प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2019
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम
दुर्लभ पति                
 
रेल यात्रा मुझे बचपन से ही सुहानी लगती है. बिजली के तारों का संग-संग चलना, हर स्टेशन पर नए-नए चेहरे, नई कहानी का शुरू होना, यात्रा में गहन मित्रों का बन जाना और फिर कभी ना मिलने के लिए बिछड़ जाना. अपना सामान जमा कर मैं सुखद यात्रा के प्रारम्भ होने की प्रतीक्षा करने लगी .इंजन की सीटी और गार्ड की हरी झंडी होते ही ट्रेन छुकछुकाती चल पड़ी  और तभी अपना पर्स और चेहरा संभालती ,एक अति आधुनिक महिला मेरी बगल वाली सीट पर गिरती पड़ती सी लपकी . मेरी ओर मित्रता भरी मुस्कान फेंकते हुए बोली ,” आप कहाँ जा रही है?’, अपना गंतव्य लापरवाही से उनकी ओर फेंक कर मैंने अपना मुहँ खिड़की की ओर घुमा लिया . शहर की रेल- पेल फीकी पड़ती जा रही थी ठीक उसी तरह जैसे कोई रंग भरे ब्रश का रंग ख़त्म हो जाने पर रंग फीके पड़ जाते है.
 
“आपके पति किस महकमे में है ?" वो चुलबुलाई.
“जी फ़ौज में कर्नल है .” सूक्ष्म सा उत्तर था मेरा.
फड़क कर मेरे दोनों हाथ पकड़ लिए और गुदगुदाई,”हाऊ लवली , मुझे फौजी यूनिफार्म, पार्टी हंगामा बहुत अच्छा लगता है! अहा क्या मस्त जीवन है! मैं तो अपनी शादी फौजी से करवाना चाहती थी, परन्तु मम्मी डैडी नहीं माने.” रुआंसी हो कर बोलीं.
मैंने मौन सहानुभूति में सिर हिला दिया . फ़ौज के बाहरवालों को फ़ौज की ये ही एकतरफा रुख ज्ञात है तस्वीर का दूसरा रुख वो ही जानता है ,जो, फ़ौज में जीता है.
 
“मेरे पति इलैक्ट्रोनिक इन्जीनियर हैं, बड़ी मल्टीनेशनल कम्पनी में काम करते है. हमारा  रेलभाड़ा, फ़्लैट, कार,  फाइव- स्टार  होटल का खर्च कम्पनी देती है.” वह कुछ गर्व से इतराई.
सिर से पैर तक कीमती वस्त्र , आधूनिक डिजाइन की सुडौल सैंडल, इत्र और साजो सामान दर्शा रहा था  कि अच्छा- खासा कमाऊ  पति हैं.  
मेरे सादेपन पर कसमसाकर वह कुछ और बताने की जल्दी में बोली, “हम भी खूब क्लब जाते हैं, मेरे पति केवल स्कॉच ही पीते हैं. वैसे मुझे भी बियर, शैम्पेन पीने की आदत पड़ गई है. क्या करें, यों तो सोसाइटी में सब कुछ करना पड़ता है.” विवशता और गर्व का मिला जुला अहसास!
 
मैंने भी हाँ में हाँ मिलाई और साथ ही मुझे अपनी आया ऐलिस और उसके पति थॉमस का “रम” मांगने का दृश्य याद हो आया. थॉमस कह रहा था, “साहब, बेटे का जन्मदिन है, बिरादरी वाले और दोस्तों को न पिलाई तो नाक कट जायेगी. हमारी बिरादरी में शराब न पिलाने से बड़ी बदनामी होती है ...” उसकी मजबूरी और इनकी भी विवशता, सोचती हूँ जब पढ़े लिखे समाज का दायरा इतना संकुचित है तो बेचारे अशिक्षित वर्ग का क्या कसूर जिनके बड़प्पन का मापदंड ही सीमित है. वास्तव में क्या समाज का भय है या अपने भीतर का छोटापन.
 
“शौक फरमाइए ...” उनकी आवाज़ सुनकर मैं कल्पना लोक के बाहर आई, देखा, ‘पान पराग’ मेरी ओर बढा रही थी.
“नहीं, धन्यवाद, मैं नहीं लेती.”
“हाय! आप यह भी नहीं खाती.”
और वह हंस -हंस कर लोटपोट हो गई (वैसे मुझे यह कुछ हास्यास्पद नहीं लगा). “हमारे यहाँ तो एक दूसरे के पर्स से चुरा- चुरा कर खाते हैं ...” और वह  खों- खों हंस रही थी.
 
