जुलाई 2019
अंक - 51 | कुल अंक - 55
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

जयतु संस्कृतम्
श्रमेण लभ्यं सकलं : मलालाचरितम्
 
प्रतिभा किसी किसी की मोहताज नहीं होती। इसके लिए धर्म जाति, लिंग और आयु  कोई मायने  नहीं रखता। समय उसे ही स्मरण करता है जो लोगों द्वारा बने बनाए मार्ग से हटकर कुछ अलग करते हैं। मलाला युसुजई इसी प्रकार की एक बालिका है जिसने लीक से हटकर कुछ अलग किया। इसलिए अफगानिस्तान ही नहीं संपूर्ण विश्व उसे जानता और पहचानता है। डॉ. रवीन्द्र कुमार पण्डा ने अपने ‘मलालाचरितम्’ काव्य में उसी निडर और निर्भीक बालिका के जीवनचरित्र पर आधारित काव्य का प्रणयन किया है। 
 
इस काव्य में कवि ने अपनी काव्य प्रतिभा का बहुत ही सुंदर परिचय दिया है। कवि ने कहीं पर विद्या की अधिष्ठात्री माँ सरस्वती की वंदना की है, तो कहीं मित्रता के महत्व को बताया है। कवि ने नारी शिक्षा पर भी जोर दिया है। उसने ऐसे माता-पिता की प्रशंसा की है जो अपने बच्चे को शिक्षित तथा निडर बनाते हैं। कहा भी गया है-
माता शत्रु: पिता वैरी येन बालो न पाठित:
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा॥
 
स्त्रियों को कुछ रूढिवादी आज भी पुरुष के हाथ की कठपुतली के रुप में देखना पसन्द करते हैं। उनको लगता है कि अगर नारी ने घर के बाहर कदम निकाला तो हमारा वर्चस्व समाप्त हो जाएगा। हमारे उस झूठ का पर्दाफाश हो जाएगा जिसकी आड़ में हम अनैतिक कृत्य करते हैं। कवि ने स्त्री को हाशिए से उठाकर मुख़्यधारा में लाने का प्रयास किया है और इसमें वह सफल भी हुआ है। 
स्त्रीणां मनोदशामनोदशां दृष्ट्वा तथा च निनिकबप्रथाम्।
कृष्णांगकृष्णांगवरणं चैव स भवति स्म कातर:॥
 
कवि कहता है कि शिक्षित नारी एक नहीं बल्कि दो कुलों का उद्धार करती है। इसी बात को  राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने अपने शब्दों में इस प्रकार कहा था कि – “एक आदमी को पढाओगे तो एक व्यक्ति शिक्षित होगा एक स्त्री  को पढ़ाओगे तो पूरा परिवार शिक्षित होगा।’’ 
अस्माकं  संस्कृते शास्त्रे तनयां दुहितेति च।
कथ्यते कारणं यस्मात् सा कुलद्वयतारिणी॥
 
कवि का मानना है कि शिक्षा सबके लिए आवश्यक है वह जितना पुरुष के लिए आवश्यक है उतना ही स्त्री के लिए भी। 
पाकिस्तान और अफगानिस्तान की स्त्रियों की दशा का वर्णन करते हुए कवि ने लिखा है कि वहाँ पर स्त्री शिक्षा आज भी न के बराबर है। अशिक्षा के कारण वहाँ की स्त्रियाँ अपनी आवाज नहीं उठा सकती। पुरातंपथी और रूढिवादी धर्मगुरु उनको जितना बताते हैं वे उतना ही जानते समझते हैं। उनकी अपनी स्वयं की कोई सोच-विचार नहीं है। तालिबानी आतंकियों के कारण वे अपने घरों में सदैव कैद रहती हैं। 
बन्दिनीव गृहे स्थित्वा या यापयन्ति।
पुरुषाणां बलैर्बद्धा भवन्ति स्म प्रतिक्षणम्॥ 
जीवन्ति कुदशापन्ना: शोषिताश्चापमानिता।
अशिक्षिता रमण्यो या भयव्याघ्रविदारिता:॥ 
 तालिबानभयव्याघ्रो यथा गर्जति भूतले।
प्रभावेण सदा यस्य दु:खिन्य: सन्ति बालिका॥
 
‘शिक्षक उस मोमबत्ती के समान है जो स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश देता है’ इसका उदाहरण मलाला की शिक्षिका मैडम मरियम हैं। लोग आज शिक्षक को चाहे जो कहें परंतु आज भी यह सत्य है कि समाज में अच्छे शिक्षकों की कमी नहीं है। मलाला के इस समाज सेवा रुपी कार्य में अप्रत्यक्ष रुप से मरियम का बहुत बड़ा योगदान रहा है।   
उच्चविद्यालये तस्या आसीच्चोत्तमशिक्षिका।
स्वतन्त्रा शेमिषीयुक्ता मरियंनामधारिणी॥  
विद्या की महत्ता बताते हुए कवि कहता है कि विद्या के बिना इस जगत में कुछ भी संभव नहीं है । इसलिए प्रत्येक मनुष्य को विद्या अवश्य ग्रहण  करनी चाहिए। विद्या ही सारे सुख और ऐश्वर्य की प्राप्ति का साधन है। 
वित्तं विद्यासमं नास्ति न वै विद्यासमो मणि:।
नहि विद्यासमा शक्तिर्विद्या परमदेवता॥ 
विद्यासमो न शोभते निर्गन्धा  इव किंशुका।
आहारभोगनिद्रासु नित्यं ये सन्ति संयुता:॥
  
मलाला ने सदैव पर्दा प्रथा तथा रूढ़िवादिता और दकियानूसी विचारधारा का विरोध किया। इसका परिणाम यह हुआ कि उसे गोली तक मारी गई परन्तु ईश्वर की कृपा से वह बच गयी।  
अनुष्टुप्, शार्दूलविक्रीडित, त्रोटक, युग्मकम् आदि छ्न्दों में निबद्ध यह काव्य पाठक को शुरू से अन्त तक बाँधे रखने की सामर्थ्य रखता है। इसके लिए कवि साधुवाद के पात्र हैं। उन्हें भविष्य के लिए अशेष शुभकामनायें।   
 
समीक्षक-डॉ.अरुण कुमार निषाद  
कृति - मलालाचरितम्
कृतिकार – प्रो. रवीन्द्र कुमार पण्डा 
प्रकाशक – अर्वाचीन संस्कृत परिषद्, बडोदरा  
प्रथम संस्करण 2017 ,
मूल्य- 150  रू.
पृष्ठ-70         
 

- डॉ. अरुण कुमार निषाद