मई 2019
अंक - 49 | कुल अंक - 55
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

फ़िल्म समीक्षा
1. आँखों में चुभती ‘स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर 2’
 
 
निर्देशक - पुनीत मल्होत्रा
निर्माता - करण जौहर
डायरेक्शन - पुनीत मल्होत्रा
लेखक - अरशद सईद
म्यूजिक - विशाल-शेखर
बैकग्राउंड स्कोर - सलीम-सुलेमान
सिनेमैटोग्राफी - रवि के. चंद्रन
एडिटिंग - रितेश सोनी
स्टार कास्ट - टाइगर श्रॉफ, अनन्या पांडे, तारा सुतारिया, आदित्य सील, समीर सोनी, नीलम कोठारी , गुल पनाग, आएशा रजा, मनोज पाहवा, अभिषेक बजाज, हर्ष बेनीवाल, मनजोत सिंह, राजेश कुमार, चेतन पंडित, मानसी जोशी रॉय
कैमियो - विल स्मिथ, आलिया भट्ट
 
करण जौहर ने एक तो हर फिल्म में आलिया भट्ट वरुण धवन को रखने की कसम खा रखी है। माँ कसम संजय लीला भंसाली की तरह वो भी शायद इन्हें हमेशा के लिए एक-दूसरे का बनाकर छोड़ेंगे। खैर 2012 के 7 साल बाद एक बार फिर से ‘सोटी’ यानी स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर का सिक्वल इस जुम्मे आ ही गया है। वैसे इस फिल्म को देखने के बाद इंसान निर्माता, निर्देशक को सोटी (देशी भाषा का शब्द) यानी लाठी मारे न मारे लेकिन अपने मेहनत और हक हलाल की कमाई को जरुर लाठी मारेगा।
 
करण जौहर की फिल्म स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर की सफलता के बाद इसके सिक्वल की जिस तरह से मार्केटिंग की गई थी, उससे आम दर्शक के बीच उत्सुकता तो बनी थी। किन्तु रिलीज के बाद उस पर पूरी तरह से पानी फिरता नजर आ रहा है। धर्मा प्रोड्क्शन की मार्केटिंग अच्छी होने के कारण फिल्म अपना बजट तो निकाल ही लेगी। फिल्म में सारे गैर जरूरी मसाले हैं मसलन- मसल्स वाले लड़के, शार्टस पहनी हुई सुंदर-सुंदर कन्याएं। फिर बीच बीच में रेस लगाना, कबड्डी खेलना तो कभी फाइट करना। लेकिन जो एक फिल्म में होना चाहिए वो नहीं है तो नहीं है। और वो चीज है एक्टिंग। एक पुरानी फिल्म ‘जो जीता वो सिकंदर’ को एक तरह से नए चॉकलेट के रैपर में डालकर यह फिल्म बनाई गई है।
 
एक गरीब लड़का रोहन (टाइगर श्रॉफ) जैसे तैसे कॉलेज में पढ़ने जाता है। इस लड़के की बचपन की एक महिला मित्र भी है, जिसके पीछे वह रईसों के टेरेसा कॉलेज में चला जाता है। यहाँ से उसे बेइज्जत करके निकाल दिया जाता है। फिर एक कॉलेज कॉम्पटिशन जीतकर वह अपनी बेइज़्ज़ती का बदला लेता है। रोहन के पिता के पास अरबों रुपये हैं, जबकि अभिमन्यु के माता-पिता अब दुनिया में नहीं रहे और भैया-भाभी के भरोसे वह पलता है। अब ये सवाल मत पूछना कि फाइव स्टार होटल जैसे नजर आने वाले स्कूल का खर्चा उसके भैया कैसे उठाते हैं। क्योंकि करण जौहर की फ़िल्में देखकर हम और आप इतना अंदाजा तो लगा ही सकते हैं कि उनके लिए गरीबी की परिभाषा थोड़ी अलग है। फिल्म की स्क्रिप्ट में कई खामियाँ भी हैं। जैसे स्कूल स्कूल नहीं बल्कि ताज होटल नजर आना, स्टुडेंट्स का इंटरनेशनल ब्रांड के कपड़े पहनना और ब्यूटी पार्लर से निकलती लड़कियाँ।इसके अलावा यहाँ के खेल जो हिन्दुस्तान के किसी भी स्कूल में इस तरह नहीं खेले जाते होंगे। विशाल-शेखर का संगीत इस फिल्म का
एकमात्र प्लस पाइंट है।
 
एक्टिंग के मामले में लगता है फिल्म निर्देशक ने पहले ही सबकी क्लास लेकर मानो कह दिया हो कि इस मसाले को भूलकर ही हमें फिल्म बनानी होगी। इस सबके बीच यूट्यूबर हर्ष बेनिवाल ने डेब्यू अच्छा किया है। अनन्या पांडेय से भविष्य में अच्छे अभिनय की उम्मीद लगाई जा सकती है। तारा सुतारिया ने सिर्फ खूबसूरत दिखने का काम किया है। वहीं टाइगर ने बंदरों की तरह उछल कूद करके एक बार फिर अपने लुक से प्रभाव छोड़ने का काम किया है। करण जौहर जैसा आत्ममुग्ध व्यक्ति पर्दे पर उछल कूद ही रचा करता है। फिल्म का मजबूत पक्ष है उसका डांस और एक्शन। एडिटिंग के मामले में कैंची थोड़ी और सफाई से चलाई जानी चाहिए थी।
 
