प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अप्रैल 2019
अंक -49

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

बाल पहेलियाँ: अनवरत

हरा था मन भरा था, हजार मोती जड़ा था
राजाजी के बाग़ में, दुशाला ओडे खड़ा था
(भुट्टा)

- अमीर ख़ुसरो

पहेलियाँ अन्यान्य विधाओं की तरह ही अत्यंत प्राचीन विधा है, जो रोचकता, ज्ञान, जिज्ञासा और स्वस्थ मनोरंजन से भरपूर होने के कारण आदिकाल से लोक जीवन का अभिन्न अंग रही हैं और लोकप्रिय भी। वस्तुत: पहेलियाँ लोक व्यवहार में मनोरंजन के संदर्भ में अहम् भूमिका निभाती हैं। चाहे शादी–ब्याह हो, तीज–त्यौहार हो या इसी प्रकार का अन्य समारोह। बिटिया को जंवाई राजा और ससुराल वाले लिवाने आते हैं तो रात को महिलाएँ पहले उन में मीठी–मीठी गालियाँ गाती हैं तत्पश्चात उनसे पहेलियाँ पूछती हैं और सही उत्तर नहीं देने पर मीठी-सी धमकी भी दी जाती है। यह दौर आधी–आधी रात तक चलता रहता है। यह हमारी परम्परा रही है। इसी बहाने जंवाई सा की बुद्धि का परिक्षण भी हो जाया करता है। विदेशों में भी यह कला पाई गई है। डॉ. देवसरे ने लिखा है– "पहेली बूझने की कला को यदि ज्ञानवृद्धि का एक माध्यम या सामान्य ज्ञान को बालोपयोगी परीक्षा कहा जाये तो अत्युक्ति न होगी। वास्तव में यह ऐसा खेल कि इसमें बच्चों को आनंद भी आता है और ज्ञान वर्द्धन भी होता है।"- 1

पहेली साहित्य की ऐसी विधा है, जो बालकों को चीजों की विशेषताओं के संदर्भ में जानकारी देती है एवं  खेल–खेल में  आनंद और ज्ञान भी प्रदान करती हैंपहेलियाँ जीवन में रस ही नहीं घोलती हैं अपितु चिंतन–मनन के अनंत द्वार भी खोलती हैं ये हास्य-विनोद और जिज्ञासा से भरपूर होती हैं, इसीलिए बालकों की सब से प्रिय विधा है पहेलियाँ जहाँ जिज्ञासा जाग्रत करती हैं, वहीं बुझा देने पर परम संतुष्टि की अनुभूति भी करवाती हैं एक बार ये सिलसिला प्रारम्भ होने के बाद निरंतर चलता रहता है क्योंकि पहेलियों का अपना अलग ही महत्त्व है पहेलियाँ बच्चों और बड़ों दोनों को ही परम आनंद प्रदान करती हैं,  लेकिन बालकों को तो उल्लास से भर देती हैंबालकों की दुनिया कल्पना लोक में विचरती है, जहाँ रोमांच, रहस्य, रोचकता, मनोरंजन नृत्य करते हैं शायद इसीलिए उन्हें सबसे अधिक आनंद पहेलियाँ बुझाने में आता है
पहेली होती ही ऐसी है, जब तक न बुझे; बालक उसे नहीं छोड़ पातेचाहे जितनी भी माथापच्ची करनी पड़े और उत्तर मिलते ही, ख़ुशी से नाच उठते हैं किलकारियाँ भरने लगते हैं

कहानी और कविता के बाद पहेलियाँ बच्चों की प्रिय विधा है। कुछ पहेलियाँ तो जैसे जीवन का हिस्सा ही बन गई हैं। जैसे– 'उल्टा सीधा एक समान तीन अक्षर का मेरा नाम ' इस पहेली  के कई–कई  उत्तर हैं। इसी प्रकार एक पहेली पर आधारित एक प्रचलित फ़िल्मी गीत– 'तीतर के दो आगे तीतर, तीतर के दो पीछे तीतर,  आगे तीतर, पीछे तीतर, बोलो कितने तीतर'। (तीन) इसीलिए पं. रामनरेश त्रिपाठी ने पहेलियों को ‘बुद्धि का खेल’ बताते हुए कहा है, ‘न जाने किस युग से चली आ रही ज्ञान की घुमावदार नदी को अभी तक लोग आगे ही बहाए लिए जा रहे हैं, उसे उन्होंने सूखने नहीं दिया है।'

