प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अप्रैल 2019
अंक -49

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

आँखों की भाषा
 

आँखों की भाषा
बिल्कुल अलग
व्यक्त कर देती है तुमसे
मेरे मन की हर बात
इसलिए कतराती हूँ
तुम्हारे सामने आने से भी
शायद
तुम्हें पता भी है
मेरी इस आत्मिक चाह का
लेकिन
तुम ही देखना नहीं चाहते
मेरी आँखों में छिपे
उस प्यार को
पता है मुझे
मजबूरी हैं तुम्हारी
लेकिन
प्यार तो दिखता है
फिर भी
सुनना चाहती हूँ
चाहे वो तुम्हारी
ना ही क्यों न हो
और
वैसे भी
मन में छुपे प्यार को
मैं भी
महसूस कर सकती हूँ
क्योंकि
ईश्वर ने
आँखें तुम्हे भी दी है!!


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ख़्वाब और हक़ीकत

सुनो,
आज भी वैसे ही हैं
सब अपनी जगह
बस....मेरी सोच से
ज़रा-से
फिसल गए हो तुम
दुनिया फिर से
हसीन लगने लगी है अब
जो कभी तुम्हारे साथ भी
बेज़ार नजर आती थी
तुमको तो जाना ही था
रोक तो मैंने रखा था
या यूँ समझो
कि खोना नहीं चाहती थी तुम्हें
एक उम्मीद
नहीं शायद एक जिद्द थी
बेतुकी-सी
कि पा ही लूँगी
तुमको भी मैं
जैसे तुमने मुझे पाया
याद तो आ जाते हो
तुम अब भी
जब अचानक से
तुम्हारा भेजा कोई गाना
एफ. एम. पर बज उठता है
कसक तो उठती हैं ज़ेहन में
हँसी भी आ जाती हैं अब तो
खैर जाने दो
अब मैं उस गाने में
तुमको नहीं
मेरी बेवकूफियों को पाती हूँ
एक बात पूछूँ तुमसे
सच बोलोगे?
क्यों न चल पाए तुम
साथ मेरे
वादा किया था न
कभी तुमने
मेरे साथ
बूढ़े होने का!


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मन की उलझन

तुम्हारी चाहत
तुम्हारी ही तरह
कभी मासूम तो कभी चंचल
विस्मित कर देता है मुझे
हर बार तुम्हारा बदलता अंदाज़!
कितना कुछ छिपा है
तुम्हारे व्यक्तित्व में
तुम्हें जानने की चाहत में
मैं और उलझ जाती हूँ
और उतना ही आसान है
तुम्हारे लिए
मुझे समझना
जैसे मुझमें ही कहीं
रहते हो छिपकर
और मैं ही अनजान बनी
ढूँढती हूँ तुम्हें
कस्तूरी मृग की तरह


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तुम्हारी कल्पना

जब भी सोचती हूँ
जो मैं तुम्हें
उसी क्षण
नई वधू-सी मैं
तुम्हारी एक झलक पाने को
बच्चों-सी मचल जाती हूँ
हक़ीकत में तुम
जितने दूर दिखते हो
कल्पना में उतना ही
क़रीब पाती हूँ तुम्हें
विश्वास करो
खोने के दर्द से
घबराती नही हूँ मैं
स्थिर भी हो चुकी हूँ अब
पर मैं चाहती हूँ
उस चिर मिलन की
अनुभूति को महसूस करना
जो संभव नही है
शायद हक़ीकत में
बस
इसीलिए मैं
तुम्हारी कल्पना में
फ़िर से डूब जाती हूँ


- हेमा दाधीच
 
रचनाकार परिचय
हेमा दाधीच

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कविता-कानन (2)