प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2019
अंक -50

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव

ग़ज़ल-

किसी की न्याय की उम्मीद फिर टूटी मिली है
मृतक की जेब में सल्फास की गोली मिली है

इसी से साफ़ ज़ाहिर है पढ़ाई मे हो माहिर
तुम्हारे बैग में जो सेक्स की सी डी मिली है

कहीं पर बालिका गृह तो कहीं बाबा का आश्रम
टंगी खूँटे पे हमको अस्मिता नंगी मिली है

करें वो कार्यवाही फिर भला कैसे बताओ
उन्हें ऊपर से शायद फिर कोई धमकी मिली है

ये उसका फ़र्ज़ है उसको बिगड़ने मत कभी दे
जिसे इस मुल्क़ की तक़दीर की चाबी मिली है

इसे ज़ाया नहीं करते कभी यूँ दावतों में
बड़ी मुश्किल से ये दो जून की रोटी मिली है

ग़ज़ल पढ़ ही नहीं सकते वहाँ अंकुर कभी हम
जहाँ भद्दे लतीफ़ों को बहुत ताली मिली है


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ग़ज़ल-

हमारी उम्र का जब भी सुनहरा फेज होता है
किसी के प्यार में ये दिल तभी इंगेज होता है

वही बस रेप करता है, वही है बेचता ख़ुद को
करेक्टर में मियाँ जिसके बहुत डैमेज होता है

हमारी माँ अगर तालीम की है विश्वविद्यालय
पिता तालीम का सबसे बड़ा कॉलेज होता है

लड़ाई और झगड़े से महज़ होती है कड़वाहट
मुहब्बत से ही हर रिश्ता यहाँ मैनेज होता है

सदा जीवन की पिच पर तुम बनाए हौंसला रखना
भले कितना बड़ा हो लक्ष्य इससे चेज होता है

कुएँ के मेढकों-सा वो उछलता ही नहीं अंकुर
विषय का ठीक से अपने जिसे नॉलेज होता है


- अंकुर शुक्ल अनन्त
 
रचनाकार परिचय
अंकुर शुक्ल अनन्त

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ग़ज़ल-गाँव (1)