प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2019
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

कहानी- बेज़ुबान दोस्त

किशन एक पहाड़ी लड़के का नाम। किशन की आदतें समझ से परे हो गई हैं। उसके अम्मा-बापू और दादू उसको लेकर काफी परेशान रहते हैं। वह घर का इकलौता बेटा है। उसकी उल-जुलूल हरकतों से घर के ही नहीं, गाँव-परगने तक के लोग परेशान रहते हैं। इसी वजह से उसकी पढ़ाई-लिखाई भी नहीं हो पाई है। जब वह दूसरी कक्षा में था तो उसकी क्लास के एक बच्चे ने गुलेल से एक चिड़िया मार दी थी। बस फिर क्या था, किशन पगला गया। उसने बच्चे को खूब पीटा और फिर उसी की गुलेल से उसकी एक आँख फोड़ दी। किशन को खूब मार तो पड़ी ही, स्कूल से भी निकाल दिया गया। गाँव के बच्चे भी उस घटना के बाद उसके साथ कभी नहीं खेले। इस अकेलेपन ने उसे कई दिनों तक निराश-हताश किए रखा। लेकिन धीरे-धीरे उसका लगाव पशुओं और पक्षियों से होने लगा। मौसमों से होने लगा। बादलों से होने लगा। पेड़ों और झाड़ियों से होने लगा। घाटियों और धारों से होने लगा। तितलियों से होने लगा।

किशन अब नौ बरस का हो गया है। पर उसका जिस तरह का पहनावा है, उससे उसकी उम्र का अंदाज़ लगाना मुश्किल है। माँ-बाप ने शायद ही कभी नया कपड़ा उसे सिलाया होगा। वैसे अब उसे कपड़े देने की ज़रूरत भी नहीं पड़ती। गाँव का कोई न कोई आदमी उसे कुछ न कुछ दे दिया करता है। इसलिए कभी उसके बदन पर उसके नाम का कपड़ा नहीं होता। वह हमेशा लम्बा बन्द गले का कुरता पहने रहता है। उसके ऊपर एक पुरानी सदरी। नीचे फटी-पुरानी जीन की पैंट। एक झोला भी वह हमेशा कन्धे पर टाँगे रहता है। उसके बाल बेतरतीब से माथे और आँखों पर बिखरे रहते हैं। बालों में भीतर तक धंसे-फंसे चील के नुकीले चिलारू बाहर आने को बेताब। लम्बे बालों के नीचे कानों का कोई अता-पता नहीं। गोल-मटोल मुँह और छोटी नुकीली-सी ठोड़ी। नाक माथे की तरफ हल्का-सा तना हुआ। उसका ऊपर वाला ओंठ दाएं तरफ से कटा हुआ है, जिससे आगे के दो दांत हमेशा बाहर झाँकते रहते हैं। कई लोग इसी कारण उसे खंडु कहकर भी पुकारते हैं। उसके ओठों पर हमेशा एक हल्की-सी मुस्कान तैरती रहती है। उसके मन में जो कुछ चलता रहता होगा, शायद यह उसी की चमक है जिसका नूर उसके चेहरे पर कोई भी देख सकता है। सदरी और कुरते की जेबों में कुछ न कुछ भरा रहता है। किसी में नमक तो किसी में बासी रोटियों के टुकड़े। किसी जेब में चावल तो किसी में जंगल के करूंदु-बैर। पाँव में कभी एक तरह के जूते नहीं होंगे। एक में चप्पल तो दूसरे में प्लास्टिक का जूता। कभी वह नंगे पाँव ही चला रहता है।

किशन तो जनम का चरवाहा था। स्कूल से हटने के बाद किशन कई दिनों तक घर पड़ा रहा। कुछ दिनों के बाद उसे घरवालों ने पशुओं को चुगाने का काम दे दिया। धीरे-धीरे गाँव के कुछ और लोगों ने भी उसे यह जिम्मा सौंप दिया था। एक साल के भीतर ही वह पशु चुगाने में पारंगत हो गया। उनके साथ उसका खूब मन भी लगने लगा था।
गाँव के किसानों के कई गाय-बैल इतने खराब थे कि खूंटे से खुलते ही पखले को सींग से मारने उनके पीछे भाग जाते। पर मजाल है कि किशन के साथ कभी ऐसा हुआ हो। कोई बैल या दूसरा पशु कितना ही सींगमार क्यों न होता, किशन को देखकर ऐसे सहज हो जाता जैसे वह उसी का पाला हो। यही नहीं गाँव के खूंखार किन्नौरी कुत्ते, जो हमेशा काटने के डर से बन्धे रहते, किशन को देख उनकी आँखों में प्यार-सा उमड़ पड़ता। अब तो वह जिस बैल, कुत्ते, भेड़-बकरी या बिल्ली तक को प्यार से बुलाता, वे उसके पास चले आते और किशन उनसे बतियाता रहता। उसके घर में दो बैल, तीन गाय और कुछ भेड़-बकरियाँ थीं। उनका तो वह जैसे सगा हो गया था। गाय कभी दूध न देती और बिगड़ जाती तो उसकी अम्मा किशन को बुला लिया करती। किशन जैसे ही गौशाला की दहलीज़ पर जाता, गाय चुपचाप दूध देने लग जाती। घरवालों को उसकी हरकतों पर कई बार अचरज भी होता। गाँव के बच्चे और बड़े अब घर-बाहर या खेत-खलिहान में यह ध्यान रखते कि किसी जानवर या पक्षी को किशन के सामने न भगाए या मारे। यदि किशन ने ऐसा करते देख लिया तो उसकी खैर नहीं। वह किसी को कुछ भी कर सकता था। यहाँ तक कि उसके सामने अपने पशुओं या कुत्ते तक को कोई फटकार नहीं लगा सकता था।


