प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2019
अंक -50

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्यांकन

पर्यावरण के लिए प्रतिबद्ध-संघर्ष की करूण पुकार है हरनोट का कथा-संसार
- डॉ. हरीदास व्यास

 



यदि आपको प्रकृति को पात्र के रूप में सबसे जीवंत रूप में देखना है, हिमाचल के सुन्दरतम पहाड़ों, नदियों, वृक्षों, धाराओं और इन सभी की मिली-जुली सबसे दिलकश ख़ुशबुओं से सराबोर होना है, साथ ही मनुष्य की सबसे भोली प्रजाति और उसके सामर्थ्य भर संघर्ष को तथा विकास और प्रकृति के बीच सम्बन्ध के सबसे डरावने सच को भी यदि सचमुच सबसे विश्वसनीय रूप में जानना है तो आपको वरिष्ठ रचनाकार एस. आर. हरनोट के कथा संसार की यात्रा करनी ही होगी। वे पर्यावरणीय कथानकों के सबसे विश्वसनीय कथाकार हैं। निस्संदेह वे पर्यावरणीय साहित्य सृजन के 'केलाश सत्यार्थी' हैं। कथा के अतिरिक्त भी उनके समग्र लेखन को देखा जाय तो यह बात और भी दृढ़ता से कही जा सकती है कि श्री हरनोट प्रकृति, मनुष्य और जीवन के पारस्परिक बेहतर संबंधों के लिए अशेष प्रतिबद्धता के साथ संघर्ष करने वाले रचनाकार हैं। पर्यावरण के लिए सोद्देश्य लेखन के वे भारत में न केवल सर्वोपरि बल्कि सर्वाधिक रुचिकर लेखक भी हैं।

हरनोट की कहानी 'दारोश' पर बनी फिल्म शेष कला जगत के लिए भी अनेक रूपों में विचारणीय कृति बनी। अंग्रेजी, मलयालम, उडिया, मराठी, तमिल, गुजराती, पंजाबी आदि भाषाओं में उनकी अनूदित कहानियों ने हरनोट को अहिंदी भाषी क्षेत्रों के रचना प्रेमियों के बीच बहुत शीघ्र लोकप्रिय-रचनाकार बना दिया। कथाकार हरनोट का लेखन, उनकी शैली सभी भाषाओं में समान रूप से प्रभावी होने का सच निस्संदेह पुरसुकून विषय है।

किसी भी कथाकार और पाठक को हरनोट इस बात से ही चकित कर देते हैं कि जीव-जंतु प्रकृति उनके लिए सम्वेदनशील, संवाद करते, सुख-दुःख साझा करते ऐसे जीवित तत्व हैं, जिनका अनुभव संसार ठीक इंसानों जैसा है। वे भी घबराते हैं, परेशान होते हैं, झुंझलाते हैं, खुद के लिए ही नहीं बल्कि अपनी भावी पीढ़ियों का अस्तित्व बचाए रखने के लिए सामर्थ्य भर संघर्ष करते हैं। वे सभी सभ्य इंसानों की तरह अनुशासनप्रिय हैं, शुचिताप्रिय हैं। परन्तु, विकास का मुखौटा पहनकर इस प्रशांत क्षेत्र में हाहाकार मचाने इंसानी शक्लों में आए जानवरों, कानफोडू शोर मचाती मशीनों से बुरी तरह भयभीत भी हैं। भला 'आभी' केवल एक चिड़िया-भर कैसे हो सकती है!!
वह तो अपने घर-आँगन को हर पल स्वच्छ-सुन्दर रखने के लिए प्रण-प्राण से जुटी वह लड़की है, जिसे अपने घर-आँगन में एक तिनका-गन्दगी पल भर के लिए भी कतई मंजूर नहीं है। 'सरेऊलसर' झील उसका आँगन है। पेड़ से गिरा एक-एक तिनका, पत्ता वह चोंच से उठाकर उसी पल दूर फेंक आती है। जंगल के देवदारु, बुरांश, चीड़, बान जैसे वरिष्ठ वृक्ष भी इस 'आभी' का सम्मान करते हैं। कौन समझ सकता है इस 'आभी' की परेशानी, थकान, चिड़चिड़ाहट को उस समय जब पहाड़ पर घूमने आए इंसान के फैलाए भांति-भांति के प्लास्टिक और कचरों को झील के आँचल से हटाते-हटाते वह बुरी तरह थककर चूर होने के बाद भी, साँस उखड जाने की हद तक फूल जाने पर भी झील की सतह पर बेशुमार फैले कचरे को चोंच से उठाकर दूर फेंकने की ज़िद पूरी कर रही है- "आभी के लिए यह प्लास्टिक का कचरा आफत बन गया है। यह किसी दूसरी दुनिया या अजनबी जंगल का कचरा है, जो इंसानों के झोलों से निकलता है।"(1)