'पहेली' शब्द का 'शिक्षार्थी हिंदी शब्दकोश' सम्मत अर्थ है–
1– प्रश्नात्मक उक्ति, जिसमें बात का लक्षण बतलाते हुए यह कहा जाता है कि बताओ वह कौनसी बात है।
2– कोई गूढ़ बात, जिसका निराकरण सहजपूर्ण हो।


अत: उपर्युक्त संदर्भ के अनुसार पहेली एक ऐसी उक्ति है, जिसमें प्रश्नात्मक भाव निहित होता है एवं बात के लक्षण बताते हुए इस प्रकार  घुमा–फिरा कर प्रस्तुत किया जाता है कि लोग आसानी से उत्तर नहीं दे सकें। इस के लिए उन्हें मानसिक श्रम करना पड़ता है और कई बार तो बात को इतनी गूढ़ता के रखा जाता है कि सामने वाला निरुत्तर हो जाता है और वह प्रश्नकर्ता से उत्तर बताने के लिए खुशामद करता है क्योंकि उत्तर जानने की उसकी जिज्ञासा बहुत बलवती हो उठती है। जिज्ञासा उत्पन्न करना पहेली की अति विशिष्टता मानी गई है। पहेलियों को लेकर कई मुहावरे भी लोक जीवन में प्रचलित हैं – 'पहेलियाँ मत बुझाओ', 'जीवन एक पहेली है' आदि। पहेलियाँ गद्यात्मक और पद्यात्मक दोनों प्रकार की होती हैं और यह लक्षणा शब्द शक्ति से ओतप्रोत होती है। पहेलियाँ आकार–प्रकार, रंग–रूप, स्वभाव, गुण-धर्म, गणित, समान धर्म वाले शब्दों के आधार पर कई प्रकार की हो सकती हैं। पहेली का विषय कुछ भी हो सकता है। यथा– प्रकृति, घरेलू चीजें, खाने–पीने की चीजें, शिक्षा–ज्ञान, शरीर के अंग आदि आदि। पहेली गढ़ना बच्चों का खेल नहीं है। इसके लिए बहुत श्रम करना होता है क्योंकि इसे गढ़ने में उचित भाषा और सशक्त प्रस्तुतीकरण ज़रूरी है। हाँ, इनका उत्तर निश्चित होता है।
 

सुनिश्चित है कि पहेलियों का जन्म भी मानव सभ्यता के प्रादुर्भाव के साथ-साथ ही हुआ होगा। खेल ही खेल में इनका सृजन हुआ होगा। किसी एक ने दूसरे व्यक्ति के ज्ञान का परिक्षण करने के भाव से बात को घुमा–फिरा कर या गूढ़ बनाकर पूछा  होगा, उत्तर मिलने पर भी और नहीं  मिलने पर भी, दोनों व्यक्ति अन्य लोगों से आनंद लेने के लिए पूछते गए होंगे और यह क्रम बनता गया होगा, जिसका आधुनिक स्वरूप आज हमारे समक्ष है। डॉ. हरिकृष्ण देवसरे के अनुसार– "वर्तमान में विभिन्न  पत्र–पत्रिकाओं में बाल पहेलियाँ प्राय: देखने को मिल जाती हैं। कहना अनुचित न होगा कि पहेलियाँ किसी सफल बाल पत्रिका का महत्वपूर्ण घटक हैं। कहानी और कविता के बाद बच्चों का रूझान पहेलियों की ओर ही अग्रसर होता होता है। यह भी संभव है कि वे सबकुछ छोड़कर सर्वप्रथम पहेलियों पर ही अपना ध्यान केंद्रित करें और अपनी ध्यान स्थिति का परिक्षण करके आल्हादित हों।"– 2
 

वर्गीकरण की दृष्टि से राधेश्याम प्रगल्भ ने पहेलियों को पाँच प्रकार से विभक्त किया है–
1- जिनका उत्तर पहेलियों में ही छिपा हो।
2- जिनका उत्तर सरलता से पकड में आ जाये।
3- गणितीय शिक्षा में सहायक।
4- शब्द के आदि, मध्य और अंत के लोप पर आधारित पहेलियाँ।
5- दो प्रश्नों के एक उत्तर वाली पहेलियाँ।– 3

