प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2019
अंक -50

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

कब थमेगा पशु-पक्षियों पर अत्याचार
- मुरलीधर वैष्णव


समस्त चराचर में ब्रह्म का अस्तित्व मानने वाले हमारे जीवन दर्शन में हमारे सहजीवी पशु-पक्षियों के प्रति प्रेम, दया और संरक्षण का भाव सदा से ही रहा है। इतना ही नहीं उन्हें हमारे देवताओं की सवारी जैसे गणपति का चूहा, माँ दुर्गाा का सिंह, लक्ष्मी का उल्लु, कार्तिकेय का मोर, विष्णु का गरूड़, शिव का नंदी (बैल) के रूप में उन्हें गरिमा प्रदान की गई। काक भूषण एवं शुकदेव जैसे तपस्वियों के जन्म का सीधा संबंध क्रमश: कौवे और तोते से रहा। जटायु जैसा पक्षी रामायण का प्रमुख चरित्र रहा। तात्पर्य यह कि हमारी प्यारी पृथ्वी पर पर्यावरण संतुलन के लिए ही नहीं अपितु मनुष्य के अच्छे सहजीवी के रुप में भी इनकी संरक्षण की परम आवश्यकता है। गरूड़ पुराण में पशुओं को चारा और पक्षियों को चुगादाना डालने के पुण्य का सीधा प्रभाव मनुष्य की सुख शांति एवं दुर्घटना मुक्त जीवन से माना गया है।

वसुदेव कुटुम्बकम् की परिकल्पना में कुटुम्ब केवल मनुष्यों से ही नहीं कहलाता है। इस पृथ्वी की नदियाँ, पहाड़, आकाश, जंगल और उनमें बसने-चरने वाले पशु-पक्षी भी इस वैश्विक परिवार के आवश्यक अंग होते हैं। स्वतंत्रता और जीवन का अधिकार क्या केवल मनुष्यों के लिए ही है, पशु पक्षियों के लिए नहीं? पशु-पक्षी की प्राकृतिक स्वच्छन्दता का हनन और अपने स्वार्थ के लिए उन पर नाना प्रकार के अत्याचार न केवल हमारी पाश्विक वृति के सूचक हैं अपितु बहुत तेजी से पर्यावरण संतुलन को बिगाड़कर हम इस प्यारे से ग्रह को रसातल की ओर तेजी से धकेल रहे हैं। आज मनुष्य अपनी वासना-वृद्धि और सौन्दर्य-प्रसाधन सामग्री के लिए, तो कभी वैज्ञानिक शोध के नाम पर पशु-पक्षियों के प्रति जिस कदर भयंकर क्रूरता का व्यवहार कर रहा है, उसके हालात अश्रवणीय तथा दृश्य ह्दय विदारक हैं।

रोंगटे खड़े करते हैं ये तथ्य
उड़ीसा में ओलिवर रिडले प्रजाति के हजारों समूंद्री कछुए अवैध रूप से मछली पकड़ने वालों के जाल में फंसकर तथा उनके ट्रोलरों से कुचलकर दम तोड़ देते हैं। राजस्थान, गुजरात व मध्यप्रदेश में सांडा (बड़े लिजार्ड्स) को कामोत्तेजक दवा के रूप में क्रूरता से इस्तेमाल करते हुए बेचा जाता है। मोटी रकम देने वालों के सामने ही सांडा की गर्दन काटी जाकर उसे उबलते हुए पानी में डाला जाता है। फिर उसकी कटी गर्दन से एक पीले रंग का लचीला पदार्थ निकलता है, जिसे एक शीशी में भरकर 500/- रूपये से 800/- रूपये प्रति शीशी दर से बेचा जाता है। सांप प्रजाति के कुछ रेंगने वाले जीवों की हत्या तो भयावह तरीके से की जाती है। उन्हें पेड़ के तने से सटाकर पिनें लगाकर जीवित अवस्था में ही उनकी चमड़ी उतार दी जाती है ताकि चमड़ी मुलायम रहे। करोड़ों मेंढ़कों की टाँगें काटकर उनके शेष बचे अंग को तड़प-तड़प कर मरने के लिए सिर्फ इसलिए फेंक दिया जाता है ताकि मांसाहारियों के लिए उनकी टांगों से बने स्वादिष्ट व्यंजन विदेशों एवं विशेषत: खाड़ी देशों व यूरोपीय देशों में महंगे दामों में बेचे जाकर भारी मुनाफा कमाया जा सके। ऐसे ही व्यापार के लिए शार्क मछली का फिन नामक अंग अलग से काटा जाकर उसके व्यंजन से व्यापारी मालामाल होते हैं।

