प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2019
अंक -50

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

संस्मरण
निवासी बन गए शरणार्थी
 
करीब बीस वर्ष पहले हमारा परिवार मणिनगर स्थित फ्लेट छोड़कर वेजलपुर गाँव के पास, शुभकामना सोसाइटी की अठारह नंबर की कोठी में रहने आया। तब मैं छठठी कक्षा में पढ़ता था। हमारी सोसाइटी तक पहुँचने के दो ही रास्ते थे, जिसे पगडंडी कहा जा सकता था। एक, वस्त्रापुर रेल्वे क्रॉसिंग से आगे बढ़ती हुई खेतों के किनारों से गुजरती हुई हमारी सोसाइटी तक आती थी। दूसरी, दक्षिण की ओर स्थित जोधपुर गाँव से निकलकर खेतों के बीच में से गुजरती हुई हमारी सोसाइटी तक पहुँचती थी, जिसके दोनों ओर थूहर की बाड़ें थीं। दिल के किसी कोने में दर्द की अनुभूति हो रही है कि अहमदाबाद शहर के आसपास के न जाने कितने गाँव विकास रूपी पंजे का शिकार बनकर अपना अस्तित्व खो चुके हैं!
 
प्रातःकाल जब मैं अपने चॉकलेट मिल्क का ग्लास हाथ में थामे छत पर जाता, चारों ओर हरे-हरे लहलहाते खेत और खेतों के किनारे खड़े कतारबद्ध वृक्ष, जैसे चौकी करते चौकीदार! इन खेतों में रंग-बिरंगी फरों से बनी लंबी पूँछ वाले ख़ूबसूरत मोर पक्षी आसानी से नज़र आते। खुले जंगल या खेतों में ही तो उनका बसेरा होता है। यहाँ उन्हें चारे के लिए अनाज तो मिल ही जाता, साथ ही साँप, चूहे एवं गिलहरी जैसे जीव भी शिकार के लिए मिल जाते। बारिश के मौसम में उन्हें अपने पंख फैलाकर नृत्य करते देखना एक आह्लादक अनुभव था! मोरनी अपने चूजों को जमीं से कीड़े ढूंढकर खाने का प्रशिक्षण देती दिखाई देती। 
 
हमारी कोठी के पिछवाड़े सोसाइटी का कॉमन प्लॉट है, जहाँ जंगली घास उगा करती थी। यह जगह साँप, बिच्छू, मोनीटर्स, मेंढक और बहुत सारे जीवों का ठिकाना थी। मेंढक तो हमारी कोठी के भीतर रहने लगे थे। कुछ एक ने तो रसोईघर और स्नानघर में अपना डेरा डाला था! मम्मी, पापा और हमारा पालतू श्वान “जेकी” भी उनके दोस्त बन गए थे! एक मेंढक तो जेकी के पानी पीने के बाउल में रात भर आराम फरमाता! स्कूल जाते समय जूते पहनने से पहले मुझे जाँच करनी पड़ती थी, कहीं जूते के भीतर मेंढक तो नहीं छुपा? 
सामने की ओर दो पीलू वृक्ष थे जो तरह-तरह के पक्षियों का आवास था। गोरैया, बुलबुल, बया, दर्जिन चिड़िया, मैना, कौआ, कोयल, चमगादड़, देवचिड़िया, फ़ाख्ता वगैरह। कभी-कभी शिकार की चाहत में शिकरा भी आ जाता। इधर उधर भागती गिलहरियाँ बड़ा शोर मचाती! केंचुआ, गिरगिट तो हमारे छोटे-से बगीचे में ही रहते थे।
 
सरीसृप विज्ञान में रुचि होने के कारण चेन्नई स्थित “मद्रास क्रोकोडाइल बैंक ट्रस्ट” से जुड़ा। तीन वर्ष कार्य किया। वहाँ बंदी अवस्था में रहनेवाले मगरमच्छों की सही देखरेख के बारे में अध्ययन करने का मौका मिला। बाद में “जेरी मार्टिन प्रोजेक्ट” से जुड़ा, बड़ा ही दिलचस्प अनुभव रहा। अब ‘ह्यूमेन सोसाइटी इंटरनेशनल’ से जुड़ा हूँ, जो पर्यावरण प्रबंधन और वन्य जीव संरक्षण के समर्थन में वैश्विक स्तर पर काम कर रहा एक प्रमुख गैर सरकारी संगठन है। करीब चार वर्ष के मैं अहमदाबाद लौटा हूँ। अपने शहर, अपने घर आकर बहुत अच्छा लग रहा है। फिलहाल मैं कोठी की पहली मंजिल की बाल्कनी में बंधे झूले में बैठकर थोड़ी ही दूरी पर खड़े गूलर के वृक्ष को देख रहा हूँ। चार वर्ष पहले मेरी जीवनसंगिनी आकांक्षा ने अहमदाबाद से चेन्नई जाने से पहले इसे रोपा था। वह छोटा सा पौधा अब तीस फीट ऊंचा वृक्ष बन गया है। इस में बहुत सारे फल लगते हैं जो अनेक पंछियों की खुराक है।
 
