प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2019
अंक -50

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

विमर्श

पर्यावरण संरक्षण के प्रति सचेतता ज़रूरी
- आकांक्षा यादव


मनुष्य और पर्यावरण का संबंध काफी पुराना और गहरा है। पर्यावरण के बिना जीवन ही संभव नहीं है। प्राचीन ग्रंथों में वर्णित पंच तत्व क्षिति, जल, पावक, गगन एवं समीर मिलकर पर्यावरण का निर्माण करते हैं। ये तत्व आवश्यकतानुसार समस्त जीव के उपयोग-उपभोग में अपनी भूमिका निभाते हैं। मानव अपनी आकांक्षाओं के लिए इन तत्वों पर निर्भर है। इनका एक निश्चित तारतम्य जीवन को नए प्रतिमान देता है, पर जब किन्हीं कारणों से इनका संतुलन बिगड़ता है तो पर्यावरण-संतुलन भी बिगड़ता है, जो अंतत: न सिर्फ मानव बल्कि सभ्यताओं को प्रभावित करता है। ऐसे में ज़रूरत है कि इनका दोहन नहीं बल्कि सतत् विकास द्वारा सवंदेनशील उपयोग किया जाए।

पर्यावरण के प्रति बढ़ती असंवेदनशीलता आज भयावह परिणाम उत्पन्न कर रही है। एक तरफ बढ़ती जनसंख्या, उस पर प्रकृति का अनुचित दोहन, वाकई यह संक्रमणकालीन दौर है। यदि हम अभी भी नहीं चेते तो सभ्यताओं के अवसान में देरी नहीं लगेगी। वैश्विक स्तर पर देखें तो धरती का मात्र 31 प्रतिशत क्षेत्र वनों से आच्छादित है, जबकि 36 करोड़ एकड़ वन क्षेत्र प्रतिवर्ष घट रहा है। नतीजन 1141 प्रजातियों के विलुप्त होने का ख़तरा मंडरा रहा है। वहीं जंगलों पर निर्भर 1.6 अरब लोगों की आजीविका ख़तरे में है।

बढ़ते पर्यावरण-प्रदूषण ने जल-थल-नभ किसी को भी नहीं छोड़ा है। पृथ्वी का तीन चौथाई हिस्सा जलमग्न है, जिसमें करीब 0.3 फीसदी में से भी मात्र 30 फीसदी जल ही पीने योग्य बचा है। तभी तो 76.8 करोड़ लोगों को दुनिया में पीने के लिए साफ पानी तक नहीं मिलता। नतीजतन, दुनिया में प्रतिवर्ष 18 लाख बच्चे पानी की कमी और बीमारियों के कारण दम तोड़ देते हैं। वहीं प्रतिवर्ष 22 लाख लोग जलजनित बीमारियों के चलते मौत के मुँह में समा जाते हैं। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक 2025 तक 2.9 अरब अतिरिक्त लोग जल आपूर्ति के संकट में इजाफा ही करेंगे।

यदि भारतीय परिप्रेक्ष्य में बात करें तो जिस गंगा नदी को जीवनदायिनी माना जाता है, उसमें 1 अरब लीटर सीवेज मिलता है। ऐसे में स्वाभाविक है कि गंगा में बैक्टीरिया का स्तर 2800 गुना बढ़ गया है। इसी प्रकार यमुना नदी की बात करें तो अकेले राजधानी दिल्ली का 57 फीसदी कचरा यमुना में डाला जाता है। यहाँ 3053 मिलियन लीटर सीवेज पानी यमुना में हर रोज़ बहाया जाता है। कहना ग़लत न होगा कि 80 फीसदी यमुना दिल्ली में ही प्रदूषित होती है।

सिर्फ जल ही क्यों! जिस वायु में हम साँस लेते हैं, वह भी प्रदूषण से ग्रस्त है। पिछले 5 सालों में वायु में 8-10 फीसदी कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा बढ़ी है, नतीजतन 5 करोड़ बच्चे हर समय वायु प्रदूषण से बीमार होते हैं। अकेले एशिया में 53 लाख लोग प्रदूषित वायु के चलते मौत के मुँह में चले जाते हैं। हाल ही में अमेरिका की येल और कोलंबिया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की ओर से 132 देशों में कराए गए वायु गुणवत्ता अध्ययन की मानें तो वायु-प्रदूषण के मामले में भारत आखिरी दस देशों में शामिल है। 132 देशों में भारत को 125 वाँ स्थान मिला है, जबकि चीन को 116वाँ।