वैज्ञानिक परीक्षण के नाम पर क्रूरता
समुद्र के किनारे किए गये विस्फोटों से भी हजारों मछलियें मारी जाती हैं। वैज्ञानिक परीक्षण के नाम पर पशु-पक्षियों के साथ नाना प्रकार के अत्याचार किए जाते हैं। करीब साठ हजार प्रकार के रसायनों का प्रयोग विभिन्न पशु-पक्षियों पर उन्हें असहनीय यातना देते हुए किया जाता है, जिससे औरतों व आदमियों के लिए विभिन्न प्रकार की श्रृंगार प्रसाधन सामग्री बनाई जा सके।
इसके लिए खरगोश, सुअर, कुत्तों, चूहों और बन्दरों पर विभिन्न रसायनों के कुप्रभावों की जाँच निरंतर रूप से की जाती है। उनकी आँखों की कोर्निया में होने वाली जलन का अनुमान प्राप्त करने के लिए उनकी आँखों में खतरनाक मात्रा में रसायन डाला जाता है, जिससे ऐसे हजारों जानवर अन्धे तक हो जाते हैं।
शरीर के तंतुओं (टिश्यूज) पर कुप्रभाव जानने के लिए अनेक पशुओं को बहुत गर्म और बर्फ-सी ठंडी प्लेटों पर बैठाया जाता हैं। हेलमेट बनाने वाली कम्पनी द्वारा अपने उत्पाद की प्रभावी उपयोगिता जाँचने के लिए बन्दरों के गले में लोहे की प्लेट पहनाकर उनकी गर्दन की हड्डी तोड़ने का प्रयोग किया जाता है। एक अनुमान के अनुसार हर वर्ष एक करोड़ पन्द्रह लाख पशु-पक्षियों की यातनाप्रद हत्या तो केवल अमेरिका की प्रयोगशालाओं में वैज्ञानिक प्रयोगों के नाम पर कर दी जाती है। पूरे विश्व में तो यह आँकड़ा करीब ढ़ाई करोड़ से अधिक संख्या को छूता है। चर्म रोग और विशेषत: खुजली (स्केबीज) के प्रयोग के नाम पर बन्दरों एवं कुत्तों को भयंकर यातना दी जाती है।


वैज्ञानिकों से जब यह पूछा जाता है कि पशु-पक्षियों पर ये प्रयोग क्यों किये जाते हैं तो वे कहते हैं कि ये हम मनुष्यों जैसे ही होते हैं लेकिन जब प्रयोगों के लिए उनके साथ क्रूरता करने पर उनकी पीड़ा के बारे में पूछा जाता है तो उनका जवाब होता है कि पीड़ा का एहसास उन्हें वैसा नहीं होता है जैसा मनुष्यों को होता है, लेकिन इस तर्क में छिपे घिनौने झूठ को कोई भी संवेदनशील व्यक्ति महसूस कर सकता है।

जन सहयोग एवं कानून
वर्ष 1980 में प्रोफेसर चार्ल्स आर मेजेल ने पेटा (पिपुल फोर एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनीमल्स) नामक अंतर्राष्ट्रीय संस्था की स्थापना की, जिसने पुलिस रेड करवाकर तथा चेतना फैलाकर हजारों पशु-पक्षियों को प्रयोगशालाओं की यातनाओं से मुक्त कराया है। भारत में भी प्रसिद्ध पक्षी विशेषज्ञ डॉ. इकबाल मलिक की संस्था वातावरण तथा मेनका गांधी के प्रयासों के कारण इस दिशा में कुछ चेतना फैली है। राजस्थान एवं हरियाणा में विश्नोई समाज की पर्यावरण अनुकरणीय है अनाथ हरिण के बच्चे को विश्नोई समाज की स्त्री अपने बच्चे की तरह स्तनपान कराकर उसकी रक्षा करती है। अबोध पशु शिशु के प्रति मातृत्व एवं करूणा का ऐसा दिव्य उदाहरण विश्व में शायद ही कहीं मिलेगा।

जलवायु प्रदूषण की भांति शोर प्रदूषण से भी पशु-पक्षियों को भारी यातना का सामना करना पड़ता है। यदि बंदूक की एक गोली से एक पक्षी मरता है तो उसके शोर और सदमें से समीप के पाँच पक्षी घायल हो जाते हैं। डॉ. इकबाल मलिक के अनुसार आदमी द्वारा पक्षियों के लगातार शिकार से पक्षियों के स्नायूजनित (न्यूरोटिक) व्यवहार में भारी अंतर आया है। वे जब भी मनुष्य के सम्पर्क में आते हैं, बैचेन हो उठते हैं और एक अजीब तनावपूर्ण व्यवहार करने लगते हैं। यदि जंगल में कृष्ण के आसपास तोते, मोर, हरिण, गायें आदि हर वक्त रहती थी तो उसका मुख्य कारण यही था कि उनके मन एवं दृष्टि में उनके लिए असीम प्रेम और करूणा थी। अब इसके ठीक विपरीत आदमी के मन में पशु-पक्षियों के प्रति क्रूरता एवं हिसंक भाव होगा तब निश्चित रूप से वे सदैव उनसे भयाक्रांत रहेंगे।