 

अन्य विधाओं की भांति पहेलियों का जन्म भी संस्कृत भाषा से ही हुआ है। संस्कृत में इन्हें प्रहेलिका कहा जाता है। आदि ग्रन्थ ऋग्वेद, ब्राह्मण  ग्रन्थ, उपनिषदों तथा अन्य ग्रंथों में भी इनका उल्लेख मिलता है। विदेशों में भी यह कला पाई गई है। देवसरे जी ने इस संदर्भ में लिखा है– "मिश्र में इसका बहुत प्रचलन था। अरब और फारस में भी काफी पुरानी पहेलियाँ मिलती हैं। फ्रांस में अठारहवीं शताब्दी में एक ऐसा संग्रह मिला है, जिसमें डेढ़ हजार पहेलियाँ संग्रहित हैं।"- 4
पहेलियों की परम्परा के विषय में पद्मश्री लक्ष्मीकुमारी चूंडावत ने दीनदयाल शर्मा की कृति 'इक्कावन बाल पहेलियाँ' की भूमिका में लिखा है-
"भारतीय संस्कृति में पहेलियाँ बूझने की परम्परा बहुत प्राचीन हैं। विवाह–शादी, तीज-त्यौहार एवं जंवाई राजा के प्रथम बार ससुराल आगमन पर स्त्रियाँ पहेलियाँ बुझती हैं। राजस्थान में तो यह परम्परा और भी सुदृढ़ है। जंवाई राजा के ससुराल में प्रवेश करते समय द्वार छुड़वाने, भोजन करते समय, थाल छुड़वाने, सोते समय ख़त छुड़वाने के लिए सालियाँ ‘आडियां’ पहेलियाँ बुझती हैं और सही उत्तर मिलने पर ही द्वार लांघने, भोजन करने व सोने अनुमति देती हैं।- 5


जहाँ तक हिन्दी भाषा का प्रश्न है, लगभग सभी विद्वानों और विचारकों ने अमीर खुसरो को हिन्दी में पहेलियों का जन्मदाता माना है। बाल साहित्य के आदि समीक्षक निरंकार देव सेवक ने तो अमीर खुसरो को हिन्दी में बच्चों का पहला कवि माना है। आज भी अमीर खुसरों की पहेलियाँ समाज में सर्वाधिक प्रचलित और  लोकप्रिय हैं। सामान्यतया किसी भी व्यक्ति से खुसरो की पहेलियों को सुनी और पूछी जा सकती हैं। अमीर खुसरो की पहेलियों का महत्व  साहित्यिक दृष्टि से भी है। भाव, भाषा और प्रस्तुतिकरण उत्तम है।  इनकी सबसे अधिक प्रचलित पहेलियों में से कुछ दृष्टव्य हैं--
'एक थाल मोती से भरा / सब के सर पर औंधा धरा/
चारों ओर वह थाली फिरे / मोती उससे एक न गिरे
(आकाश)

 

एक अत्यंत लोकप्रिय ‘कह मुकरनी’ जो पहेली का ही रूप है--
वो आये तो शादी होय, उन बिन दूजा और न कोय
मीठे लागें उनके बोल, क्यों सखि सजन, ना सखि ढ़ोल