घर के आँगन में जितने भी पेड़ थे, उन सभी पर किशन ने छोटे-छोटे पौ लगा रखे थे। जंगल में वह जहाँ पशुओं को चुगाने जाता, वहाँ भी कई पेड़ों की टहनियों पर उसने कुछ न कुछ टाँगा होता, जिनमें वह रोज़ पानी डाल दिया करता। देर-सवेर सभी पक्षी उनसे पानी पीते। वह खुद बांवड़ी और नल से पानी लाता और पौ में भरता रहता। छत पर उनको बासी रोटियाँ डालता। जौ डालता। चावल डालता। अब तो वह किसी भी घर में माँगने भी चला जाता था। जानता था कि कुत्ते या पक्षियों को रोटी-दाना उनके घर में ज्यादा नहीं होता, इसलिए वह गाँव में घूमता और लोग उसके झोले में रात की बची रोटियाँ डाल देते। कुछ दाने डालते तो कुछ चावल डाल देते। पहले गाँववालों को भी उसकी आदतें समझ नहीं आती थीं। लेकिन धीरे-धीरे उसके बावलेपन से उन्हें प्यार होने लगा और उन्हें अब अनाज देना अच्छा लगने लगा था।

इतना ही नहीं; जब वह अपने पशुओं को लेकर जंगल जाता तो दूसरे पशु भी उसके झुण्ड में चले आते। जबकि गाँव के पशु एक-दूसरे से इतनी इरख रखते कि देखते ही लड़ जाया करते। पर किशन को देखते वे ऐसा नहीं करते। पशु जब चरते रहते तो वह तितलियों के पीछे भागने लगता। तितलियाँ भी उसके चारों तरफ इकट्ठी हो जातीं, जैसे वह किशन न होकर कोई वनफूल हो। कई बार तो छोटे-छोटे हिरनों और खरगोशों को भी लोगों ने उसके आसपास मंडराते देखा था। पता नहीं उसके पास ऐसा क्या जादू था? कोई नहीं जानता था।

'नयातोड़' की ज़मीन और फैक्ट्री का लगना
किशन का परिवार बहुत ग़रीब था। सरकार की तरफ से बड़ी मुश्किल से उन्हें पाँच बीघे का नयातोड़ तो मिला था पर उसके साथ सिमैंट फैक्ट्री लगने के बाद उस ज़मीन पर खतरे के बादल मंडराने लगे थे। इस नएतोड़ की ज़मीन भी फैक्ट्री की हदों में गिनी जाने लगी थी, जो सरकार ने कम्पनी को लीज पर दे दी थी। इसके साथ कम्पनी ने कई दूसरे जमींदारों की ज़मीनें भी खरीदनी शुरू कर दी थी। पहले सभी ने पुरज़ोर विरोध किया था लेकिन धीरे-धीरे सब ठंडा होता चला गया। कारण पंचायतों के कुछ प्रधान और बड़े ज़मींदार थे, जिन्होंने चुपके-चुपके कम्पनी वालों से समझौता कर लिया था और अपनी थोड़ी-थोड़ी ज़मीनों का करोड़ों रूपए वसूला था। कम्पनी के लिए यह पैसा देना इसलिए नहीं दुखा कि इसी बहाने वे पंचायतों में बसे गाँव-गाँव तक पहुंचने शुरू हो गए थे। जिन किसानों के पास थोड़ी ज़मीन थी और रोजी-रोटी के कोई बड़े साधन नहीं थे, उनके लिए कम्पनी का विरोध करना सूरज के सामने दिया जलाना था। इसलिए मजबूरन उन्हें भी अपनी ज़मीनें देनी पड़ी थीं। इनमें कुछ ऐसे भी सिरफिरे थे, जिन्होंने अपने बाप-दादाओं की ज़मीनें बेच दी थीं। ये बिचौलिए किस्म के लोग थे। पहले-पहल मेहनत-मजदूरी किया करते थे। लेकिन ज़मीन बेचकर पैसे मिलने का ऐसा चस्का पड़ा कि अपने पास सिर ढँकने तक जगह न बची। ऐसा नहीं था कि उन्हें पैसा अच्छा नहीं मिला था। पर वे कम्पनी और बड़े ज़मीदारों के मायाजाल में फंसते चले गए और किसी को कानो-कान भनक तक न लगी थी। उनकी ज़मीनों और घासणियों को बिकवाने का काम बिचौलियों ने ही किया था। उन लोगों ने अपनी ज़मीनों के तो अच्छे पैसे वसूले ही थे पर साथ जिन्हें ज़मीन बिकवाने के लिए राज़ी किया था, उसके एवज में भी कम्पनी से लाखों का कमीशन खा गए थे।


