जून 2019
अंक - 50 | कुल अंक - 54
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

प्रकृति में संतुलन
- चन्द्र प्रभा सूद


प्रकृति में संतुलन ईश्वर स्वयं बनाकर रखता है। उसे किसी के परामर्श अथवा सहायता की आवश्यकता नहीं होती। उसकी इस सुन्दर रचना में यानी सृष्टि में कहीं कोई कमी नहीं है। परमात्मा ने ब्रह्माण्ड में जीवों को भेजते समय एक लाइफ साईकिल का निर्धारण किया है। जीव उत्पन्न होगा, फिर बड़ा होगा और अन्त में इस संसार से विदा लेकर अगले पड़ाव यानी नए जन्म की प्रक्रिया से गुजरेगा। जबसे इस ब्रह्माण्ड की रचना हुई है, तब से यह क्रम अनवरत चलता जा रहा है। इसमें कहीँ भी, किसी प्रकार की त्रुटि की गुंजाइश नहीं है।

सूर्य, चन्द्र, ग्रह-नक्षत्र आदि सभी का क्रम निश्चित है। कोई सूर्य की तरह प्रात: आकर रात्रि में विदा लेता है तो कोई चन्द्रमा और सितारों की तरह रात में आकर सवेरे चला जाता है। नदियाँ अपने उद्गम से यात्रा प्रारम्भ करके समुद्र में जाकर विलीन हो जाती हैं। सृष्टि के सभी जीव-जंतुओं के अन्न-जल की व्यवस्था उसने बहुत ही अच्छे ढंग से की है। सबके भोजन के लिए उस प्रभु ने पेड़-पौधों की उत्पत्ति की, जिससे सबको अपनी पसन्द के भोज्य पदार्थ मिलते रहें। धरा पर पेड़-पौधे बहुत अधिक न बढ़ जाएँ, इसके लिए उसने शाकाहारी जीवों की रचना की। वे पेड़ों के पत्ते खाकर अपना पेट भरते हैं।

पशु-पक्षियों के लिए उसने ऐसी व्यवस्था की है, जिससे उन्हें हर स्थान पर भोजन मिल सके। हाँ, इन्सान के लिए कुछ अधिक श्रम का प्रावधान रखा ताकि वह उसके लिए जी-तोड़ मेहनत करे और उस मालिक को भी याद करता रहे। पर्वतों की चटटानों और पत्थरों में भी उसने जीवों के लिए भोजन छिपाकर रखा है, जिसे वे अपनी ज़रुरत के समय खा सकें।

पृथ्वी पर पशुओं की संख्या अधिक न होने पाए इसलिए उसने मांसाहारी जीवों की रचना की। वे शिकार करते हैं और अपना भोजन प्राप्त करते हैं। उन्हें भी बैठे बिठाए भोजन नहीं मिलता बल्कि उन्हें भी इसके लिए संघर्ष करना पड़ता है। कवि ने बड़े सुन्दर शब्दों में कहा है-

न हि सुप्तस्य सिंहस्य मुखे प्रविशन्ति मृगा:।
अर्थात् सोए हुए शेर के मुँह में स्वयं पशु नहीं जाता।


कहने का तात्पर्य यही है कि अपने भोजन को प्राप्त करने के लिए सभी को संघर्ष करना पड़ता है। उस मालिक ने सबके लिए ऐसा प्रबन्ध कर दिया है कि उसे भोजन तो मिले पर उसके लिए परिश्रम करने की शर्त भी लगा दी।

कहते हैं ‘बड़ी मछली छोटी मछली को खाती है।’ इसका भी यही अर्थ है कि जलचरों की संख्या बहुत अधिक न हो जाए, इसलिए यह विधान रच दिया। इस दुनिया में कहीं पशुओं की अधिकता न हो जाए, अत: शेर, चीते, बाघ जैसे खूँखार जीवों की रचना की ताकि पशुओं का सृष्टि में अनुपात बना रहे। चील, गिद्ध, सियार आदि जीव बनाए, जो बचे हुए मांसाहार को साथ-साथ निपटा सकें, जिससे पर्यावरण दूषित न होने पाए। पृथ्वी पर कहीं भी बदबू न हो। पेड-पौधों का सन्तुलन बनाए रखने के लिए शाकाहारी जीवों को उत्पन्न कर दिया।

इन्सानों का अनुपात बिगड़ने न पाए इसलिए प्राकृतिक आपदाओं यानी सुनामी, बाढ़, भूकम्प आदि का समावेश कर दिया। इसके अलावा समय-समय पर अतिवृष्टि, अनावृष्टि, ओलावृष्टि आदि भी होती रहती है, जिससे मनुष्यों की जनसंख्या में भी सन्तुलन बना रहे और आवश्यकता से अधिक आबादी न बढ़ सके।


अपने घर में देखते हैं कि दीवार पर रेंगने वाली छिपकली मच्छर आदि कीटों को खाती है। जो जीव दूसरे जीवों को खाते हैं, उनके मारने के बाद वही जीव उन्हें खा जाते हैं। जैसे साँप के मरने के बाद चींटियाँ उसे खा जाती हैं। जो अग्नि सबकुछ जलाकर भस्म कर देती है, जब वह बुझ जाती है तब हर कोई उसे रौंदकर चल देता है।

मांसाहारी मनुष्य बहुत गर्व से कुतर्क देते हैं कि इन्सान के लिए ईश्वर ने सभी जीवों को बनाया है, इसीलिए हम उन्हें खाते हैं। यह सच है कि सृष्टि के जीवों से सहायता लेने के लिए ईश्वर ने मनुष्य को सामर्थ्य दी है परन्तु उन्हें मारकर खाने की आज्ञा वह कदापि नहीं देता। उस मालिक ने हर प्रकार के प्रबन्ध स्वयं किए हुए हैं। उसे सांसारिक मनुष्यों की सहायता की कोई आवश्यकता नही है।


हम मनुष्य ही हैं जो स्वयं को बहुत ही बुद्धिमान समझते हैं। हमें लगता है कि ईश्वर तो नासमझ है, हम ही हैं जो इस संसार का सन्तुलन बनाकर रखने में समर्थ है। परन्तु हम कार्य इसके विपरीत करते हैं। सारी प्रकृति को दूषित करके भी हमें चैन नहीं मिल रहा। पेड़ों की अन्धाधुन्ध कटाई करके हमने मौसम को गर्म कर दिया है। उस पर ए.सी. और गाड़ियों के धुँए ने भी पर्यावरण को बहुत हानि पहुँचाई है। नदियों में रिहायशी नालों का गन्दा पानी और फैक्ट्रियों का कचरा, उनके पानी को पीने योग्य नहीं रहने दे रहा। इस तरह हम मनुष्यों ने पर्यावरण के साथ छेड़छाड़ करके अपने लिए अनेक बीमारियाँ मोल ले ली हैं।

इसलिए ईश्वरीय विधान मेँ अपनी टाँग अड़ाना हम मनुष्यों को छोड़ देना चाहिए। वह बहुत ही समर्थ है, उसे हम इन्सानों की सहायता की कोई आवश्यकता नहीं है। सदा यह स्मरण रखना चाहिए कि वह स्वयं सबकुछ सम्हाल सकता है।


- चन्द्र प्रभा सूद

रचनाकार परिचय
चन्द्र प्रभा सूद

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