एक तरफ बढ़ती जनसंख्या, दूसरी तरफ बढ़ता पर्यावरण-प्रदूषण ऐसे में उनके बीच परस्पर संतुलन की शीघ्र आवश्यकता है। मानव और पर्यावरण के मध्य असंतुलन से जहाँ अन्य जीव-जंतुओं व वनस्पतियों की प्रजातियाँ नष्ट होने के कगार पर हैं, वहीं ग्रीन हाउस के बढ़ते उत्सर्जन व ग्लोबल वार्मिंग से स्वच्छ साँस तक लेना मुश्किल हो गया है। मानवीय जीवन में बढ़ती भौतिकता एवं प्रकृति व पर्यावरण के प्रति बढ़ती उदासीनता, लापरवाही, बेपरवाही व दोहन ने विनाश-लीला का तांडव आरंभ कर दिया है। पृथ्वी पर बढ़ते तापमान के चलते जलवायु-परिवर्तन भी हो रहा है। एक वैज्ञानिक रिपोर्ट के अनुसार-जलवायु परिर्वतन से हर वर्ष लगभग तीन लाख लोग मर रहे हैं, जिनमें से अधिकतर विकासशील देशों के हैं। ग्लोबल हृयूमैनिटेरियन फोरम की एक रिपोर्ट के अनुसार- "1906 से 2005 के मध्य पृथ्वी का तापमान 0.74 डिग्री सेल्सयिस बढ़ा है और हाल के वर्षों में इसमें उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। वर्ष 2100 तक यह तापमान न्यूनतम दो डिग्री सेल्सयिस बढ़ने के आसार हैं।"

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक 2030 तक वैश्विक ऊर्जा की ज़रूरत में 60 फीसदी की वृद्धि होगी। ऐसे में निर्वहनीय विकास के लिए तत्काल ध्यान दिए जाने की ज़रूरत है। कोयला और पेट्रोल के अधिकाधिक उपयोग से वायुमंडल में कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा बढ़ रही है, जिससे पृथ्वी के औसत तापमान में भी वृद्धि हो रही है। वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी पर संतुलित तापमान के लिए वायुमंडल में कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा 0.3 फीसदी रहना ज़रूरी है। इसमें असंतुलन भयावह स्थिति पैदा कर सकता है। ओजोन परत जहाँ पराबैंगनी किरणों से धरा की रक्षा करता है, वहीं प्रतिदिन बढ़ते एयर कंडीशनर व रेफ्रीजरेटर एवं प्लास्टिक उद्योग में उपयोग किए जाने वाले क्लोरोफ्लोरो कार्बन के उत्सर्जन से ओजोन परत को नुकसान पहुँच रहा है। इससे जहाँ पराबैंगनी किरणों के प्रवाह के चलते त्वचा कैंसर जैसी बीमारियाँं उत्पन्न हो रही हैं, वहीं ग्लेशियरों के पिघलने के चलते तमाम दीपों व देशों पर ख़तरा मंडरा रहा है। आर्कटिक क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन पर 2004 में प्रकाशित एक अध्ययन रिपोर्ट में दावा किया गया है कि आर्कटिक क्षेत्र में विश्व के अन्य भागों की अपेक्षा तापमान-वृद्धि दुगनी गति से हो रहा है। वस्तुतः आर्कटिक क्षेत्र में बर्फीली सतहें अधिक कारगर ढंग से सूर्य-उष्मा का परावर्तन करती हैं, पर अब तापमान बढ़ने एवं हिमखंडों के तीव्रता से पिघलने के कारण अनाच्छादित भू-क्षेत्र व सागर तल द्वारा अपेक्षाकृत अधिक ऊष्मा ग्रहण की जा रही है, जिससे यह क्षेत्र अत्यंत तीव्र गति से गर्म होता जा रहा है। ऐसे में महासागरों का जलस्तर बढ़ने से तमाम द्वीपों व देशों के विलुप्त होने का ख़तरा उत्पन्न हो गया है। इससे जहाँँ जनसंख्या पलायन की समस्या उत्पन्न हुई है, वहीं समुद्री जीव-जंतुओं के विलुप्त होने की संभावनाएं भी उत्पन्न हो गई हैं।