जो लोग समझदार थे, उन्होंने कम्पनी से मिले पैसों से अच्छे मकान बना लिए और दूसरी जगहों पर ज़मीनें भी खरीद ली थी। परन्तु कुछ ऐसे लोग भी थे, जिन्हें बैठकर पैसा बरबाद करने की आदत पड़ गई थी। वे या तो जुए में पैसे गँवा देते या दिन-रात शराब पीकर मस्त रहते। बसों में बैठते तो पैसों की ठीस मारकर दूसरे यात्रियों को परेशान करते। दूकानों में हुड़दंग मचाते। घरों में बच्चों-बीबियों को मारते-पीटते रहते। काम कुछ नहीं करते थे। सारा-सारा दिन किसी घर के लैंटर या किसी दूकान के बरामदे में बैठकर दारू भी छकते रहते और ताश की चौकड़ियाँ भी लगी रहती। यानी देखते ही देखते फैक्ट्री के साथ लगी पंचायतों के गाँव का माहौल ही बदल गया था। कुछ गिने-चुने लोग जो ज़मीन से मिले पैसे से तरक्की करना चाहते थे, वे भी कुछ दिनों में नंगे हो गए थे। उन्हें कम्पनी के अफसरों ने कई तरह के लालच में फँसा दिया था। कम्पनी की तरफ से अच्छा-खासा कर्ज देकर उनसे ट्रक खरीदवाए थे। व्यापार का ज्यादा अनुभव न होने की वजह से वे बेचारे कर्जे की किश्तें भी पूरी नहीं लौटा पाए। जो ट्रक उन्होंने लिए थे वे भी एक ऐसी कम्पनी से लिए गए, जिनमें पुराने और सैकिण्ड हैंड पूर्जे थे। इसलिए वे दो-चार चक्कर लगाकर हर कहीं खड़े हो जाते। फिर उनकी मरम्मत भी कम्पनी के द्वारा बताई वर्कशोपों पर होती रहती। दूसरे उनमें रखे ड्राइवर और कण्डक्टर ही ज्यादा पैसा खा जाते और मालिकों को हमेशा घाटा ही बताते। इस तरह कईयों के तो दीवाले निकल गए थे। लेकिन कम्पनी का काम दिनो-दिन बढ़ रहा था।

कम्पनी के पीछे सरकार थी। उनके मन्त्री थे। बड़े अफसर थे। इसलिए जब कभी कहीं भी विरोध के स्वर उठते तो वे बिना सुनवाई के दब जाते। इलाके के थाने उनके थे। प्रधान, सैक्ट्री उनके थे। इन्सपैक्टर उनके थे। पटवारी-तहसीलदार उनके थे। यहाँ तक कि इलाके का विधायक भी कम्पनी का होकर रह गया था। जिन किसानों ने ज़मीनें नहीं दी थीं, उनकी मुसीबत भी कम नहीं थी। सिमैंट के लिए जिस पहाड़ी से पत्थर जाता, वहाँ दिन-रात ब्लास्ट होते रहते। उनसे कई मकानों में दरारें आ गई थीं। कुछ मकान तो गिर ही गए थे। मुआवज़े के नाम पर किसानों को आधी रकम भी नहीं मिल पाती थी। कईयों के तो चक्कर लगते रहते और उतने में मकान गिर जाता था। लोग रात को सो नहीं सकते थे। दिन को खेतों में काम नहीं होता था। कभी दिन को भी बलास्ट होते तो खेतों को बाहते-बाहते बैल खोलने पड़ते थे। औरतों को घास काटते-काटते खाली लौटना पड़ता था। आसपास के स्कूलों में बच्चों का पढ़ना दूभर हो गया था।

सरकार यह दावा भी करती नहीं थकती थी कि उस सिमैंट फैक्ट्री में अधिकतर कामगर स्थानीय ही हैं लेकिन सच्चाई यह थी कि किसी भी बड़े काम में वहाँ का कोई व्यक्ति नहीं था। जो कुछ गिने-चुने थे, वे पत्थरों की खानों में मजदूर का काम करते थे।

उस छोटी-सी नदी का गुम होना        
उधर कम्पनी ने अपनी एक अलग तरह की छवि बना ली थी। साथ की पंचायतों में वे खूब दान करते। कई परिवारों की बेटियों के ब्याह तक के खर्च स्वयं वहन करते। स्कूल के भवनों को बनवाते। जगह-जगह पानी के नल और हैंडपम्प लगवा देते। मन्दिरों की मरम्मत करवाते। सराय बनवाते। देवताओं की जातरा और मेले करवाते। यानी ऐसे तमाम कार्य, जिनसे उनकी छवि धर्मात्मा, समाज सुधारक की बनी रहे, वे निरन्तर करते रहते। यहाँ तक कि शहरों में बड़े-बड़े सांस्कृतिक आयोजनों को वे ही पैसा देते। उन्हें स्पांसर करवाते। पर्यावरण दिवस पर तो वे ज्यादा ही सक्रिय रहते। करोड़ों रूपए खर्च कर देते क्योंकि वे जानते थे कि फैक्ट्री लगाने से पहले पूरे प्रदेश में पर्यावरण प्रदूषित होने के डर से उनका विरोध होता रहा था। इसी मुद्दे के चलते उन्हें कई सालों तक स्वीकृति नहीं मिली थी। लेकिन जेसे-कैसे उन्होंने उसे हासिल कर लिया था। इसलिए इस दिवस को वे विशेष तौर पर मनाते। इस दिन सारे कायक्रमों पर खर्च कम्पनी ही करती। वे हजारों सफेद-हरी टोपियाँ और टी-शर्टस बनवाती और लागों के साथ सभी बच्चों को भी बाँट देती।


