अप्रैल 2019
अंक - 48 | कुल अंक - 54
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

उभरते-स्वर

पिता

उठाये थे
दो कमरों की
आठ दीवारों का भार
अकेले
सबकी ग़मी में
बरस जाता था उनका प्यार
मजदूरी मेहनत करके
हमारे नन्हें मुख को
भरपेट खिलाये जाते थे
अपनी रूग्णावस्था में
हमारे दर्द का भार
ख़ुशी से उठाये जाते थे

बालों का खिंचना,
तोतला बोलना,
मंद हँसी उनका हँसना,
हमारा उनके कंधों पर डो़लना,
डगमगाते क़दम और
लड़खड़ाकर चलना
दंतुरित मुस्कान
नन्ही जान का पलना,
गिरे न हम कहीं
वह दौड़े-दौड़े आते थे

अब मुझे डर लगता है
खो गया क्या वह अस्तित्व
हमारा अतीत-सा कहीं?
भूल चुकी है
यादें हमारी उस अपनेपन को
वीणा के मंगल शांत संगीत-सा कहीं!

ख़ूब ज़ोर था कंधों में
जोतते थे जब खेत,
बीजते थे जब गेहूँ
गोड़ते थे जब धान
आधी धोती पानी में होती गड़ाक
वह धान- धोती जैसे सांध्य-भक्ति में अंतर्ध्यान
पर
खिली रही सदा धूप की तरह
मुख में शांत सदैव उनके मुस्कान
खुला आँगन
वह टेढ़े मुँह वाला चूल्हा
जो रोटियाँ सेंकते-सेंकते बदसूरत हो गया है
माँ,
लेटा हुआ सामने कुत्ता,
उठता हुआ धुँआ
कोहरे को छानकर
पूरे करते थे जो हमारे अरमान
वह आँगन से उठता धुँआ कहीं खो गया है?
चूल्हे की वह जलती रोटियाँ
क्रूर इतिहास की काली घटनाओं को जैसे ताज़ा करती
उसकी भयावह शक्ल
एक ही के बदले दो साँसें ज़िन्दा रहने के लिए भरती
ठीक वैसे ही हो गयी हैं
जब देर रात पहुँचते
घर की ओर एक जोड़ी पाँव
जिस पर आश्रित हैं हम
पर अब वह आहटें
कहीं मजदूरी में तो
कहीं मजबूरी में खो गयी हैं
ढलते दिन तक
चढ़ते सूरज से
पेट पालने की तकलीफ़ में
खाँसते जब लोटते हैं
तब लगता उनकी उम्र हो गयी है

हो गया है बहू-बेटों का अधिकार
भूल रहे हैं पिता के भी संस्कार
रिश्तों की बुनियादी सुविधाओं में
ख़त्म हो रहा संबंधों का व्यवहार
घर भी तंग होने लगा है
जिसमें समा नहीं सकती
दो विचारों की गहन-उथली संवेदनाएँ
उठा नहीं सकती सभी का बोझ
न पूरी करते अब बूढ़ी माँ की जिज्ञासाएं
लाठी के सहारे अब टहलता है
थककर आते वापस जब
खाँस-खाँस कर कलेजा जलता है
लेकिन
खाँसता हुआ नहीं सुहाता है
अब मेरी नयी भावनाओं को
कुछ धीरे-धीरे
उनका चढ़ा सूरज जैसे ढलता है

अब सारा परिवार
मेरे पिता के बनाये घर में पलता हैं


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ख़ुद के प्रति

साड़ी के झीने रंग में
वह चढ़ती लू में खेल रहीं है माँ
व्यथा की नीरवता
चुपचाप ख़ामोश झेल रही है माँ

ख़ूब बोया है मैंने
अपनी भावनाओं से बंजर खेत
ख़ूब सुने है लहरों के गान
ख़ूब देखी है उड़ती हुई रेत

जो मृदु भाव से
बंद करतीं लोचनों के कपाट
संवारता रहा ख़ूब जीवन
पर फीका ही रहा जीवन का ठाट

आ रहा इस धरा को फोड़कर
सुस्मित नीरव अंकुरण एक
अश्रुओं की मेघमाला से बचने
शाश्वत तलहटी रहा मैं देख

है अप्रस्तुत आरोप
और प्रत्यक्ष रूपों की छवि
अभी खोले शिशु-से दोनों अधर
जिसमें झाँक रहा ज्योतिर्मय रवि

मेरे हृदय की कोमल झंकार
बज रही है अति
निज को छोड़ अपना
आसक्त हो रहा ख़ुद के प्रति

चुन-चुन कर बीन रही है
अपने उखड़े भावों को
छोड़ वह पुरातन जीवन
छोड़ मौन खिंचाव को


- मुकेश कुमार

रचनाकार परिचय
मुकेश कुमार

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