जैसा कि सभी जानते हैं कि इंग्लैंड के प्रसिद्ध साहित्यकार एवं चिंतक जार्ज बर्नार्ड शा पूर्णतः शाकाहारी थे। एक बार वे जब काफी बीमार हो गये तब डॉक्टर ने उन्हें कहा कि इंग्लैंड की जलवायू के अनुसार उन्हें माँस खाना शुरू कर देना चाहिये अन्यथा उनका बचना कठिन हैं। उन्होंने तत्काल उस डॉक्टर के सामने ही अपने वकील को बुलाया और कहा कि मेरी वसीयत लिखो। उन्होंने कहा कि जीवित रहने के लिए मैं अपने सहजीवी पशु-पक्षियों को नहीं मार सकता। आगे उन्होंने अपनी वसीयत में लिखवाया कि उनकी मृत्यु के बाद उनके अंतिम संस्कार जलसे में भेड़, बकरियाँ, मुर्गियाँ तथा मछलीघर (एक्वेरियम) में मछलियाँ शरीक होंगी, जिनके शरीर पर निम्न नारों की तख्तियाँ लगी होंगी “ये उस शख्स का जनाज़ा है, जिसने हमें बचाने के लिए अपने प्राण दे दिये"। हालांकि उसके बाद भी बर्नार्ड शा शाकाहारी रहते हुए कई वर्ष जिये लेकिन यह प्रसंग उनके पशु-पक्षी प्रेम की गहराई को दर्शाता है।

वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 के 42 वर्ष बाद भी हज़ारों पशु-पक्षी आदमी की पशुवृति के कारण शिकार हो जाते हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 ए (जी) में नागरिकों का यह मौलिक कर्तव्य बतलाया गया है कि वे देश के पर्यावरण अर्थात् उसके वन, झीलों, नदियों, जंगल का संरक्षण करें तथा जीवों के प्रति करूणा भाव रखें। इसी उद्देश्य की प्राप्ति हेतु पशु अत्याचार निवारण अधिनियम 1960 तथा वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 के कानून बने। भारत साइट्स अर्थात् कन्वेन्सन ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड इन एनडेंजर्ड स्पेसिज ऑफ वाइल्ड फ्लोरा एंड फौना का सदस्य बना। इन सभी कानूनों का उद्देश्य जंतुआलयों की स्थितियों में गुणात्मक सुधार, लुप्त प्राय: पशु-पक्षियों का उनके प्राकृतिक वातावरण में संरक्षण, प्रजनन एवं पक्षियों तथा वन्य पशुओं संबंधी उत्पाद के क्रय-विक्रय पर रोक आदि था। वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत वन्य जीवों के शिकार पर पांच वर्ष के कारावास एवं पच्चीस हजार रूपये जुर्माने की सजा हो सकती है लेकिन इस कानून की पालना में उदासीनता के कारण आज वन्य जीवों का अस्तित्व खतरे में हैं।

क्या करें?
पर्यावरण व पशु पक्षियों के प्रति प्रेम व करूणा भाव रखने के लिए प्राथमिक शिक्षा स्तर से ही बच्चों को शिक्षित तथा लोगों में जन चेतना विकसित करनी होगी। इसके लिए गैर सरकारी संस्थाओं को निष्ठा भाव से आगे आना होगा। कानून को और अधिक कठोर बनाकर उसकी पालना सुनिश्चित करनी होगी। सरकार को इसके लिए एक दूरगामी योजना बनाकर उसे कार्य रूप देना होगा।

स्पष्ट है कि हमारे सहजीवी पशु-पक्षियों को केवल कानून ही नहीं अपितु आदमी स्वयं ही अपनी इच्छा शक्ति से बचा सकता है। उन्हें भी उनके प्राकृतिक वातावरण में स्वछन्दता व सहजता से जीने का अधिकार दे सकता है, जिसके कि वे उतने ही हकदार हैं जितना कि आदमी स्वयं। यदि आदमी का पशु-पक्षी पर अत्याचार थमा नहीं और वह उन्हें अपनी भूख या सौन्दर्य प्रसाधन के लिए मारकर उनकी निर्जीव देहों को अपने ड्राइंग रूम्स में सजाता रहा तो प्रकृति का मिज़ाज कभी यूँ भी बदल सकता है कि शेर-बघेरे एक दिन नरभक्षी बनकर आदमी के मुंड अपनी गुफाओं-मांदों में सजाने का सौन्दर्य बोध प्राप्त कर लें। ऐसा कहा जाता है कि यदि किसी देश में जीवन को मूल्यवान समझा जाता है तब वहाँ पशु-पक्षी के जीवन का भी महत्व समझा जाता है।


- मुरलीधर वैष्णव
 
रचनाकार परिचय
मुरलीधर वैष्णव

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