जुलाई 2019
अंक - 51 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

यादें!
यह भी ख़ूब रही!
 
 
यादें, नई पुरानी ,कहती हैं कोई कहानी! सच्ची! आदमी कितनी भी कोशिश कर ले, भुला नहीं पाता। कुछ चीज़ें ऐसी दिमाग़ में घुस जाती हैं कि कुछ भी उस जैसा हुआ, देखा,सुना, पढ़ा कि बातें तुरंत बाहर आने को आकुल-व्याकुल हो जाती हैं जैसे एक के ऊपर एक बबूला, फट-फट  फूट ही तो पड़ती हैं। पैडल-रिक्शा की कहानी की यादें तरोताज़ा होकर दिमाग़ के आसमान पर ऐसे घूमने लगीं जैसे काले बादल अभी अभी बरसकर ही मानेंगे। 
 
बात बड़ी पुरानी है,लगभग चालीस वर्ष से भी ऊपर की। मैं बच्चों को लेकर मुज़फ्फरनगर गई हुई थी। छोटे-छोटे बच्चे! लगभग पाँच-सात साल की उम्र के! अब याद नहीं है पर कहीं तो गए थे, बाज़ार,शॉपिंग करने, चाट-वाट खाने। अम्मा को बच्चों के साथ खूब मज़ा आता था और मैं जब भी बच्चों को लेकर अम्मा के पास जाती वो हमें खूब घुमातीं। पिक्चर,चाट किसी पुराने अम्मा के या फिर मेरे मित्र से मिलने जाना हो, हम सब साथ जाते। सभी मतलब चारों, बेटा-बेटी,अम्मा और मैं। उन दिनों और कोई सुविधा तो थी नहीं। कोई ऑटो-रिक्शा या कैब जैसी चीज़ें उनके बारे में तो कभी सुना भी नहीं था। होती ही नहीं थीं ,हाँ! इकलौती गाड़ी पापा के पास दिल्ली में रहती। उसका प्रयोग भी तब होता जब हम दिल्ली जाते। पापा दिल्ली में मिनिस्ट्री ऑफ़ कॉमर्स में काम करते थे, सैक्शन ऑफ़िसर थे, उन्हें गाड़ी चलानी नहीं आती थी इसलिए जब वो वीकेंड्स में कभी मुज़फ्फ़रनगर आते तो रोडवेज़ की बस से आते। हम सब भी उन दिनों रोडवेज़ की बसों में ही आते-जाते थे। जब हम सब इकट्ठे होते तो पापा एक ड्राईवर का इंतज़ाम करते तब जाकर हमें अपनी गाड़ी का सुख मिलता। फिर दिल्ली में तो उस समय भी 'फोर-व्हीलर' और 'टू-व्हीलर ' भी चलते थे पर पापा स्कूटर पर ही ऑफ़िस जाते थे।
 
हाँ, तो अम्मा क्योंकि मुज़फ्फरनगर में कॉलेज में शिक्षिका थीं। मैं बच्चों को उनके पास लेकर छुट्टियों में कुछ दिनों के लिए ज़रूर जाती, उनकी भी उन दिनों छुट्टियाँ होती थीं। हम सब पैडल-रिक्शे पर लद-फँदकर जाते।एक ही रिक्शा करते  जिसमें  एक तरफ़ मैं और गोदी में बिटिया लदती और दूसरी तरफ़ ज़िद करके बेटा बिराजता। वह आधा सीट पर होता और आधा रिक्शे के डंडे पर पर बैठता। बीच में बैठना उसने कभी पसंद नहीं किया, अपने आपको बड़ा समझने लगा था न! बीच में कोई बैठना ही नहीं चाहता था सो माँ  बेचारी बीच में ठुँसकर बैठतीं। बहुत ही छोटे कद की, दुबली-पतली सी थीं माँ, सो काम चल जाता। एक बात और बहुत अच्छी तरह याद है जब भी हम  रिक्शे में बैठते रिक्शे वाले से पैसों के बारे में झक-झक ज़रूर होती। वो पाँच कहता तो अम्मा चार कहतीं। 
"अरे भैया! कोई नए थोड़े ही हैं, रोज़ ही तो कॉलेज जाते हैं रिक्शा से! तुम रेट के हिसाब से लो पैसे"   
"हाँ,बहन जी ! मैं नई कित्ती बार लेके गया क्या आपको पर अब तो चार सवारी हैं.." 
"अच्छा, इन ज़रा-ज़रा से बच्चों को तुम सवारी गिनते हो? रहने दो भैया, कोई दूसरी रिक्शा देख लेंगे" अम्मा कुछ तुनककर थोड़ा आगे चल देतीं पर दोनों  बिगड़ैल तो सड़क पर ही पसरने को तैयार हो जाते। पेट तो ऊपर तक टनाटन भरकर आए हुए होते दोनों, सो कोई भी उस समय पैदल चलने के मूड में न होता। कुछ न कुछ सौदा-सुलफ़ भी हो ही जाता था सो उसके पैकेट्स या थैले भी साथ में होते। सो रिक्शा की ज़रूरत जल्दी होती फिर बीच का सौदा होता। यानि साढ़े चार रुपए में किला फ़तह हो जाता। 
 