'आभी' हो या 'बेजुबान दोस्त' किशन हो सभी सहमे हुए हैं। विकास नामक देत्य से परेशान-त्रस्त हैं। निकम्मा माना जाने वाला किशन पूरे जंगल के पशुओं-पक्षियों का और गाँव वालों का भी ग्वाला कृष्ण बन जाता है। उसकी बिन बोली भाषा पशु-पक्षी ही नहीं, पूरा जंगल समझता है। कटते जंगलों के लिए अकेले किशन ने पक्षियों के सुरक्षित घोंसलों के लिए गाँव भर के लोगों के कोट चुरा लिये हैं और अब उन कोटों की जेबों में चिड़ियाएँ अंडे देती हैं। यह बावला-सा दिखने वाला अपढ़ किशन पशुओं की फौज लेकर जंगल काटने आए ट्रकों के सामने खडा हो जाता है। सच मानिए यह किशन नहीं खुद हरनोट पूरी शिद्दत से खड़े हैं। किशन के साथ ही क्यों, वे 'सड़ान' के कैप्टन नीरम नेगी के साथ भी खड़े हैं, जिनकी उम्र भर की मामूली बचत से दूर पहाड़ी पर बा-मुश्किल बनाए घर को संत बने अपराधी भगवानदास के नकली वैष्णवों द्वारा 'देवी' को प्रकट करवाने के षडयंत्र से ख़तरा उत्पन्न हो गया है। अवैध रूप से रात के अँधेरे में पहाड़ में खोदी जा रही सुरंग के लिए किए जाने वाले ब्लास्टों से नेगी के घर में दरारें आ गई हैं। पुलिस और प्रशासन पूरी तरह भगवानदास के साथ हैं, नेगी की आवाज़ सुनने को कोई तैयार नहीं है और नेगी का परिवार हर पल आशंकाओं से सहमा हुआ है। रचनाकार हरनोट के लिए हिमाचल-क्षेत्र इस देश का एक सामान्य भूखंड मात्र नहीं है बल्कि मनुष्य को प्रकृति का सबसे खूबसूरत उपहार है। हरनोट उस अंचल के जंगलों की हवाओं को पहचानते हैं, तमाम पेड़ों की सरासराहटों को समझते हैं, पक्षियों की चहचहाहटों से उनकी खुशी या भय को समझते हैं, नदी के बहाव से नदी पर आने वाले खतरों को समझते हैं। 'जलोरी' के प्राचीन मंदिर की देवी बूढ़ी नागिन माँ चुप रह सकती है, अब प्रगटाई जाने वाली नकली वैष्णवों देवी चुप रह सकती हैं, पहाड़ी पर बिराजे हनुमान जी चुप रह सकते हैं पर कथाकार हरनोट चुप नहीं रह सकते। वे कभी 'टीकम' बनकर गाँव वालों को सूचना देते हैं कि 'नदी गायब है', कभी 'लाल होता दरख़्त' की 'मुन्नी' बनकर प्रकृति (पीपल) से ब्याह रचाते हैं, कभी 'मिट्टी के लोग' का 'बालदू' बनकर न केवल अपने परम्परागत हुनर को बचाए रखते हैं बल्कि ग्राम-पहाड़ को लीलते विकास को विजयी चुनौती भी देते हैं, हरिसिंह चौधरियों को सामान्य से लोगों के साथ मिलकर पराजित भी करते हैं।