डॉ. भोलानाथ तिवारी ने अमीर खुसरो के पहेलियों के निम्न रूप निर्धारित किये हैं–
1--  इनका उत्तर पहेली में हो।
2– जिनका उत्तर पहेली में न हो।
रोचकता, मनोरंजन, जिज्ञासा और आनंद से भरपूर ये पहेलियाँ बाल साहित्य की अनमोल थाती  हैं। बाल पहेलियों की उपयोगिता के संदर्भ मे पद्मश्री लक्ष्मीकुमारी चूंडावत ने दीन दयाल शर्मा की कृति ‘इक्कावन बाल पहेलियाँ’ की भूमिका में लिखा है-
"पहेलियाँ केवल बच्चों का मनोरंजन ही नहीं करती, वरन उनमें जिज्ञासा भी जगाती हैं। पहेलियाँ बच्चों की स्मरण शक्ति बढाती हैं। ज्ञान बढाती हैं। अपने परिवेश को सीखने–समझने का अवसर प्रदान करती है। बौद्धिक क्षमता बढाती हैं तथा बच्चों को तर्कशील बनाती हैं। इसलिए ये विधा बालोपयोगी मानी जाती है।"– 6
इस प्रकार अमीर खुसरो से प्रारंभ होकर पहेलियों की यात्रा अनेक रंग-रूपों में आज अनवरत जारी है। खुसरो के बाद भारतेंदु हरिश्चचंद्र ने पहेलियों की परम्परा को आगे बढ़ाया। इन्होंने 'कह मुकरनियाँ' (पहेलियों का ही एक रूप) लिखीं, जिन्हें बालकों ने खूब पसंद किया। ऐसी एक कह मुकरनी प्रस्तुत है–
सतएं–अठएं मा घर आवे / तरह–तरह की बात सुनावै
घर बैठे ही जोड़े तार / क्यों सखि सज्जन, नहिं अखबार- 7

इसी श्रृंखला में घासीराम, खगीनियां, पंडित ने भी पहेलियों की विधा को खूब समृद्ध किया। प्रस्तुत है घासीराम की कुतूहल जाग्रत करने वाली अत्यंत लोकप्रिय एक पहेली-
कारो है पर कौआ नाहिं, रुख चढ़े पर बंदर नाहिं
मुँह को मोटो बिडवा नाहिं, कमर को पतलो चीता नाहिं
(चींटा)-8
इस समय की पत्रिकाओं ने जैसे शिशु (1915), बालसखा (1917), वानर (1931) बालक (1926), किशोर (1938), बाल बोध (1947) आदि ने भी पहेलियों को स्थान देकर इस विधा को बहुत समृद्ध किया।


स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् बाल पहेलियों के विकास ने और  गति पकड़ी और अन्य विधाओं की पहेलियों में भांति-भांति के नए–नए विषयों का समावेश हुआ। ज्ञान–विज्ञान, भूगोल, सामाजिक संदर्भ, धर्म, गणितीय, वर्णनात्मक, पर्यावरण, तकनीक, इंटरनेट, कम्प्यूटर से सम्बंधित पहेलियाँ लिखीं जाने लगीं। मूर्धन्य बाल साहित्यकारों ने नए–नए विषयों पर पहेलियाँ लिखकर बाल साहित्य को परिपुष्ट किया। डॉ. श्री प्रसाद, जय प्रकाश भारती, रामेश्वर दयाल दुबे, गोपीचंद श्रीनागर, घमंडीलाल अग्रवाल, कुलभूषण माखीजा, जगदीश तोमर, महेश सक्सेना, अजय शर्मा, राम वचन सिंह ‘आनंद’, डॉ. अजय जनमेजय, शैलेन्द्र कुमार चतुर्वेदी, बाबूलाल शर्मा ‘प्रेम’, ममता, संकेत, मो. फहीन, डॉ. गणेश दत्त सारस्वत, चाँद मोहम्मद घोसी (वर्ग पहेलियाँ, शब्द ज्ञान पहेलियाँ), दीनदयाल शर्मा आदि ने बाल पहेलियों के संदर्भ में उल्लेखनीय योगदान किया, जो अनवरत जारी है। वर्तमान में कथा पहेलियाँ और कविता पहेलियाँ भी लिखी जा रही हैं।
कुछ दैनिक समाचार–पत्रों में ‘शब्द ज्ञान पहेली’ शीर्षक से प्रतिदिन पहेली का प्रकाशन किया जा रहा है, जिसे पाठक–गण पूरे मनोयोग से हल करते देखे जा सकते हैं। डॉ. घमंडीलाल अग्रवाल की कम्प्यूटर के माउस पर लिखी एक पहेली प्रस्तुत है–

कम्प्यूटर भी मुझ से चलता, चाहे मुझे गणेश
मैं हूँ नन्हा किन्तु काम का, बोले पूरा देश
(माउस)- 9
इसी प्रकार एक और पर्यावरणीय पहेली--
पर्यावरण शुद्ध करने की खातिर पौध लगाओ
सर्वोत्तम जो भाग पौध का, उसका नाम बताओ
(जड़)-10
डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’, बाल साहित्य: सृजन ओर समीक्षा, पृष्ट -54
विज्ञान प्रगति, नवम्बर 1999)


