प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2019
अंक -50

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

लघुकथा- बालमन की बातें

"मैम! मैम! उस लीची के पेड़ के पास ले चलिए ना। चलिए वहाँ पर लीची तोड़कर खायेंगे।"
"वो किसी के घर का बागीचा है बेटा, वहाँ नहीं जा सकते और सम्हल कर चलो, इधर-उधर नहीं। अभी ख़ूब मस्ती करने को मिलेगी।"
लेकिन ख़ुशी का दिमाग़ तो कहीं और ही चल रहा था। उसने फिर कहा, "लेकिन मैम, ये तो शहर है ना! फिर भी यहाँ तो इतने सारे पेड़-पौधे दिखाई दे रहे हैं। हम लोग तो पढ़ते हैं कि पेड़ काटे जा रहे हैं। तब यहाँ पेड़ कैसे हैं मैम?"


मैम ने एक बार नज़र घुमाकर देखा। बच्चों को शैक्षिक भ्रमण पर लेकर आये शिक्षक थोड़ी-थोड़ी दूर पर बच्चों के साथ चल रहे थे। पार्क घुमाकर बच्चों को पास ही संग्रहालय दिखाने ले जाया जा रहा था। मैम ने चलते-चलते ही ख़ुशी को सड़क के किनारे एक कटा पेड़ दिखाते हुए कहा- "ये कटा हुआ पेड़ देख रही हो ना बेटा! अब ज़रा देखो ऐसे ही कितने पेड़ काटे गये हैं?"

ख़ुशी के साथ चाँदनी ने भी विकास की बलि चढ़े पेड़ गिनने शुरू किए- "एक, दो, तीन…" संग्रहालय तक पहुँचते-पहुँचते चौबीस।
"इतनी ही दूर में चौबीस!!!" चाँदनी ने आश्चर्य के साथ कहा, "तो फिर पूरी सड़क तक कितने पेड़ कटे होंगे मैम?"
"और फिर पूरे शहर में?" ख़ुशी ने भी अपनी गणित लगाने की कोशिश करते हुए कहा।


संग्रहालय के पार्क में खेलते बच्चों में यह बात बाल सुलभ चर्चा बन गयी। थोड़ी देर में आदित्य अपने दोस्तों के साथ दौड़ता आया, "मैम! मैम! रास्ते में जो जंगल था, उसमें भी पेड़ काटे गये हैं क्या मैम?"
"हाँ बेटा, उस जंगल में पहले अभी से दोगुने पेड़ थे या शायद उससे भी ज़्यादा।"
"तो जब हम आपके जितने बड़े होंगे तब तो सारे पेड़ ही कट जायेंगे मैम।"
"नहीं नहीं!" शीतल ने बीच में ही टोका, "हम पेड़ लगाएंगे। तो जब हम बड़े होंगे तो और ज़्यादा पेड़ रहेंगे।"
"हाँ! हम ख़ूब सारे पेड़ लगाएंगे।"


बच्चे एक-दूसरे का हाथ पकड़कर खेलने लगे। हल्की-हल्की हवा चलने लगी। मानो हरियाली ने भी बालमन की बातें सुन ली हो।


- आकांक्षा मधुर
 
रचनाकार परिचय
आकांक्षा मधुर

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कथा-कुसुम (1)