अपनी रेटिंग - 2 स्टार
 
 
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2. 'कलंक': बाकी सब फर्स्ट क्लास है
 
 
निर्देशक – अभिषेक वर्मन
निर्माता – करण जौहर, साजिद नाडियाडवाला, अपूर्व मेहता
कलाकार – माधुरी दीक्षित, संजय दत्त, सोनाक्षी सिन्हा, वरुण धवन, आलिया भट्ट, आदित्य रॉय कपूर, कुनाल खेमू, कृति सेनन, कियारा आडवाणी 
 
फिल्म की कहानी से पर्दा तो लगभग इसकी रिलीज से उठ ही गया था। और आज फिल्म रिलीज भी हो गई। लंबे समय से दर्शक इस फिल्म के इन्तजार में थे उसका एक बड़ा कारण संजय दत्त और माधुर दीक्षित को करीबन 20 साल बाद एक साथ देखना भी था।
फिल्म की कहानी बंटवारे के कुछ अर्से पहले से शुरू होती है। 1946 से 1956 इन दस सालों के बीच का बंटवारा, प्रेम, इमोशन सब कुछ इस फिल्म में है। जफ़र बने वरुण धवन रूप का किरदार निभा रही आलिया भट्ट से इश्क में पड़ जाते हैं।  लेना तो वो संजय दत्त यानी बलराज चौधरी इंतकाम चाहते हैं किन्तु इस इंतकाम की आग में अब इश्क, मोहब्बत का बीज पड़ता है तो कहानी भावुक करती है। और आपको भी अपना इश्क, महबूब याद दिलाती है। माधुरी दीक्षित उर्फ़ बहार बेगम सत्रह साल की उम्र में शादी शुदा बलराज चौधरी से इश्क करती है और उसके नतीजे में जफ़र उनकी गोद में आ जा जाता है। अब क्या बहार बेगम का बेटा उसके मना करने के बाद भी इंतकाम लेगा या मोहब्बत करेगा यही फिल्म में देखने वाला मुख्य पहलू  है।  
 
यह फिल्म गाने और कहानी के मामले में अवार्ड भी एक दो चटका सकती है। अगर ऐसा हो तो हैरानी वाली बात नहीं होगी। अभिषेक वर्मन और शिबानी बठिजा की लिखी कहानी में ट्विस्ट और टर्न भी फर्स्ट क्लास है किन्तु भंसाली की तरह फिल्म को चमकाने के फेर में जो भी पड़ा है उसने इस इश्क को काजल का टीका ठीक से नहीं लगाया है।
मोहब्बत और नफरत दोनों का रंग लाल है। बावजूद इसके लोग मोहब्बत को कलंक मानते हैं। फिल्म के गाने में इसका टाईटल सॉंग ‘कलंक नहीं इश्क है काजल पिया’ पहले से लोगों की जुबान पर चढ़ चुका है। लिहाजा इसका फायदा भी फिल्म को मिल सकता है। इसके अलावा ‘ओढ़नी’ पर किया गया राजस्थानी स्टाइल गाना भी आँख को सुहाता है। माधुरी दीक्षित को एक बार फिर से पर्दे पर देखना और मुजरा करते देखना उनके फैंस की आँखों को सुकून देगा। कुनाल खेमू ने सपोर्टिंग एक्टर की भूमिका के साथ जबरदस्त न्याय किया है। वहीं कियारा आडवाणी के पास ज्यादा करने को कुछ था नहीं। आलिया भट्ट राजी जैसी फिल्मों से अपनी अदायगी का लोहा मनवा चुकी हैं। और उनकी एक्टिंग भी दिनों-दिन निखर रही है। जहाँ प्रीतम के गाने बेहतर हैं वहीं संचित बलहारा, अंकित बलहारा का स्कोर किश्तों में ही अच्छा लगता है। 80 करोड़ के बजट में बनी इस इश्क, मोहब्बत, इमोशन वाली फिल्म को अपनी महबूबा के साथ देख पाएं तो सोने पर सुहागा होगा। इस फिल्म से भंसाली की फिल्मों की रिचनेस जैसी खुशबु महकती है तो वहीं डी० डी० एल० जे की ट्रेन की पटरियों की खड़खड़ा हट आती है।
 
फिल्म की स्टारकास्ट फर्स्ट क्लास है। फिल्म के अधिकतर गाने भी फर्स्ट क्लास है, फिल्म में एक्टिंग भी फर्स्ट क्लास है। और तो और जरूरी मसाले भी फर्स्ट क्लास हैं। बावजूद इसके ऐसा क्या है जो इस फर्स्ट क्लास की चमक को कम करता है। फिल्म को नमकीन बनाने के चक्कर में करण जौहर, अभिषेक वर्मन उसके जरूरी मुद्दे भूल जाते हैं।
 
अपनी रेटिंग - 3 स्टार 
एक अतिरिक्त स्टार माधुरी दीक्षित के फ़ैन होने के नाते

- तेजस पूनिया