जून 2019
अंक - 50 | कुल अंक - 55
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

किशन स्वयं सभी की गोशालाओं में जाता और पशुओं को ले जाता। उस दिन उसने सारे पशु सड़क में एक जगह खड़े कर दिए थे। साथ दर्जनों भेड़-बकरियां थीं। गांव के कुत्ते थे। दिन कोई खास नहीं था पर किशन को पता चल गया था कि कम्पनी के कई ट्रक आज आएंगे और जंगल का कटान शुरू हो जाएगा। इसलिए किशन सुबह से ही वहां डट गया। लोगों को इस बात की भनक तब लगी जब गांव की साढ़े सात बजे वाली बस सड़क पर रूक गई। ड्राईवर को किशन के बारे कुछ भी मालूम नहीं था। इसलिए वह सुबह ही उससे भिड़ गया। बात हाथापाई तक पहुंची लेकिन किशन के साथ कुत्तों को देख कर वह चुपचाप बस में बैठ गया। इस घटना को देख कर गांव के लोग भी वहां पहुंच गए थे। किशन के पिता ने उसे डांटा लेकिन उस पर कुछ असर नहीं हुआ। लोगों ने अपने-अपने पशुओं को गोट कर वापिस घर लाना चाहा पर उन्होंने भी किसी की बात नहीं सुन्नी और धीरे-धीरे सड़क पर आगे सरकते रहे। फिर हाथ जोड़ कर किशन की मां ने पूछा था,
’’किशन! मेरे बच्चुआ! ये सब क्या है ? क्यों तैने सड़क को रोक दिया है। देख बचुआ इन डंगरों को ऊपर घाटी में चुगाने ले जा। मत रोक रास्ता। नहीं तो ये लोग पुलिस को बुला लेंगे और तेरे को परेशान करेंगे।’’


पहली बार किशन ने खामोशी तोड़ी थी। वह जोर से चीखा था,
’’अम्मा! मैं नी ले जाता डंगरों को यहां से। तू नी जानती ये कम्पनी के लोग आज मेरे जंगल को काट देंगे। देख-देख कितने ट्रक वहां पार से आ रहे हैं।’’
लोगों की नजर जब उधर गई तो हैरान-परेशान रह गए। खुले ट्रकों में मजदूर खड़े थे। सभी के हाथों में आधुनिक किस्म की कुल्हाडि़यां थीं। आरे थे। आज जंगल कटना था। लोगों को किशन का विरोध समझ आ गया लेकिन उन्हें पता था कि डंगर-पशु, भेड़-बकरियां और कुत्ते इन आधुनिक औजारों का विरोध नहीं कर पाएंगे। हालांकि पूरा गांव वहां था। एक बड़ा जन-समूह। परन्तु उस वक्त वह जन-समूह किशन और उसके पशुओं के सामने निहत्था असहाय लग रहा था। तभी उन ट्रकों के पीछे कई नीली-पीली गाडि़यां आती दिखाई दीं। उनके रूकते ही बंदूकों और लाठियों से लैस पुलिस उतरी। उन्होंने पहले लोगों को चेताया। उसके बाद लाठियां बरसीं। फिर जैसे ही बदूंके उन पर तनी, वे बदहवास से भाग खड़े हुए। यहां तक की उनके साथ भीड़ में किशन का बापू और दादा भी भाग लिए। कई पल बंदूकों के चलने की आवाजें उनका पीछा करती रहीं। सामने किशन था। उसके पशु थे। कुत्ते थे।.....और रोती-बिलखती किशन की अम्मा थी। उन पर कोई असर न देख कर पुलिस वालों और कम्पनी के लोगों का कहर उन पर फिर टूटा। लाठियों से उन्हें मारते-पीटते रहे। पर वे आगे बढ़ते चले गए। किशन की मां अपने बेटे के लिए परेशान थी। पता नहीं कब उसके सिर पर लाठी लगी और वह वहीं ढेर हो गई। एक लाठी किशन के सिर पर भी लगी थी लेकिन वह उसी तरह अपनी बेजुबान फौज के साथ आगे बढ़ता रहा। कुछ देर बाद वह बेहोश हो कर गिर पड़ा। उसके साथ कई पशु भी लाठियों की मार से घायल हो कर गिर पड़े और कुछ मर गए थे। इसके बावजूद भी उनके लिए पशुओं का सामना करना मुश्किल हो गया था।  यह घटना आग की तरह गांव से होती हुई परगने तक फैल गई थी। किशन और उसके पशुओं का यह अनोखा विरोध उन्हें समझ आ गया था। कुछ ही देर में वहां लोगों का सैलाब उमड़ गया।

किशन और उसकी अम्मा को उसी दिन बेहोशी की हालत में अस्पताल पहुंचा दिया गया था। वे दोनों जिन्दगी और मौत की जंग लड़ रहे थे। सड़क में मरे हुए गाए और बैलों को देख कर लोग भड़क उठे थे। मामला अब गो-हत्या का हो गया था जिसे न तो कम्पनी वालों के लिए और न अब सरकार के लिए संभालना आसान था। धीरे-धीरे इस मामले ने एक नया मोड़ ले लिया था जिसकी लपेट में अब पूरा प्रदेश आने लगा था।

 

किशन-कन्हैया गायब और कोट की जेबों में घोंसले
कोई भी पशु उसके बाद अपने ओबरे(गोशाला) नहीं लौटा। न भेड़-बकरियां और न कुत्ते ही। पशु जंगलों, घासणियों और घाटियों में आज भी रंभाते रहते हैं। भेड़-बकरियां जगह-जगह मिमियाती रहती है और कुत्ते कम्पनी के लोगों को पहचान कर उनके पीछे भौंकते हुए दौड़ने लगते हैं। जंगल की चिडि़याएं पेड़ों की टहनियों  पर उदास-उदास बैठी रहती है। प्यास लगती है तो किशन के लगाए पौ में पानी तलाशती है। पर अब कहीं कुछ नहीं मिलता। बरसों से सजा-बसा हराभरा जंगल सूना-सूना सा लगता है। गीदड़ जंगल में दिन-दिहाड़े बदहवास से हूंकने लगते हैं। उनकी हूंकारे सुन कर भी कोई कुत्ता चूं तक नहीं करता। कौओं के दल पगलाए से गांव के घरों, खेतों और खलिहानों की मुंडेरों पर कुड़कुड़ाते रहते हैं।


एक दिन गांव के कुछ लोग उस धार पर अपने पशुओं को ढूंढते हुए निकले जहां किशन उन्हें चुगाया करता था। वहां पहुंचे तो एक पहाड़ी के नीचे का दृश्य देख कर दंग रह गए। वहां झाडि़यों में जगह-जगह लोगों के गुम हुए पुराने कोट लटके थे। लोगों की आहट पाकर जेबों से कई चिडि़याएं बाहर निकलीं थीं और अजीब तरह से चहचाना शुरू कर दिया था। तकरीबन हर जेब में उन्होंने एक घोसला बना लिया था। वे शायद डर गयी थीं। तभी जेबों में से उनके कुछ जवान होते बच्चों ने अपनी चोंचे बाहर निकाल दी थीं।


- एस आर हरनोट

रचनाकार परिचय
एस आर हरनोट

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कथा-कुसुम (2)