भीतर की बात यह थी कि जिस इलाके में फैक्ट्री लगी थी, उसके आसपास धूल-मिट्टी से लोगों का जीना दूभर हो गया था। खेतों में फसलें पहले जैसी नहीं उगती। घर-आँगन धूल से सने रहते। दिन को तो फैक्ट्री की चिमनियाँ खामोश रहतीं पर आधी रात के बाद वे धुआं उगलना शुरू कर देतीं और चार बजे सुबह तक आसमान धुएं के बादल से घिर जाता। लोगों की समझ में यही आता कि आसमान में बादल छाए हैं। जिसे पता भी होता वह कर भी क्या लेता।

फैक्ट्री के साथ नीचे एक पहाड़ी नदी बहती थी। जिसमें बारह महीने पानी रहता था। उससे कई पंचायतों के घरों को पानी जाता था। कई सौ बीघे जमीनें सींची जाती थीं। अधिकतर क्यार उसी के किनारे थे। जिनमें लोग धान और हरी सब्जियां उगाया करते। लेकिन देखते ही देखते वह नदी ही गायब हो गई थी। लोगों की आंखों में धूल झोंकने के लिए कम्पनी की तरफ से कई विशेषज्ञ बुलाए गए लेकिन उन्होंने प्राकृतिक रूप से नदी सूखने के ही तर्क दिए। लोगों के पास विश्वास करने के सिवा चारा भी क्या था लेकिन सच्चाई यह थी कि लगातार ब्लास्टों से नदी के स्त्रोत ही नीचे धंस गए थे। फिर जो लम्बी सुरंग कम्पनी फैक्ट्री तक पत्थरों की सप्लाई के लिए खोद रही थी उस नदी का बहाव उन्होंने भीतर ही भीतर उसकी तरफ मोड़ लिया था। हालांकि उसमें पहले जैसा पानी नहीं रहा था लेकिन गुजारे लायक तो था ही।


सुरंग और अनुष्ठान की तैयारी
कम्पनी ने जहां फैक्ट्री लगाई थी उससे पत्थर की खानें बहुत दूर थी। इसलिए वहां तक पत्थर-मिट्टी पहुंचाने के लिए एक लम्बी सुरंग बनाना जरूरी था। सुरंग की खुदाई का जब काम शुरू हुआ तो कम्पनी के नाक में दम भर गया। उनके मजदूर जितना मलवा खोदते उससे दुगुना हर सुबह वहां पड़ा मिलता। सुरंग के निर्माण में कोई भी स्थानीय मजदूर नहीं था। एक दिन मलबे के नीचे कई मजदूर दब कर मर गए थे परकिसी को कानों-कान खबर नहीं हुई। कम्पनी के अफसरों ने उनकी लाशों को भी इतनी सफाई से ठिकाने लगाया कि किसी को कोई अतापता नहीं लगा। इसलिए सुरंग का काम सुचारू रूप से चले उनके एक ज्योतिष ने काम का दोबारा शुभारम्भ पांच जीव बलियों से करने का उपाय सुझाया था। इस महा बलि-अनुष्ठान में एक बच्चा, एक बकरा, एक मूर्गा, एक भैंसा और एक मोर चाहिए था। हालांकि यह बात खुले तौर पर किसी को भी पता नहीं थी लेकिन उन्हीं में से एक मजदूर ने कहीं शराब पीकर यह उगल दिया था। बच्चा लाना बहुत कठिन था। इसलिए कम्पनी वालों को यह बड़ी मुसीबत खड़ी हो गई थी। वे उसके लिए कोई भी कीमत दे सकते थे। यह बात उन्होंने अपने विश्वासपात्र पंडित मणि राम को बताई थी और साथ लाखों रूपए देने का भी लालच दे दिया।
कम्पनी जब भी कोई धार्मिक आयोजन या पूजा-पाठ करती तो पंडित मणि राम को ही बुलाया करती थी। उसे पैसा भी अच्छा-खासा मिल जाया करता। वह उनका बेहद विश्वसनीय आदमी बन गया था। देखते ही देखते उसका दो मंजिला पक्का मकान बन गया था। उसके बड़े बेटे के पास दो छोटी गाडि़यां और एक ट्रक भी आ गया था। जिस घर में कभी रोटी के लाले पड़े रहते वह रात-रात में इतनी तरक्की कर जाए, इसका तो भगवान ही मालिक। उसके कम्पनी के अफसरों से सम्बन्धों की खूब चर्चा रहती।

