प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2019
अंक -50

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

लघुकथा- क्षमा

"पूजा घर के कोने में एक पोटली रखी है। लाल कपड़े में बंधी है। जा उसे एक पॉलीथीन में डालकर ला दे।" सासू माँ ने माली को जाता देखकर  श्रद्धा को आवाज़ दी।
"जा जल्दी कर। नहीं तो सोहावन निकल जाएगा।"
"अरे बाबा! जल्दी कर। हमारी सास तो पूजा ख़त्म होते ही सारी मूर्तियों का नदी में विसर्जन ख़ुद जाकर करती थी। यहाँ तो कल से ही मूर्तियाँ पड़ी हुई हैं।"
सासू माँ के निर्देश ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहे थे।


श्रद्धा ने तीज की पूजा के बाद उस पोटली में बंधे मिट्टी के लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति और उन पर चढ़े फूल, मालाओं और वस्त्रों को पुराने अख़बार में लपेटा और सासू माँ के पास भारी मन से ले आई।
श्रद्धा के दिमाग़ में कल के ही अख़बार में छपा उसका एक आलेख 'नदियों को बचाना होगा' अभी ताज़ा ही था। उसकी आत्मा कचोटने लगी थी। बाहर खड़े माली की ओर बढ़ते क़दम को उसकी लिखी पंक्तियाँ रोकने का अथक प्रयास कर रही थीं।


श्रद्धा ने माली को थैली पकड़ाई और समझाते हुए बोली, "भैया आप इसे बगीचे के कोने में गड्ढा करके डाल दीजिएगा। कृपा करके नदी में प्रवाहित नहीं कीजिएगा।"
"जी भाभी, समझ गया।" माली कुछ सोचकर आश्वासन देता हुआ बोला।
"बहु, बेटा हाथ जोड़कर क्षमा भी माँग लेना ईश्वर से देरी के लिए।"
"जी माँ, मैं क्षमा ही माँग रही हूँ। काश यह शुरुआत मैंने पहले की होती।" श्रद्धा को अब अपना आलेख सार्थक और सटीक लग रहा था।


- सारिका भूषण
 
रचनाकार परिचय
सारिका भूषण

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कथा-कुसुम (1)