‘चुराना क्या अच्छी  बात है...?’ गले तक झिडकी आ कर ठिठक गई.
“अरे, आप तो कुछ बोलती ही नहीं , क्या नाम है आपका?” उनके प्रश्नों का उत्तर देने के लिए मैंने आखिर अपना मुहँ खिड़की से घुमा कर उनकी ओर किया और इत्मीनान से पूछा, “ कौनसा बताऊँ? अपना या कि पति से जुड़ा वाला?”
“दोनों ही बताइए.” इस बार सूक्षम सा वाक्य उसका था. “मुझे सरला कहते हैं, वैसे मैं श्रीमती गुप्ता हूँ...” 
“मेरा नाम इला है, श्रीमती महंती.”
“हेलो.” हम दोनों इकट्ठे ही मुस्कुराए .“ताश खेलेंगी?” 
उत्तर पाने से पहले ही पर्स खोल कर ताश की गड्डी निकाल ली. दोनों के बीच की दूरी कम करने के लिए एक छोटा तौलिया बिछा लिया, इला पत्ते मिलाते हुए बोली,
“दीपक को मेरा ताश खेलना बिलकुल पसंद नहीं.”
 
“तो तुम मत खेला करो?” उम्र और अनुभव में मुझ से छोटी थी. अतः तुम कहने और सलाह देने का अधिकार स्वतः ही ले लिया.
“वाह! क्यों न खेलूँ!” घायल सिंहनी सी गरजी. “क्या दीपक वह सब करते हैं जो मुझे पसंद है, उन का शराब पीना और श्रीमती कामथ के साथ चिपक कर डांस करना क्या मुझे पसंद है?” और उसने बंटे बटाए पत्ते फेंक दिए.
“ क्या हुआ?” मैंने भोलेपन से पूछा.
“गलत बंट गए, री -डील होगी?”
और उसके कुशल हाथ, ताश की गड्डी फेंटने लगे. गोरे- गोरे हाथों पर सजती नेलपोलिश, हाथों की तीन- तीन उँगलियों पर हीरे और पत्थरों की तराशी अंगूठियाँ, बड़ा ही संपन्न हाथ था. ताश के पत्ते उठाने को बढाया अपना काला हाथ, कटे हुए नाखून और मात्र एक घिसा हुआ सा सोने के छल्ले वाला हाथ हम दोनों के अंतर का प्रतिनिधित्व सा करता हुआ.
 
“आप को पता है श्रीमती कामथ बड़े खराब चरित्र की महिला है, इतना  लो कट ब्लाउज पहनती है, जब देखो तब पुरुषों से घिरी रहती है. हर हफ्ते नया केश विन्यास, नयी डिजाईन की ड्रेस, मुझे तो जरा भी नहीं भाती.” मुंह पिचका कर इला ने पत्ते फिर बांट दिए., पत्ते बटोर कर पंखे से फहरा दिए, इस बार उस का चेहरा फूल सा खिल उठा,
 “अहा! पपलू आ गया.”
खेल के साथ-साथ इला के सवाल और जवाबों का सिलसिला इसी तरह चल रहा था, जैसे रेल की रफ़्तार कभी कम ,तो कभी तेज.
“क्या आप के पति वो  सब करते हैं जो आप को पसंद है?”
 
इला का पूछना कुछ इस प्रकार का था मानो मुझे ललकार रही हो, उस का इतना आक्रोश पति की तरफ देख कर सोचा कुछ उलाहना तो मुझे भी करना चाहिए. अतः मैंने उनकी बुराईयां  ढूँढी और कहा,
“अजी कहाँ. अब देखो न, मुझे सिनेमा देखने का इतना शौक है, वह भी नहीं दिखाते कभी.”
“तो क्या. आप अपनी पसंद का कैसेट ला कर देख लिया करिए...”
“हमारे पास वी.सी.आर. नहीं है.” मैं  झिझकते हुए बोली, “मेरे पति कहते हैं कि बच्चों की पढाई में हर्जा होता है. इसी लिए नहीं खरीदा..” ट्रेन की सहयात्री को अपनी आर्थिक स्थिति क्यों बताऊँ?
“पर बच्चों के लिए हम अपना मनोरंजन भी न करें. इट इज टू मच.” कुछ बंधन सा महसूस करती हुई इला बोली.
“अपना- अपना विचार है, अप टू यू.” मैंने भी उसे समझाने की चेष्ठा नहीं की.
 
उसे क्या बताती कि घर, पति व बच्चों का सुख ही मेरा वांछित स्वप्न है, किस मुँह से कहूँ कि इन तीनो को मैं अपने से पहले रखती हूँ और मुग़ल सम्राट बाबर की तरह जब पति व बच्चे अस्वस्थ हो जाते हैं तो घबरा जाती हूँ. नहीं- नहीं यह सब बता कर मुझे बम्बईया हीरोइन की भावुक भूमिका नहीं करनी है. अपने आप को स्वतन्त्र स्त्री के समक्ष, एकदम फूहड़, रूढ़ीवादी थोड़े ही दर्शाना है. अतः सुर में सुर मिलाकर कहा,
“अब देखो न, मेरे पति न शराब पीते हैं, न पार्टी में जाना पसंद करते हैं और ना ही क्लब और डांस का शौक़...”
इला की अविश्वास भरी आँखें विस्फारित हो उठीं., “क्या कह रही हैं आप, फौज़ी अफसर और ... औ...र...”
‘... इतनी दुर्गति.” हँसकर मैंने उस का वाक्य पूरा किया.” इन्हें तो लोग सूफी कहते हैं. रही सही कसर पूरी हो जाती है हमारे शाकाहारी होने पर.”
“ओह नो, फिर तो वास्तव में आप सभी सुखों से वंचित हैं.” बड़ी सहानुभूतिपूर्वक इला ने पत्ता फेंका, पर वह मेरी सीक्वेंस में फिट नहीं पड़ रहा था, गड्डी से दूसरा पत्ता चुनते हुए मैंने धीरे से कहा,“ ‘पर एक बात बताऊँ मैं अपने जीवन से बहुत खुश व संतुष्ट हूँ.”
 
