प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अप्रैल 2019
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

बीज

माटी की गोद में
सिर कुचल कर
कई-कई दिन
नीरव अमावस
घनघोर रातें
समाधि में रत
पूर्णिमा की आशा में
बेचारा बीज
खुद बिखर कर
बुदबुदा कर सोता है।
अपने नये-नये
संस्करण बनाने को
पुस्तक के पन्नो-सा
फड़फड़ाता है।
माटी की मजबूत
कसावट ने बांधकर
पांवों में बेड़ियाँ डाल दी हैं।
फिर भी
नया अस्तित्व बनाने
दो-दो हाथ कर
लहुलुहान होता है।
बीज का स्वभाव
बिखर कर छंटना है।
खुद बढ़कर
हर हाथ में बंटना है।
इसलिए
ज़मीन पर
पहली दस्तक
आँखों में सारा जहान है।
आशा भरा आसमान है।
कुदरत का वरदान है।
माटी का फरमान है।
सबकी सुनना
गांठ बांधकर
हर हाल में गुनना
नियति है।
उमंग भरी
आखातीज में
अठखेलिया रमता
बीज तो बीज है।
भूख का ताबीज है।


*****************


चुनाव

आजकल स्फूर्ति
दौड़ रही है।
मेरे शहर में
चारों तरफ बदलाव
प्यारा-प्यारा नज़ारा है।
अभी-अभी असरदार
पिघला शिलाजीत
ग्लूकोज की तरह
चढाया गया है
मरीज शहर की
टूटी-फूटी धमनियों में।
इससे चमक उठी है
कोलतार की सड़कें।
चौराहे पर चर्चा
चल रही है कि
इस बार चुनाव
सबकी तकदीर बदलेगा।
इसलिए
फूले न समा रही जनता।
भिखारियों के कटोरों में
प्रेमपूर्वक पूड़ियाँ परोसी जा रही हैं।
थोड़ी देर बाद
कोई छप्पनभोग चढ़ायेगा।
भोंपू गलियों में
चिल्ला-चिल्लाकर पुकारता है
कल भरपेट खीर मिलेगी।
काश!
नेता समझ बढ़ाता
अपना नजरिया बदलता
लोगों को सबक देकर
सामर्थ्यवान बनाता।
अगर जान लेता
कि-
भरपेट भोजन की भांति
हर हाथ को
हुनर सिखाना भी सेवा है।


- हरीश सुवासिया
 
रचनाकार परिचय
हरीश सुवासिया

पत्रिका में आपका योगदान . . .
कविता-कानन (1)