सामने की ओर नज़र गई और मन गहरी हताशा में डूब गया। चारों ओर ऊँचे-ऊँचे बिल्डिंग बन गए हैं, वो पगडंडियाँ गायब है। खेतों की जगह चौड़े रोड बन गए हैं। हमारी सोसाइटी के ठीक सामने एक तालाब था, जिस पर बहुत सारे वन्य जीव निर्भर रहते थे। आसपास थोड़ी झाड़ियाँ थी, जहाँ नेवले बड़ी संख्या  में रहते थे। अब वह तालाब मिट्टी से भर दिया गया है जहाँ नेवलों का परिवार उछलकूद करता दिखाई देता। बीस वर्षों में यहाँ के वन्यजीवन का विस्थापन हो चुका है। सोच रहा हूँ, इन सारे छोटे-बड़े वन्य जीवों को अपने कुदरती निवास स्थान से धकेल देने के लिए कौन जिम्मेदार है? किसे दोष दूँ? अप्रत्यक्ष रूप से मैं भी तो उन्हीं मे से हूँ!
 
दशकों पहले हमने सरल जीवन व्यतीत करना छोड़ दिया है। मानवजीवन का संघर्ष अब आधारभूत आवश्यकताओं से बढ़कर विलास-वस्तुएँ जुटाने की ओर अग्रेषित है। शहरों में हम देख सकते हैं की बिजली, सड़कें, यातायात के साधन, मोल्स, मल्टीप्लेक्सिस जैसी सुविधाओं के बिना हमारा गुजारा मुश्किल है। विकास के नाम पर शहर अपने राक्षसी पंजे फैलाते जा रहे हैं और कितने ही छोटे-बड़े वन्य जीवों के निवास स्थानों का अतिक्रमण होता जा रहा है। यह प्रक्रिया अनवरत चल रही है। 
मन में उथल-पुथल मची कि मैं क्या कर सकता हूँ। छत पर घूमते हुए मेरी नज़र सोसाइटी के कॉमन प्लॉट ओर गई। चार वर्ष पहले बगीचे में और घर के पिछले आँगन में जो पौधे थे वे अब बड़े हो गए थे। कनेर, चंपक, जुही, हरसिंगार, मूँगरा, रातरानी आदि। अशोकवृक्ष और गुलमोहर भी काफ़ी बड़े हो गए थे। एक ही आशा की किरण दिखाई दी। मैंने और आकांक्षा ने इन छोटे-बड़े प्यारे वन्य जीवों को फिर से बसाने का फैसला किया। खास कर गोरैया, दर्जिन चिड़िया, बुलबुल, मैना, देवचिड़िया जैसे छोटे पक्षी तथा गिलहरी, गिरगिट जैसे छोटे वन्य जीव। इस कार्य में माँ और पापा का भी बहुत सहयोग मिला। 
कोठी के बाहर जो भी जगह बची थी, हमने थोड़े और पौधे लगाए। काठ के छोटे-छोटे बक्से बनाकर बाहरी दीवारों पर लटकाए, ताकि वे अपने घोंसले बना पाए। छ्ज्जे की रेलिंग पर मिट्टी के गमलों में पानी भरा, साथ में एक और मिट्टी की थाली में विभिन्न अनाज, फल जैसी खाद्य सामग्री रखी। मुशलाधार बारिश में घोंसले से गिरे चूजों को हमने आश्रय देना शुरू किया। इस कार्य में आकांक्षा की बहुत सहायता मिली। हम सब से पहले गिलहरियों को वापस लाने में सफल हुए। 
 
आज छोटे पक्षियों की करीब पंद्रह प्रजातियाँ हमारे छोटे से बगीचे में वास करती हैं। मैं चाहता हूँ कि सोसाइटी के और लोग भी इस नेक काम में हमारा साथ दें। हम इसका प्रचार भी कर रहे हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पर्यावरण के जैविक घटकों में सूक्ष्म जीवाणु से लेकर कीड़े-मकोड़े, सभी जीव-जंतु और पेड़-पौधे आ जाते हैं, मनुष्य भी पर्यावरण का ही हिस्सा है। 
 
सच्चाई तो यह है कि महानगरीय जीवन में पर्यावरण के संरक्षण के प्रति घोर उदासीनता दिखाई देती है। लोगों में जब इसे लेकर कोई जागरूकता नहीं है, हमें परिवार से ही इस दिशा में कार्य शुरू करना चाहिए। अपने पर्यावरण को बेहतर बनाने की दिशा में हम यदि थोड़ा सा भी उचित प्रयास करें  तो धरती के समस्त प्राकृतिक परिवेश से हमारा भी घनिष्ठ नाता जुड़ जाएगा। सभी वाचकों से मेरा नम्र निवेदन है कि प्रकृति के सौंदर्य की रक्षा में अपना यथासंभव योगदान दें।
 
 
 
 
 

- सोहम मुखर्जी
 
रचनाकार परिचय
सोहम मुखर्जी

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