यह एक दुखद सच है कि हमारे देश में विकास के सहगामी प्रयत्नों के अंतर्गत प्रकृति और पानी बचाए रखने के लिए हमारे पास कोई योजना नहीं होती है। जबकि विश्व के अन्य तमाम देशों ने विकास के साथ संसाधनों के संरक्षण का भी पूरा प्रावधान रखा है। इजरायल में पानी के अपव्यय पर सजा की व्यवस्था है, फ्लोरिडा में जल का पुनः चक्रण न करने पर जुर्माना लगाया जाता है, आस्ट्रेलिया, अमेरिका और यूरोप के तमाम देशों में टॉयलेट में केवल पुनः चक्रित पानी का ही उपयोग होता है लेकिन हमारे यहाँ हर वर्ष 'टीकम' अपने गाँव वालों को नदी गायब होने की सूचना देने के लिए मजबूर हैं। प्रसिद्द पर्यावरणविद डॉ. डी.डी. ओझा कहते हैं- "जीवन से जल का अटूट सम्बन्ध है। जीवन को जिन चीज़ों की ज़रूरत होती है, वे केवल पानी में ही मिलती हैं। जल में ही वो गुण पाए जाते हैं जो जीवन की उत्पति और विकास में सहायक होते हैं। उसे देखकर इस बात की पुष्टि होती है कि जल ही जीवन है।"(2)

रचनाकार हरनोट इस बात से आहत हैं कि हमारी सरकारें इतने बड़े पर्यावरणविद् की बात भी न केवल अनसुनी कर रही है बल्कि उसी सरकार के मुलाजिम और कुछ स्थानीय बिकाऊ लोग विकास के नाम पर जंगलों-पहाड़ों में पसर रही कम्पनियों को तमाम अवैध काम करने में सहायता देते हैं और उसके बदले मोटी रकम कमाते हैं। ऐसे बिकाऊ लोगों की मासूम संतानें तो बेशक अपने पिता से पूछती हैं- "बापू! मास्टर जी कहते हैं कि पेड़ काटना अपराध है, पाप होता है। फिर तू क्यों काटता है?"(3)

कथाकार हरनोट की पर्यावरण चेतना भरी कहानियों से प्रेरित होकर इस चेतना-स्वर को हाल ही में हिन्दी के कुछ कथाकारों ने और मुखर किया है। इनमें कथाकार 'कमलेश' का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। हाल ही में 2018 के जून माह के मासिक 'हंस' में उनकी प्रकाशित कहानी 'पत्थलगड़ी' कहानी में बूढा आदिवासी 'आलसाराम' अपनी आदिवासी जमात से पहाड़ों, नदियों, जानवरों को बचाने का आह्वान करने के कारण शहर से आए अनजान लोगों द्वारा मार दिया जाता है। आलसाराम बेदिया के पोते सोगराम को डर है कि उसके दादा के ही नक्शे-क़दम पर चल रहे पिता 'बिसराम बेदिया' भी किसी दिन इसी तरह मारे जायेंगे। बेदिया न केवल अपने आदिवासी भाईयों को बल्कि शहर से जंगलों में घूमने आए आम शहरी लोगों को भी कहता है- "देखिए, पहले आप लोग मेरी बात सुनिए। जमीन हमारी, पेड़ हमारे, जंगल हमारे बाप-दादों के। फिर ये कंपनी वाले उन्हें काटने और खोदने वाले कौन! ये सारे जलप्रपात हम आदिवासियों के हैं। सरकार ने इन पर कब्ज़ा कर लिया है। वह इन सबसे पैसे कमा रही है और हम भूखे मर रहे हैं। तुम लोग दसम जलप्रपात जाओ। वहाँ लोगों ने 'पत्थलगडी' की है। 'पत्थलगडी' मतलब हम आदिवासियों का ऐलान। इन पत्थरों पर लिखा है कि ये पूरा जंगल और नदियाँ हमारी हैं लेकिन सरकार ने इन पर धोखे से कब्जा कर लिया है। आज नहीं तो कल सरकार को इन्हें खाली करना होगा।"4