 

पंडित कई दिनों तक इसी पशोपश में रहा कि क्या किया जाए ?  अचानक उसे किशन का ख्याल आया। वह अकेला ही सारा-सारा दिन पशुओं के पास रहता था। पंडित मणि राम ने यह कार्य किशन के गांव के एक विश्वासपात्र बिचैलिए को सौंपा था ताकि उसे किसी अनहोनी की भनक तक न लगे। किशन को उसने दिलासा दिया गया था कि उसे पूजा में बैठना है जिसके लिए उसे खूब रूपए दिए जाएंगे। उसे यह भी समझाया गया कि वह इस बात को किसी को न बताएं। किशन को बड़ी मुश्किल से मनाया गया था। वह सुबह जैसे ही पशुओं के पास गया वह आदमी उसे अपने साथ ले गया। उसे नए कपड़े दिए गए। नहलाया-धुलाया गया और एक ऐसी जगह रखा गया जो निपट अंधेरी थी। किशन वहां अकेला नहीं था। उस जगह एक मोर, एक मूर्गा, एक बिल्ली भी बांध कर रखी गई थी। किशन उनको देख कर हैरान सा रह गया। उसे देख कर वे आजादी के लिए छटपटाने लगे थे। उसे वहां अब कुछ अजीब सा लगने लगा था। उसने वहां रखी नंगी तलवारें भी देखीं जिनमें खून के निशान पहले से मौजूद थे। उनमें सिंदूर और मौली बन्धी थी। किशन अब घबरा गया था। वह भागना चाहता था और साथ उन जानवरों और पक्षियों को भी आजाद करवाना चाहता था।
 

देर रात जब उसे लेने लोग आए तो वहां न  किशन था और न दूसरे जानवर। पंडित मणिराम को तो जैसे काठ मार गया। कम्पनी के अफसरों में भी हड़कम्प मच गया था। उन्होंने बहुत पीछा किया लेकिन जंगली रास्तों का वह अच्छा-खासा वाकिफ था जिससे वह बच गया। दूर आकर उसने वह रात एक अन्धेरी गुफा में काटी थी। उसका गांव वहां से दूर था इसलिए दूसरे दिन शाम तक भी वह गांव नहीं लौटा था। दूसरे उसे कम्पनी के लोगों का भय भी था कि वे उसे पकड़ कर दोबारा न ले जाएं।
किशन के गायब होने की खबर चारों तरफ आग की तरह फैल गई थी। देर रात जब न किशन घर लौटा और न किसी के पशु गांव लौटे तो उसके घर वालों ने गांव वालों के साथ मिलकर उसकी तलाश शुरू कर दी थी। वह जिस जंगल में पशुओं के साथ दिनभर गुजारता जब वे वहां गए तो देख कर दंग रह गए कि सारे पशु एक जगह जमा है। उनके साथ भेड़-बकरियां भी हैं और दो-चार कुत्ते भी। पर किशन का कहीं अता-पता नहीं है। जैसे-कैसे लोगों ने पशुओं को गांव तक पहुंचाया और दूर-दूर तक जंगलों में किशन को रात भर तलाशते रहे परन्तु उसकी कहीं सार-खबर नहीं मिली। कई तरह की शंकाएं लोगों और उसके घर वालों को खाए जा रही थी।

 

किशन घर में कुछ न बताए इसलिए कम्पनी के एक अफसर के साथ दो-तीन दूसरे कर्मचारी भोर होने से पहले ही गांव में आकर पहुंच गए थे। वे लगातार उसके घरवालों को सांत्वना देते रहे। उन्होंने जंगल और गांव के आसपास अपने कई लोग तैनात कर दिए थे कि किशन सबसे पहले उनकी पकड़ में आए ताकि उसके ढूंढने का श्रेय उन्हें ही मिले। उन्हें यह भी विश्वास था कि किशन अगर कोई ऐसी-वैसी बात बताएगा तो लोग उस सिरफिरे का आसानी से यकीन नहीं करेंगे। फिर जिस तरह की हमदर्दी वे जता रहे थे उससे तो उन पर कतई शक नहीं हो सकता। वह जैसे ही जंगल के बीहड़ों से सुबह निकला कम्पनी के लोगों के साथ गांव के लोगों ने उस पकड़ लिया। वह सहमा हुआ तो था ही। लेकिन गांव के अपनों को देख कर उसकी हिम्मत लौट आई थी। सबसे पहले कम्पनी के अफसरों ने ही उससे पूछ-ताछ शुरू की थी कि वह अपने गुम होने का रहस्य बताए। लेकिन उनके चेहरे तो उसने पहले ही देखे हुए थे इसलिए मारे डर के वह चुपचाप रहा। यहां तक कि अपने पिता व दादू के पूछने पर भी उसने कुछ नहीं बताया।
 

