प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2019
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल पर बात

अपने समय की चिंताओं पर चिंतन करती एक ग़ज़ल
- के. पी. अनमोल


ग़ज़ल के रूमानी एहसासात दिल को अजीब-सा सुकून देते हैं, यह एक सर्वथा सच है लेकिन जो ग़ज़ल अपने समय को जी रही हो, वह एक विशेष सुख देती है। ऐसी ग़ज़ल जो नफ़ासत से भरपूर हो लेकिन धरातल से दूर, वह केवल थोड़े-से समय के लिए दिमाग़ पर नशे की तरह छा सकती है मगर नशा एक वक़्त बाद उतरना ही होता है। इसके उलट खुरदरी यथार्थवादी रचना, जो चाहे अपने समकाल को समेटे हो मगर अख़बारी कतरन की तरह-सी नारेबाज़ी लिए हो, वह भी कविताई का सुख नहीं दे सकती। आज के दौर की ग़ज़ल बहुत ही संजीदगी, शराफ़त से अपने समकाल को अभिव्यक्त करती है, जो ज़रूरत होने पर बहुत मुलायम भी हो जाती है और यथास्थिति आवेश भी समाहित किये रहती है अपने भीतर। यानी हम रोज़मर्रा में जिस स्वभाव के साथ अपने समय को जीते हैं, बिलकुल वैसे ही ग़ज़ल भी अपने समय को जीती है।

ऐसी ही एक ख़ूबसूरत और ज़रूरी ग़ज़ल सामने आयी। दीपक अवस्थी नाम के युवा शायर की इस ग़ज़ल ने एकाएक रोक लिया। दो-तीन बार पढ़ने के बाद रचनाकार को रचना के लिए व्यक्तिगत बधाई प्रेषित कर उनकी अनुमति के साथ इसे अपने साथ ले आया। दरअस्ल 'ग़ज़ल पर बात' के ज़रिये हम कुछ ज़रूरी ग़ज़लों पर उसके विभिन्न पहलुओं पर गौर करते हुए उसकी ख़ूबियों और कमियों पर चर्चा करते हैं। इस काम का एक मक़सद प्रस्तुत रचना के महत्व को रेखांकित करना है और साथ ही ग़ज़ल के पाठकों को उस रचना की अनदेखी तहों तक ले जाना भी है। खैर, ग़ज़ल के मत्ले पर आते हैं। पहले मत्ला पढ़िए, फिर मैं अपनी बात शुरू करता हूँ-


लाल, पीली और नीली मछलियाँ मर जाएँगी
यूँ समुन्दर की तो सारी खूबियाँ मर जाएँगी


मत्ले का भाव पढ़ते ही स्पष्ट होता है। पर्यावरण पर चिंतित सकल विश्व की एक चिंता है 'पानी का पानी मर जाना'। यानी पानी से पानी वाली ख़ूबियों का ख़त्म होना, भूमिगत जलस्तर का घटना, पर्यावरण का लगातार ख़राब होना।
दीपक यहाँ जलीय जीवन पर केन्द्रित होकर अपनी बात रखते हैं कि हमारी यानी मनुष्य की स्वार्थ लोलुपता के चलते ईश्वर के बनाये प्राकृतिक जलीय वातावरण के ख़राब होने से उसकी बनायी तमाम जलीय चीजें ख़त्म हो जाएँगी और जलीय वातावरण के ख़त्म होने से समस्त समुन्दर के ख़त्म हो जाने की स्थिति पैदा हो जायेगी। शेर में एक फ़िक्र है, एक डर है, एक चेतावनी है।


हम निकालेंगे शहद अपनी ज़रूरत के लिए
क्या हुआ जो आग से मधुमक्खियाँ मर जाएँगी


मनुष्य की स्वार्थपरता की हरकतों पर चिंतित होते हुए दीपक उसकी संवेदनहीनता पर तंज़ करते हैं और कहते हैं कि हम अपनी ज़रूरत के लिए कुछ भी करेंगे। उससे किसी दूसरे का कितना ही बड़ा नुक्सान हो, चाहे उसकी जान भी चली जाये लेकिन मनुष्य अपने मन की कर के ही मानेगा। शहद हासिल करने के लालच में आग से कितनी ही मधुमक्खियाँ मर जाती हैं, झुलस जाती हैं, बेघर हो जाती हैं लेकिन इससे संवेदनहीन मनुष्य को कोई फ़र्क नहीं पड़ता। यह शेर दंगे भड़काकर अपनी रोटियाँ सेंकने वाले स्वार्थी इंसानों तक भी जाता हूँ।

इस तरह से ज़ह्र में डूबे रहेंगे फूल तो
देख लेना एक दिन सब तितलियाँ मर जाएँगी


'फूलों का ज़ह्र में डूबे रहना', एक कटाक्ष है आज के नौजवानों पर। हालाँकि इसके कई और अर्थ भी लिए जा सकते हैं। अपनी उम्र से बहुत पहले समझदार हो चुकी नयी पीढ़ी में वह सब कर जाने की ज़िद है, जिसकी कोई हद न हो। ठीक बात है, हर चीज़ का अनुभव होना चाहिए लेकिन इस बेहद कर गुज़रने से लड़कों की तुलना में लड़कियों के जीवन पर बहुत विपरीत प्रभाव पड़ता है। वे अनजाने में बहुत कुछ गवाँ देती हैं। बहरहाल हवा के बहाव को तो रोक पाना आसान नहीं, लेकिन थोड़ी-सी सावधानी से बहुत सारे नुकसानों से बचाव सम्भव है। शेर समाज और नौजवानों को चेतावनी देता है।

कृष्ण मज़बूरी में वापस आ नहीं पाए अगर
प्रेम में डूबी हुई सब गोपियाँ मर जाएँगी


यह विषय शाश्वत है। ये प्रतीक, ये बिम्ब सब समय से परे हैं। हालात अब भी वही हैं बल्कि ख़राब हुए हैं। प्रेम में पड़कर 'कृष्ण' और 'गोपियाँ' आज भी उतना ही भुगतते हैं। अल्लाह मेहर।

जिस्म की चाहत लिए वहशी कहाँ जायेंगे, जब
बोटियों से घर चलाती लड़कियाँ मर जाएँगी


एक भयानक सच्चाई को उजागर करता है यह शेर। 'जिस्म की चाहत लिए वहशी' घर-बाहर हर जगह हैं। इन्हें अपनी ख़ब्त में न उम्र दिखती है, न रिश्ते। इनकी ख़राब मानसिकता का ख़ामियाजा मासूम औरत ज़ात को भुगतना होता है फिर चाहे वह किसी की माँ हो, बहन हो, बेटी हो या बीवी। शेर में रचनाकार ने इन वहशियों पर लानत भेजी है कि 'फिर कहाँ जायेंगे बदबख्त!'। बहुत विचारणीय विषय है यह।

पर्यावरण चेतना, मानव की संवेदनहीनता एवं स्वार्थ, लड़कपन के बहकावे की फ़िक्र, महिलाओं के प्रति घृणित सोच और प्रेम व ज़िम्मेदारियों के बीच पिसते युवाओं की चिन्ता जैसे मूल्यवान विषय अपने भीतर समेटे यह ग़ज़ल अपनी कहन से भी प्रभावित करती है। ग़ज़लकार मित्र दीपक अवस्थी को इस विचारशील रचना के लिए बधाई और भविष्य के लिए शुभकामनाएँ।


- के. पी. अनमोल
 
रचनाकार परिचय
के. पी. अनमोल

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