर्ग की परवाह की, उनके बारे में सोचा , आजकल ये कहाँ देखने को मिलता है।" 
 
 इस बात को कुछ दिन बीत गए थे। मम्मी पापा देखी हुई लड़कियों में से उसकी पसन्द के बारे में पूछ रहे थे। पर उसके दिलोदिमाग पर वो कोने के मकान वाली लड़की ही छाई थी। उसने माता - पिता को उस लड़की के बारे में बताया। लड़की उन्हें भी पसंद आ गई थी। बहुत ही सादगी से ये इंटरकास्ट मैरिज हो गई थी। रवि बहुत खुश था कि उसने एक ऐसी लड़की को जीवनसंगिनी बनाया था जो जड़ हो चुके समाज और शुष्क हो चुके रिश्तों को  स्नेह की शीतल धारा से सींचना चाहती थी। आज जब रवि अपने जीवन के संध्या काल में प्रवेश कर चुका है, अपने निर्णय और अपनी पत्नी दोनों पर उसे गर्व है।
 
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सज़ा
 
रश्मि की शादी एक संपन्न घराने में हुई थी। यहाँ तक कि उसने शादी से पहले अपने होने वाले पति को देखा भी नहीं था। नई नवेली दुल्हन रश्मि ने जब शादी की पहली रात को अपने पति का चेहरा पहली बार नज़र उठाकर देखा तो उसे अहसास हुआ कि उसकी सखियाँ यूँ ही उसकी किस्मत से ईर्ष्या नहीं कर रही थी। ये मुखड़ा तो उसके सपनों के राजकुमार की छवि को भी मात दे रहा था। अब तो उसे भी अपनी किस्मत पर नाज़ हो आया था। पति का स्वभाव और सौंदर्य मानो एक दूसरे से होड़ करते जान पड़ते थे। एक स्त्री को और क्या चाहिए भला? पति का बेशुमार प्यार पाकर उसका सौंदर्य और भी निखर गया था। सास तो उसके लिए जैसे मां का ही प्रतिरूप थी। अपनी बेटी की तरह प्यार करती थी वो उसे ....बस वो अक्सर एक बात कहा करती थी कि उसे पोता चाहिए। ईश्वर की कृपा से शादी के कुछ दिन बाद ही रश्मि को अहसास हुआ कि एक नई ज़िन्दगी उसके भीतर सांसे ले रही है। उसकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। पति और सास - ससुर भी बेसब्री से नए मेहमान का इन्तज़ार कर रहे थे। तीनों यही चाहते थे कि बेटा ही हो। रश्मि उनकी लड़के की चाहत को देखकर डर जाती थी कभी - कभी। उसने एक दिन पति से पूछ ही लिया कि उन्हें सिर्फ बेटा ही क्यो चाहिए? और अगर बेटी हो गई तो? इतना सुनते ही पति ने एक जोरदार तमाचा रश्मि के गाल पर मारा। रश्मि अवाक रह गई और आँसुओं की अविरल धार बह निकली।
 
पति कह गया था कि अगर बेटी हुई तो रश्मि को ये घर छोड़कर जाना होगा। रश्मि अब भी जानना चाहती थी कि बेटी से इतनी घृणा क्यों? जबकि उसकी सास स्वयं उसे अपनी बेटी की तरह प्यार करती है। पति जाते- जाते कह गया था कि उसे वक्त आने पर सब पता चल जायेगा। रश्मि ने अपने आँसुओं को पीया और फिर से अपनी आने वाली संतान के लिए सुनहरे सपने संजोने लगी।
अब वह दिन भी आ गया जब रश्मि की किस्मत का फैसला होना था। रश्मि ने सबकी उम्मीद के विपरीत एक बेटी को जन्म दिया बिल्कुल बर्फ़ सी सफेद , रूई सी नाज़ुक ....जैसे ही रश्मि को बेटी होने के बारे में पता चला उसका दिल ममता से भर उठा। पर अगले ही पल उसे पति की बात याद आ गई। उसे अब भी उम्मीद थी कि बच्ची को देखते ही सबके मन में प्यार उमड़ पड़ेगा। पर ऐसा नहीं हुआ। उसे बच्ची सहित घर छोड़कर जाने का फ़रमान सुना दिया गया था। उसे जाना ही पड़ा .... जो ब्याहकर लाया था उसने ही कठोर आघात दिया, औरों की तो बात ही क्या की जाए।
 
रश्मि अपने पिता के घर नहीं जाना चाहती थी। अपनी टूटी उम्मीदों और अरमानों को लेकर वो एक बिल्कुल अनजान शहर में पहुंच गई थी। बस से उतरकर भूख से बिलखती नन्ही सी जान को दूध पिलाने का स्थान तलाशने लगी। वहीं दूर एक पेड़ की छांव में बैठी एक स्त्री उसे दिखाई दी जिसकी गोद में बच्चा था। वो भी वहीं जाकर बैठ गई और बच्ची को दूध पिलाने लगी। दूध पिलाकर उठी तो सामने पति को देखकर चौंक गई। वो कुछ समझ नहीं पाई। पति ने बच्ची को गोद में लेकर दुलारा और दोनों घर जाने के लिए बस में बैठ गए। रास्ते में उसने रश्मि को अपने इस व्यवहार का कारण बताया तो वह दंग रह गई। पति ने बताया कि " वो अपने माता पिता की एकमात्र संतान नहीं है, उसके एक बहन भी थी जिसे महज़ 5 साल की उम्र में किसी दरिंदे ने अपनी हवस का शिकार बना लिया था। उसके साथ इतनी ज्यादती की गई कि मासूम ने वहीं दम तोड़ दिया था  तभी से मां- पिताजी ने ये सोच लिया था कि इस आंगन में बेटी की किलकारी नहीं गूंजेगी। मैं भी भुक्तभोगी था इसीलिए मैंने उनकी बात मानी। पर आज जब बेटी का पिता बन गया हूं तो जैसे मोह का अटूट बंधन जुड़ गया है इस नन्ही जान से। तुम्हारे घर से निकलते ही मैं तुम्हारे पीछे हो लिया था।" सुनकर रश्मि की आंखें भर आई थी। उसने कहा  "जरा सोचिए आपकी बहन के साथ ऐसा करने वाला भी तो किसी का बेटा था। बेटियों को जन्म लेने से रोकने और बेटा पैदा करके दूसरे की बेटी को खतरे में डालने से अच्छा ये है कि बेटियों को मजबूत और शिक्षित बनाया जाए और बेटों को अच्छे संस्कार दिए जाएं।"  पति ने कहा " तुम सही कह रही हो! देखो कितना सुकून मिल रहा है इसे अपने पिता की गोद में... बस एक ही डर है मां और पिताजी इसे स्वीकारेंगे या नहीं।"
दोनों घर पहुंचे। उन्हें देखते ही माँ और पिताजी दौड़कर आए और अपनी पोती को गले लगा लिया। माँ ने कहा "दुष्कर्मियों के गुनाह की सजा ये मासूम नहीं भुगतेंगे, सजा तो हैवानों को ही मिलनी चाहिए।"

- डॉ. अलका जैन आराधना
 
रचनाकार परिचय
डॉ. अलका जैन आराधना

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