इसके बाद किशन के व्यवहार में कई तरह के बदलाव हो गए थे। वह घर में सहमा-सहमा रहता। उसकी आंखों को कोई पढ़ता तो जान पाता कि उनमें कितना भय भरा पड़ा है। अब वह गांव के बच्चों को कहीं भी पकड़ लेता और बताता कि वे कम्पनी के लोगों से बच कर रहें। इतना ही नहीं वह धीरे-धीरे किसी भी गांव के आदमी को रोक लेता और कहता कि वे अपने बच्चों, मुर्गों और बिल्ली को बचा कर रखें नहीं तो उन्हें कम्पनी के लोग पकड़ कर ले जाएंगे। कभी वह कहने लगता कि उस पार जंगल में जो मोर कूहकता है उसकी जान खतरे में है। इस तरह की बातों का लोग मजाक ही उड़ाते और हंस कर टाल दिया करते।


’नयातोड़’, बकरा और मुर्गियों का गुम होना
किशन के पिता के साथ जो घट रहा था वह आश्चर्यजनक था। उनकी सारी फसल तवाह हो गई थी। उनका नयातोड़ कम्पनी की खानों के नीचे था। इसलिए अधिकांश मलबा उसी में फैंका जा रहा था। किशन के बापू ने न जाने किस-किस के दरवाजे खट़काए होंगे परन्तु किसी ने कोई मदद नहीं की। अब उसने कोर्ट जाने की सोची थी। एक दिन पटवारी के पास अपने नएतोड़ के कागजात लेने गया तो यह सुनकर हक्काबक्का रह गया कि वह नयातोड़ उसके नाम है ही नहीं। वह तो सरकारी ज़मीन है। उसने आज तक अवैध रूप से कब्जा किया हुआ है। किशन के बापू के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह गिड़गिडा़या, बहुत अर्ज-विनती की कि वह नयातोड़ उसी का है, पर पटवारी ने एक नहीं सुनी। वह तहसीलदार के पास शिकायत लेकर भी गया वहां से भी टका सा जवाब वही मिला। विधायक के पास भी गया पर कोरे आश्वासनों के कुछ नहीं मिला।
सच्चाई यह थी कि कम्पनी के लिए वह जमीन यानी नयातोड़ सोने की खान था। कम्पनी के अफसरों ने पटवारी के साथ मिलीभगत से इसे लीज वाली जगह के साथ ही शामिल करवा लिया था। पटवारी ने सारे कागज बदल दिए थे। इस काम के लिए पटवारी, तहसीलदार, गांव के प्रधान व विधायक तक को अच्छी खासी रकम दी गई थी।

 

किशन के परिवार वालों के लिए यह बात मरने जैसी थी। उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा था कि वे क्या करें। ऊपर से किशन का झमेला था। उसके गुम होने का रहस्य बरकरार था। ऊपर से उसकी बातें समझ से परे हो रही थी। उसकी फिक्र भी लगी रहती। उसने अब अपना कोट भी गवां दिया था। कल कुछ और कर लेगा। क्या भरोसा। एक दिन किशन ने बकरा ही गुम कर दिया था। उस दिन उसे खूब मार भी पड़ी। दिन भर वह पशुओं और भेड़-बकरियों के साथ चरता रहा लेकिन दिन ढलते ही ऐसे गायब हुआ कि कहीं अता-पता ही नहीं चला। उसने खुद भी देर रात तक बकरे को ढूंढा था। फिर थक-हार कर घर आकर बता दिया। उसके बापू ने गांव के एक-दो साथियों के साथ आधी रात तक उसे तलाश किया पर वह कहीं नहीं मिला। फिर यह सोच कर घर चले आए कि हो न हो बाघ खा गया हो। दूसरे दिन किसी ने बताया कि उसे कम्पनी के दो लोग घसीटकर गाड़ी में ले गए। उन्होंने जरूर उसे रात को ही काट कर खा लिया होगा।
इतना ही नहीं दूसरी जगहों से भी मेमने और यहां तक कि घर के आंगन से मुर्गे तक गुम होने लगे थे। पर यह पता आज तक नहीं लग सका कि वे जाते कहां थे। शक कम्पनी के लागों पर होता था परन्तु उनके खिलाफ कोई जुबान तक नहीं खोल सकता था।


चीड़ों के जंगल और पेड़ों की निशानदेही

किशन जिस जंगल में पशु चुगाता वह बड़ा जंगल था। उसमें चीड़ का घना वन था। लगभग एक हजार पेड़ होंगे। उसे सरकार ने संरक्षित वनक्षेत्र घोषित किया हुआ था। उसमें कोई भी व्यक्ति किसी तरह के हथियार मसलन दराट-कुल्हाड़ी नहीं ले जा सकता था पर पशु चुगाने पर पावन्दी नहीं थी। लेकिन कम्पनी के लिए वह वन कागजों में सामान्य दर्शाकर उसे भी लीज पर दे दिया गया था। लोगों ने बहुत विरोध किया। मीडिया ने इस मुद्दे को खूब उछाला पर परिणाम वही ढाक के तीन पात। उस जंगल के भीतर चूने का पत्थर मौजूद ाथा जिसकी कम्पनी को सख्त जरूरत थी। अब धीरे-धीरे चीड़ के पेड़ कटने लगे थे।                      
सात सौ पेड़ों के कटने का समाचार जब गांव वालों ने सुना तो हक्के-बक्के रह गए। यह जंगल उनके लिए महज जंगल नहीं था एक बजुर्ग के साए की तरह था। वहां लोगों के दिन भर पशु चरते। भेड़-बकरियां पलती। औरतें घास-पत्ती उसी में करती। दोपहरिया चीड़ों के पेड़ों के नीचे गुजरती। तरह-तरह के जानवर और पक्षी उसमें बास करते। मोरों की कूहकें दूर-दूर तक सुनाई देतीं यानी वह चीड़ों का जंगल आदमियों के साथ जानवरों और पक्षियों का घर भी था। रोजी-रोटी थी। बसेरा था। किशन के लिए तो वह स्वर्ग के बराबर था।