देश में जून 2018 के अंतिम सप्ताह में झारखंड के खूंटी क्षेत्र में हुई 'पत्थलगडी' की घटना, चार जवानों का आदिवासियों का अपहरण से अब यह भी स्पष्ट हो गया है कि 'विकास, प्रकृति और संस्कृति' के संतुलन हेतु सरकारों को विवेकपूर्ण और व्यावहारिक निर्णय ही लेने होंगे। हम सभी को और सरकारों को यह भी भली-भाँति समझना ही होगा कि पर्यावरण का तात्पर्य केवल बाह्य प्रकृति के संतुलन से ही नहीं होता बल्कि इस संतुलन का उत्स तो मानव मन के भीतर छिपा है। प्रदूषण का प्रारम्भ तो वहाँ से होता है। स्वहित केन्द्रित और अदूरदर्शी मनुष्य ही विश्व के सभी प्रकार के पर्यावरण प्रदूषणों का मूल कारण होता है। सर्वप्रथम अनैतिक प्रदूषण मनुष्य-मन के भीतर पनपता है। रचनाकार हरनोट की यही मूल चिंता है। वे भीतर ही भीतर जानते हैं कि इस प्रदूषित सोच के भयावह परिणामों से आखिर कब तक किशन, आभी, कैप्टन नेगी, टीकम, बालदू, रामेश्वरी, अमरो, चुन्नी, मुन्नी, अपाहिज नसमू और कुबड़ी जैसे लोग लड़ पाएंगे!! कब तक गाएँ, बैल, कुत्ते किशन के साथ मिलकर जंगल के पेड़ काटने के लिए आने वाली गाड़ियों को रोक पाएंगे!! इसलिए वे कभी कहानी रचकर तो कभी उपन्यास 'हिडिम्ब' लिखकर इस मानव मन को प्रदूषण रहित रखने की प्रेरणा देते हैं। लेखक मन इससे भी संतुष्ट नहीं होता तो 'हिमाचल के मन्दिर और उनसे जुड़ी लोक कथाएँ' लिखकर मनुष्य को समझाना चाहते हैं, 'हिमाचल से जान पहचान' लिख कर मनुष्य को प्रकृति की सुन्दरता से रूबरू करवाते हैं। वे मानव के प्रदूषित मन को निर्मल करने के लिए हर संभव प्रयास करते हुए 'आभी' चिड़िया की तरह छटपटा रहे हैं।
'नदी गायब है' की भाषा ने इन कहानियों को अपने उद्देश्य में सफल करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। पंछिया, वान्छती दरोठी, बाच्छी, हाछी, पैचाणा, बजंतर जैसे अनेकानेक आंचलिक शब्दों का इतना सटीक, सार्थक और उपयुक्त-प्रयोग किया है कि पाठक उस अंचल के और अन्तरंग हो जाता है, वहाँ का कलेवर और स्पष्ट बिम्ब बन कर उभरता है।


'लिटन ब्लॉक गिर रहा है' जैसी कहानी में पहाड़ के लोगों के साथ वहाँ के बंदरों और कुत्तों की मनोवृति की अभिव्यक्ति भी चमत्कृत करती है। परन्तु 'सड़ान' कहानी का कैप्टन नीरम नेगी की उम्र भर की कमाई से पहाड़ पर बसने का सपना साक्षात करने वाला शिखर पर बना मकान पाखंडी संत भगवान दास द्वारा देवी प्रकटाने के चमत्कार के चक्कर के कारण खतरे में है। ऐसे भयंकर तनाव के विषय के विषाद को कैप्टन नेगी का अंधेरी रात का सौन्दर्य देखते हुए तुरंत ही कुछ समय के लिए भूल जाना थोड़ा अस्वाभाविक भी लगता है। ऐसी भूल लेखक द्वारा प्रकृति के सौन्दर्य को स्थापित करने की प्रबल आकांक्षा के कारण भी हो सकती है।
कथाकार हरनोट की इस तड़प को विदुषी डॉ. उषारानी राव ने समझा तो उन्होंने इस उद्देश्य को और प्रभावी, और उद्देश्य-केन्द्रित करने के मकसद से लेखक की पर्यावरण के लिए सर्वाधिक करुण पुकार भरी कहानियों को एक जगह एकत्र कर संपादित किया। इसलिए यह सम्पादन भी पर्यावरण बचाने का एक करुण आह्वान है। आइए इसे सुनें और गुनें भी।





समीक्ष्य पुस्तक- नदी गायब है
रचनाकार- एस. आर. हरनोट
संपा.- डॉ. उषारानी राव
प्रकाशन- अनन्य प्रकाशन
पृष्ठ- 160
मूल्य- 325 रूपये


- डॉ. हरीदास व्यास
 
रचनाकार परिचय
डॉ. हरीदास व्यास

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