वस्तुत: जब हम पर्यावरण की बात करते हैं तो यह एक व्यापक शब्द है, जिसमें पेड़-पौधे, जल, नदियाँ, पहाड़ इत्यादि से लेकर हमारा समूचा परिवेश सम्मिलित है। हमारी हर गतिविधि इनसे प्रभावित होती है और इन्हें प्रभावित करती भी है। भारतीय मानस वृक्षों में देवताओं का वास मानता है। इतना ही नहीं वह वृक्षों को देवशक्तियों के प्रतीक और स्वरूप के रूप में भी देखता, समझता है। उदाहरण के लिए पीपल के वृक्ष में त्रिदेव यानी ब्रह्मा, विष्णु व शिव का वास होता है। इसी प्रकार आंवले के पेड़ में लक्ष्मीनारायण के विराजमान होने की परिकल्पना की गई है। इसके पीछे वृक्षों को संरक्षित रखने की भावना निहित है। कभी लोग गर्मी में ठंडक के लिए पहाड़ों पर जाया करते थे, पर वहाँ भी लोगों ने पेड़ों को काटकर रिसॉर्ट और होटल बनाने आरंभ कर दिए। कोई यह क्यों नहीं सोचता कि लोग पहाड़ों पर वहाँ के मौसम, प्राकृतिक परिवेश की खूबसूरती का आनंद लेना चाहते हैं, न की कंक्रीटों का। पर लगता है जब तक यह बात समझ में आयेगी तब तक काफी देर हो चुकी होगी। ग्लोबल वार्मिंग अपना रंग दिखाने लगी है, लोग गर्मी में 45 पर तापमान के आने का रोना रो रहे हैं, पर इसके लिए कोई कदम नहीं उठाना चाहता।

सारी ज़िम्मेदारी बस सरकार और स्वयंसेवी संस्थाओं की है। जब तक हम इस मानसिकता से नहीं उबरेंगे, तब तक पर्यावरण के नारों से कुछ नहीं होने वाला है। आइये आज कुछ ऐसा सोचते हैं, जो हम कर सकते हैं। जिसकी शुरुआत हम स्वयं से या अपनी मित्रमंडली से कर सकते हैं। हम क्यों सरकार का मुँह देखें? पृथ्वी हमारी है, पर्यावरण हमारा है तो फिर इसकी सुरक्षा भी तो हमारा कर्तव्य है। कुछ बातों पर गौर कीजिये, जिसे हम अपने परिवार और मित्र-जनों के साथ मिलकर करने की सोच सकते हैं। आप भी इस ओर एक कदम बढ़ा सकते हैं।

जैव-विविधता के संरक्षण एवं प्रकृति के प्रति अनुराग पैदा करने हेतु फूलों को तोड़कर उपहार में बुके देने की बजाय गमले में लगे पौधे भेंट किये जाएँ। स्कूल में बच्चों को पुरस्कार के रूप में पौधे देकर, उनके अन्दर बचपन से ही पर्यावरण संरक्षण का बोध कराया जा सकता है। इसी प्रकार सूखे वृक्षों को तभी काटा जाय, जब उनकी जगह कम से कम दो नए पौधे लगाने का प्रण लिया जाय। जीवन के यादगार दिनों मसलन- जन्मदिन, वैवाहिक वर्षगाँठ या अन्य किसी शुभ कार्य की स्मृतियों को सहेजने के लिए पौधे लगाकर उनका पोषण करना चाहिए, ताकि सतत-संपोष्य विकास की अवधारणा निरंतर फलती-फूलती रहे। यह और भी समृद्ध होगा यदि अपनी वंशावली को सुरक्षित रखने हेतु ऐसे बगीचे तैयार किये जाएँ, जहाँ हर पीढ़ी द्वारा लगाये गए पौधे मौजूद हों। यह मज़ेदार भी होगा और पर्यावरण को सुरक्षित रखने की दिशा में एक नेक कदम भी।

आज के उपभोक्तावादी जीवन में इको-फ्रेंडली  होना बहुत ज़रूरी है। पानी और बिजली का अपव्यय रोककर हम इसका निर्वाह कर सकते हैं। फ्लश का इस्तेमाल कम से कम करें। शानो-शौकत में बिजली की खपत को स्वतः रोककर लोगों को प्रेरणा भी दे सकते हैं। इसी प्रकार री-सायकलिंग द्वारा पानी की बर्बादी रोककर और टॉयलेट इत्यादि में इनका उपयोग किया जा सकता है।

मानव को यह नहीं भूलना चाहिए कि हम कितना भी विकास कर लें, पर पर्यावरण की सुरक्षा को ललकार कर किया गया कोई भी कार्य समूची मानवता को ख़तरे में डाल सकता है। अतः ज़रूरत है कि अभी से प्रकृति व पर्यावरण के संरक्षण के प्रति सचेत हुआ जाए और इसे समृद्ध करने की दिशा में तत्पर हुआ जाय।


- आकांक्षा यादव
 
रचनाकार परिचय
आकांक्षा यादव

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