किशन जंगल कटने से बेहद परेशान था। वह कई दिनों से देख रहा था कि कम्पनी के लोगों के साथ उसके इलाके का पटवारी और गार्ड एक-एक चीड़े के पेड़ के पास जा-जा कर उनके तने छीलते और काली स्याही से उस पर नम्बर लिख दिया करते। ऐसा जब उसने पहली बार देखा था तो एक आदमी से पूछ लिया था,
’’भाई तुम पेड़ों को काट-छील कर इन पर क्या लिखते हो ?’’
 उसने बजाए इस बात का उत्तर देने के उल्टा उसे ही डांट दिया था,
 ’’ओए छोरे! तू इन डंगरों को लेकर अब यहां मत आया कर। ये जंगल अब कम्पनी का हो गया है। सारा कट जाएगा।’’
वह इतना कह कर कुल्हाड़ी से फिर दूसरे पेड़ का तना छिल देता और दूसरा आदमी झटपट उस पर फिर एक नम्बर लिख देता। किशन को यह सब पसंद नहीं था। कम्पनी के लोग पहले दिन जितने पेड़ों के तने छिल कर नम्बर लगाते दूसरे दिन वे नम्बर मिटे होते। किशन का एक काम और बढ़ गया था। पांच बजे जब कामगर छुट्टी करते तो किशन का काम शुरू हो जाता। वह हर पेड़ के पास जाता। उनके तने से कटा छिलका उठाता और नम्बर पर चिपका देता। दूसरे दिन वह इतना चिपक जाता कि कई बार तो पता ही नहीं चलता कि कहीं किसी पेड़ में कोई नम्बर भी लगा था। लेकिन एक दिन जब किशन की इस हरकत का कम्पनी वालों को पता चला तो उसकी शिकायत उसके मां-बाप से करके अब उस जंगल में उसका आना-जाना पशुओं समेत बन्द कर दिया गया था।

 

किशन को उन चीड़ के पेड़ों से बेहद प्यार था। वह दिन भर उनकी छांव में बैठा रहता। कभी किसी पेड़ की टहनी पर चड़ जाता और वहीं से पशुओं और भेड़-बकरियों की जुगाली करता रहता। कभी किसी पक्षी ने छाडि़यों में कोई घोसला बनाया होता तो छुप कर घोसले में बड़े होते बच्चों को देखा करता। उनकी मां उन्हें दूर-दूर से अपनी चोंच में कभी कुछ लाती तो कभी कुछ। बच्चे मां के आने की आहट भर से चैकस हो जाते और चहचाने लगते। घोसलांे से कई चोंचे एक साथ बाहर निकलती जिन में चिडि़या मां बारी-बारी कुछ डालती रहती। फिर उन बच्चों को अपनी पंखों में छुपा लेती और सोई रहती। किशन दबे पांव चलता ताकि चीड़ के पत्तों की सरसराहट से आवाज न आए और चिडि़या के बच्चों की नींद न टूटे।
 

इतना ही नहीं उसने जंगल में कई जगह जानवरों के थावं देखे थे। एक जगह तो एक हिरनी ने कई बच्चे जाए थे। वह एक छोटी सी गुफा थी। किशन उस गुफा के पास भी एक बार जाया करता। कई बार वे बच्चे अकेले होते। किशन के पांव की आहट सुनकर वे चैंकते। चिंचियाते। किशन कुछ बड़बड़ा देता। फिर वे चुप हो जाते। कहीं से हिरनी आती और उस गुफा में चली जाती। उन्हें दूध पिलाती। हैरानी की बात थी कि किशन की उपस्थिति हिरनी को नहीं खलती। यहां तक कि किशन के साथ जो कुत्ते होते वे भी कभी किसी जानवर पर वार नहीं करते।
किशन ने सुन रखा था कि जैसे ही पेड़ों की निशानदेही पूरी हो जाएगी इनका कटना शुरू हो जाएगा। वह इस बावत भी सब से बात करता रहता। कभी किसी से गुहार लगाता तो कभी किसी से। उसका पिता उसे समझाता,
’’किशन क्यों तू इन फिजूल की बातों में जाता है। देख किशन! मत इन कम्पनी के लोगों से पंगा लिया कर। ये खतरनाक लोग होते हैं। कुछ भी कर सकते हैं। हम तो गरीब हैं। क्या कर लेंगे। अपना काम किया कर।’’

 