“बोर नहीं होती तुम?”
 “हाँ होती हूँ, कभी- कभी लड़ती भी हूँ, पर यह इतने भले हैं कि मेरा क्रोध भी सह लेते हैं.”
“क्या कर लेते हैं? ‘सह’ लेते हैं.” ताश खेलना भूल गयी थीं, इला. मुझे लगा जैसे ‘सहना’ शब्द उसने पहली बार सुना है.
“हाँ, और तो और यदि मैं क्रोध में सुबह ना उठूँ , तो भी प्रतिकार नहीं करेंगे. बल्कि मेरी चाय और अपने बीमार पिता की चाय दवा भी स्वयं दे देंगें. यदि मैं क्रोध में कलह करूँ, इन्हें भला बुरा कहूँ, तो कहेंगे, “मैं अपने लिए तो कुछ करता नहीं, यदि तुम्हें खुश न रख पाऊं तो दुःख होता है...”
 
इला के सिर पर तो जैसे गाज गिरी. “तुम्हारे पति बूढ़े माँ बाप के सेवा भी करते हैं...?”
“ हाँ, वे  रोज उनके अपाहिज पैर की एक घंटा मालिश करते हैं, उनका मलमूत्र साफ़ करते हैं, मुझे कभी नहीं कहते करने को और जरुरत पड़े तो पिताजी के कपडे भी धो डालते हैं.”
अब तक इला पस्त हो चुकी थी. बोली, “माफ़ करना, सरला तुम कुछ बढ़ा-चढ़ा कर कह रही हो, अरे मेरे घर में तो सास- ससुर चार दिन  को भी आ जाएँ ,तो हमारी दीपक की लड़ाई हो जाती है, ‘तुमने डैडी की पसंद का चिकन क्यों नहीं बनाया’, ‘तुम ने मम्मी के बिस्तर की चादर ठीक नहीं लगवाई’, ‘तुमने कहीं उन्हें घुमा लाने का प्रोग्राम क्यों नहीं बनाया’ और उनके जाने के बाद ही चैन की साँस लेती हूँ. ससुर को मधुमेह है और सासू को ह्रदय रोग. इतने बजे दवा तो उतने बजे खाना, बेचारे नौकर- चाकर भी तंग आ जाते हैं.”
 
“मेरे ससुर तो बिस्तर से उठ भी नहीं सकते हैं, परन्तु नौकर -चाकर भी उन्हें बोझ नहीं मानते.”
इला का चेहरा बता रहा था कि उसे मेरी बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था. अतः उसे सहज और आश्वस्त करते हुए मैंने दुलार में कहा, “देखो इला, घर-गृहस्थी का सुख कमल, त्याग, प्यार, आपसी आदर, ममता व बलिदान रुपी जलवायु में ही खिलता है किन्तु आज वातावरण में इतनी अशुद्धि आ गयी है कि ‘मैं ही क्यों करूँ,’ प्रतिशोध, प्रतिरोध, हठ अधिकार की तेज आंधी में यह कमल फूल खिल ही नहीं पाता है और रहे मेरे पति, अरे भाई, ये तो अग्निपारवी की तरह दुर्लभ प्राणी हैं. कितने ही खूबसूरत पशु -पक्षी आज धरा से लुप्त हो रहे हैं तो इनके जैसे पति भी अब धीरे- धीरे समाप्त हो जायेंगे. तुम अपना मन भारी मत करो...”
इला बोली, “अरे, लो महिलाओं की मुक्ति के लिए सारा जमाना रो रहा है. हर रोज धरने और जलूस निकले जा रहे हैं और तुम परिवार की सेवा में लगी हो. भाई, मैंने तो दीपक से कह दिया कि अब नया जमाना आ गया. बच्चे अपने रास्ते चलें, तुम अपने. मैं तो स्वतन्त्र हूँ.” उन्हें मेरी बेचारगी पर दुःख भी हो रहा था, शर्म भी आ रही थी.
 
* ये उस समय की कहानी है जब हवाई यात्रा इतनी प्रचलित नही थी.

- मधु
 
रचनाकार परिचय
मधु

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