पंजाब सौरभ में प्रकाशित अनिल कुमार की कुछ पहेलियाँ–
तीन अक्षर का मेरा नाम
आता हूँ लिखने के काम
आदि कटे हाथी बन जाऊँ
अंत कटे कौआ कहलाऊँ
(कागज)-11



पहेली के साथ वर्तमान काल में कह मुकरनियाँ भी लिखीं जा रही हैं, प्रस्तुत है डॉ. शशि गोयल की एक मुकरी–
नैन चलावे नाच दिखावे
नए रूप धर मोहे रिझावे
बैठे रूप निहारे बीवी
क्यों सखि साजन
ना सखि टी. वी.-12


बाल साहित्य की लुप्त होती इस विधा को दीनदयाल शर्मा ने 'इक्कावन बाल पहेलियाँ' के माध्यम से पुन जीवित करने का सार्थक प्रयास किया है। राष्ट्र नायकों में डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम, महात्मा गाँधी, लालबहादुर शास्त्री, पंडित जवाहरलाल नेहरू, बाल गंगाधर तिलक, भगत सिंह, चन्द्रशेखर आज़ाद, राजाराम मोहनराय ये सभी पहेलियाँ अत्यंत सुरुचिपूर्ण हैं, प्रस्तुत है एक पहेली–
माँ स्वरूप रानी थी जिनकी
पिता थे मोतीलाल
फूल गुलाब का जिन्हें प्रिय था
प्यारे बाल गोपाल

(जवाहरलाल नेहरू)- 13
(दीनदयाल शर्मा, इक्कावन बाल पहेलियाँ, पृष्ठ-8)
इसी प्रकार साइकिल पर एक ओर प्यारी व ज्ञानवर्द्धक पहेली-
दुपहिया पतली-सी गाड़ी,
प्रदूषण से दूर है
तन को कसरत करवाती है
इस पर हमें गुरूर है- 14

पहेलियाँ हमारी संस्कृति, लोक जीवन, साहित्य का अहम् हिस्सा रही हैं, जो आनंद, मनोरंजन देने के साथ-साथ बुद्धि का परिक्षण करते हुए ज्ञान के वातायन खोलती हैं।


 

 

 

संदर्भ-
1- डॉ. हरिकृष्ण देवसरे, बालसाहित्य मेरा चिन्तन, पृ– 187
2- डॉ. हरिकृष्ण देवसरे, बालसाहित्य मेरा चिंतन, पृ- 189
3- डॉ. नागेश पांडेय ’सजल’, बाल साहित्य के प्रतिमान, पृ- 94
4- डॉ. हरिकृष्ण देवसरे, बाल साहित्य मेरा चिंतन, पृ- 188
5- दीन दयाल शर्मा, इक्कावन बाल पहेलियाँ, कमलेश शर्मा की भूमिका से
6- दीन दयाल शर्मा, इक्कावन बाल पहेलियाँ, कमलेश शर्मा की भूमिका से
7- डॉ. नागेश पांडेय ’संजय’, बाल साहित्य: सृजन और समीक्षा, पृ- 51
8- डॉ. नागेश पांडेय ’संजय’, बाल साहित्य: सृजन और समीक्षा, पृ- 51
9- डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’, बाल साहित्य: सृजन ओर समीक्षा, पृ- 54
10- डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’, बाल साहित्य: सृजन ओर समीक्षा, पृ-54
11- अनिल कुमार , पंजाब सौरभ, अप्रैल 2015, सम्पादक- डॉ. वीरपाल कौर, पृ- 71
12- शशि गोयल, चक्रवाक, संपादक– निशांतकेतु, इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजर, नई दिल्ली, संयुक्तांक- 35-36, अक्टूबर 2015– मार्च 2016, पृ- 58
13- दीनदयाल शर्मा, इक्कावन बाल पहेलियाँ, पृ- 8
14- दीनदयाल शर्मा, इक्कावन बाल पहेलियाँ, पृ- 18


- कृष्णा कुमारी
 
रचनाकार परिचय
कृष्णा कुमारी

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