किशन पिता की बात एक कान से सुनता और दूसरे से निकाल देता। दूर घाटी में जहां वह पशु चुगाया करता वहां से भी घर लौटते या सुबह जाते वह जंगल में घुस जाता और दस-बीस पेड़ों के छिलके वापिस कटी हुई जगहों पर चिपका देता। कम्पनी के लोगों को फिर से दोबारा मेहनत करनी पड़ती। वे खूब चिढ़ते। किशन ने देखा था कि अब पंछियों ने वहां घोसले बनाने भी बन्द कर दिए थे। कोई जानवर भी कम्पनी के आदमियों के डर से उस जंगल में नहीं जाता था। उसने झाडि़यों के नीचे कई घोसले बिखरे-टूटे हुए देखे थे। कई जगहों पर तो पक्षियों के छोटे-छोटे अंगे भी टूटे पड़े थे। इतना ही नहीं चिडि़याओं के छोटे-छोटे बच्चे भी पेड़ों के नीचे मरे हुए किशन ने देखे थे। वह इन सभी को देख कर परेशान हो गया था। उसे न भूख लगती न प्यास। पशुओं के पास दिनभर वह उस जंगल को ही निहारता रहता। किसी ऊंचे टीले पर बैठ कर ये सब देखता रहता। उस जंगल के जानवर भी अब नंगी घाटियों में थांव ढूंढते रहते। पक्षियों को भी कहीं घोसला बनाने तक की जगह नहीं रही थी। कुछ बेचारे तो पत्थर की खानों में कम्पनी द्वारा किए बए ब्लास्टों से ऐसे ही मर जाया करते।

  
पुराने कोट कहां गुम गए
किशन आज जब दिन भर पशु चुगा कर लौटा तो उसके पास दादा का पुराना कोट नहीं था। पहले दिन उसने झूठ बोला था कि वह जंगल में ही भूल आया है। लेकिन दूसरे दिन भी जब कोट उसके पास नहीं था तो बारी-बारी घर के सब लोगों ने इस बावत उसकी अच्छी-खासी तफ़तीश की थी पर किशन ने अपनी जुबान तक नहीं खोली। किशन के पिता ने उस कोट को चार बरस पहले गांव में आए एक किन्नौरे दर्जी से सिलवाया था। अपनी भेड़ की ऊन थी। कितनी मेहनत से सर्दियों के दिनों में उस कोट की पट्टी ऊन कात-कात कर बनी थी। और उसके बाद एक साल तक वह जुलाहे के पास अनबुना पड़ा रहा। चार साल तक किशन के दादा उसे लगातार पहनते रहे थे। मैला होने पर पिछले साल किशन की मां ने रीठे और राख से उसे धो कर साफ तो कर लिया लेकिन उसकी थोड़ी लम्बाई घट गई थी। किशन कभी-कभार इस कोट को पहन कर जंगल जाया करता था।


किशन से उसका परिवार ज्यादा सख्ती भी नहीं करता था। वह उनका इकलौता बेटा था। इसलिए ज्यादा डांट-डपट नहीं हुई थी। पर पूछ रोज होती रहती। किशन कभी चुप रहता और कभी बात टाल कर आंगन में चला जाता। इसी सप्ताह गांव के बुधराम का कोट गुम हो गया। फिर उससे अगले सप्ताह माठू चाचा का। फिर तेलीराम लुहार भी कहीं अपना कोट गंवा बैठा। हद उस दिन हुई जब आंगन की रस्सी में सुखाने डाला पूजारी मनीराम का कोट जाता रहा। कोटों का इस तरह गुम होना गांव में अब एक रहस्य बन गया था। लोग चुपके-चुपके दूर-दूर तक कोटों की तलाश करते पर कहीं भनक नहीं लगती। कुछेक ने तो कम्पनी के मजदूरों के बीच भी गोपनीय तरीके से तलाश की पर वहां भी अतापता न लगा। गांव वालों की समझ में यह बात नहीं आ रही थी कि कोटों के सिवा उनकी कोई दूसरी चीज कभी नहीं गुम हुई।


किशन-कन्हैया की फौज
किशन ने तड़के ही अपने पशु खोल दिए थे। साथ ही गांव वालों के भी। अब गांव के सारे पशुओं का जिम्मा किशन का होता। गांव की चाची-ताईयां जहां उसे अपने किशन-कन्हैया से पुकारती वहां लड़कियां गोपियां बन कर उसकी लाडली हो गई थी। यह इसलिए भी था कि गांव की औरतों और लड़कियों का ज्यादातर समय पशुओं को चुगाने में ही जाया होता था। इसके लिए उन्हें किशन के रूप में एक बढि़या ग्वालू मिल गया था। इसकी भनक मीडिया को भी लग गई थी कि एक गंवई लड़का पूरे गांव के पशुओं को एक साथ चुगाता रहता है और उसका जानवरों और पक्षियों से बहुत प्यार है। कुछ अखबारों ने तो उसके बड़े-बड़े लेख भी छापे थे। एक स्थानीय चैनल ने उसे पशुओं को चराते बढ़चढ़ कर दिखाया था।

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- एस आर हरनोट
 
रचनाकार परिचय
एस आर हरनोट

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