ऐसे ही एक दिन हम सब लदे -फंदे शहर से अपने घर नई मंडी, जहाँ अम्मा का घर था,वहाँ लौट रहे थे। हर बार की तरह सबके पेट डटे हुए थे और हर बार की तरह ही अम्मा बीच में ठुँसी बैठीं थीं। दोनों भाई-बहन शायद चॉकलेट के लिए छीना-झपटी कर रहे थे जिससे अम्मा को परेशानी हो रही थी।  वो बीच में थीं और दोनों की हरकत से नाराज़ हो रहीं थीं। पता नहीं अचानक क्या हुआ, सामने से एक ट्रक आकर सामने खड़ा हो गया पता ही नहीं चला ,वो किधर से आया था। हम सब खूब ज़ोर से हिल-डुल गए और बड़ी मुश्किल से बैलेंस बना पाए। बेचारा रिक्शा वाला भी घबरा गया था। शुक्र है कि रिक्शा पलटी नहीं थी सो हम सब उछलकर फिर से रिक्शे की सीट पर जम गए। अचानक नज़र पड़ी,अरे! अम्मा कहाँ गईं? 
 
"बड़ी मम्मी कहाँ हैं?" बच्चे अपनी नानी को बड़ी मम्मी कहते थे। मैंने प्रश्नवाची दृष्टि बच्चों पर डाली और रिक्शा वाले समेत हम सब माँ को ढूँढने लगे। जैसे ही हमारी दृष्टि ट्रक के आगे पड़ी, सड़क पर माँ को बैठे देखा। बड़ा अजीब सा दृश्य था, ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने उन्हें गोदी में उठाकर बैठा दिया हो। उन्हें देखकर जान में जान आई लेकिन जिस स्थिति में वो बैठी थीं, उन्हें देखकर हम सब रिश्ते वाले भैया समेत खी-खी करके हँसने लगे। अब तो अम्मा का गुस्सा देखने लायक था। जब उनका मुँह देखा तब लगा कि उन्हें उठाने की जगह हम सब दाँत फाड़ रहे थे। अम्मा बेचारी से उठा नहीं जा रहा था। चोट तो लगी ही होगी, वो बेचारी उसी पोज़ीशन में सड़क पर बैठी थीं।
 
जब उन्हें उठाने का ख़्याल आया, तब हम सब हड़बड़ाकर रिक्शे से नीचे कूदे। रिक्शे वाले भैया ने रिक्शा छोड़ दी तो मैं सड़क पर फिसल पड़ी। बड़ी मुश्किल से खुद को संभाला, तब तक बच्चे माँ के पास पहुँच चुके थे। कितनी भी दुबली हों माँ लेकिन उनसे तो उठ नहीं सकती थीं। रिक्शे वाले भैया और ट्रक वाले भैया ने माँ को उठाकर रिक्शा में बिठाया। मैं और माँ दोनों काँप रहे थे। मैं भी तो फिसल गई थी, रिश्ते में रखे पैकेट्स भी सड़क पर तितर-बितर हो गए थे।
 
अम्मा के तो मुँह से आवाज़ ही नहीं निकल रही थी लेकिन गुस्सा उनकी आँखों में भर गया था कि कितने बद्तमीज़ बच्चे हैं जो मुझे देखकर उठाने की जगह खी-खी कर रहे हैं। मेरे भी चोट लगी थी लेकिन अम्मा का चेहरा देखकर मैं अपनी चोट भूल गई। अम्मा कई दिन तक इस बात पर नाराज़ रहीं लेकिन जब बाद में उस घटना को दोहराया जाने लगा तब वे  भी हमारे साथ हँसकर लोट-पोट हो उस घटना को खूब एन्जॉय करती थीं। कोई भी मित्र आता,अम्मा उसे यब बात सुनाना न भूलतीं। सच तो यह है कि उस दिन हम सब ईश्वर की कृपा से बस बच ही गए। ऎसी घटनाएँ ताउम्र  याद बनकर दिलोदिमाग़ में रच-बस जाती हैं। 
 
 

 


- डॉ. प्रणव भारती