प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अप्रैल 2019
अंक -49

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ज़रा सोचिए

प्यार और डांट दोनों ज़रूरी

बहुत साल पहले हमने अपने घर में ही एक कमरे का सेट अलग से मरीज़ों को देखने के लिए बनवाया हुआ था ताकि समयानुसार उसका उपयोग कर सकें। प्रैक्टिस के शुरुआती दौर में वहाँ मरीज़ देखे पर जैसे-जैसे समय ग़ुज़रा, मुख्य क्लिनिक पर काफ़ी समय मरीज़ों को देखते-देखते हो जाता था और घर आते-आते बहुत देरी हो जाती थी तो सोचा घर की क्लीनिक को बंद किया जाए और उसको किसी छोटे परिवार को दे दिया जाए ताकि घर में थोड़ी चहल-पहल रहेगी। तभी किसी दुकान में कार्यरत दिनेश और उसकी पत्नी दिव्या ने हमसे किराए के लिए घर के लिए संपर्क किया। दोनों ही पढ़े लिखे समझदार लगे तो हमने उनको वो कमरा दे दिया। उनका पंद्रह-सोलह साल का एक बेटा था मयंक। दिखने में बहुत ही प्यारा बच्चा था पर शायद अकेला होने कि वजह से छोटी-छोटी बातों पर अपना रोष भी प्रकट करता था। बढ़ती उम्र के बच्चों में जब लंबाई के साथ-साथ परिवर्तन आ रहे होते हैं तो कभी-कभी तो वो बहुत समझदारी की बातें करते दिखते है और कभी उनका अल्हड़पन उनके बचपने को भी सामने लाकर खड़ा कर देता है। अक्सर किशोर अवस्था में बच्चे स्वयं को बहुत समझदार समझने तो लगते हैं पर हक़ीकत में वो समझदार हो रहे होते हैं।

इकलौता बेटा होने की वजह से पति-पत्नी दोनों का ही सारा समय और ध्यान सिर्फ मयंक पर होता। दिव्या अपने बेटे को बहुत अच्छी पढ़ाई के साथ-साथ उसको वो सब देना चाहती थी, जो स्वयं उसको कभी नहीं मिला था। महँगा मोबाइल आये दिन की उसकी छोटी-छोटी ज़रूरतों को पूरा करने में दिव्या को बहुत अच्छा लगता। सिर्फ इसी वजह से दिव्या ने भी नौकरी की ताकि दिनेश के ऊपर अतिरिक्त भार न पड़े। कई बार मयंक को पढ़ाई में कुछ समझना होता तो मेरे पास आ जाता था। वैसे तो काफी कुछ उसका कोचिंग में पूरा हो जाता था पर उसको जब स्कूली विषयों से इतर भी कुछ चर्चा करनी होती तो मेरे और डॉ. गुप्ता के पास आकर बैठ जाता और हमसे विभिन्न विषयों पर चर्चा करता।

आठ-नौ मास ही गुजरे होंगे कि मुझे अक्सर शाम को माँ-बेटे की किसी न किसी बात पर बहस  सुनाई देती। बहुत अधिक लाड़-प्यार की वजह से अपनी हर ज़िद को पूरा करवा लेना मयंक अपना हक़ समझता था। उसकी पढ़ाई को लेकर दिव्या बहुत चिंतित रहती। एक दिन मुझे दिव्या का ज़ोर-ज़ोर से मयंक को डांटना सुनाई दिया।
"क्यों नही जाना चाहते हो तुम कोचिंग पर? तुम्हारी हर ख्वाहिश को पूरा करने को मैंने भी नौकरी की। हम दोनों चाहते है तुम खूब पढ़ो। स्कूल के बाद बचे हुए समय में सिर्फ टी.वी. या मोबाइल लेकर बैठे रहोगे तो पढ़ोगे कब?"
"बहुत टोकती है आप मुझे, पढ़ लूँगा  मुझे पता है क्या करना है। बड़ा हो गया हूँ आपकी हर समय की डांट मुझे बिल्कुल अच्छी नही लगती।"  मयंक का जवाब मुझे सुनाई दिया।
"इतनी आसान नही है ज़िन्दगी बेटा! अगर बड़े हो गए हो तो बातों की गहराई तक भी पहुँच कर समझने की कोशिश करो।" दिव्या ने समझाने के उद्देश्य से कहा।


चूंकि एक कमरे का ही घर था तो थोड़ी देर बाद मैंने मयंक को कमरे से निकल कर घर के बाहर जाते देखा। उस समय बात आई गई हो गई। अगले दिन सवेरे हम जब क्लीनिक के लिए निकल रहे थे। दिव्या ने डॉ. गुप्ता से आकर मयंक के लिए मेडिसिन ली और बताया कि आज मयंक के पेट में दर्द है, स्कूल नहीं जा रहा है। उसको मेडिसिन देकर हम सभी अपने-अपने काम पर निकल गए। मेरे दिमाग़ में अभी तक मयंक की नासमझी घूम रही थी। सेंटर पर पहुँचकर मैं भी अपने कामों में व्यस्त हो गई। क़रीब तीन बजे मेरे पास दिव्या का फ़ोन आया।
"मैम! मयंक घर पर नही है और हम उसका मोबाइल लगा रहे हैं तो आउट ऑफ़ रीच या स्विच ऑफ आ रहा है। हम दोनों अपने दोस्तों और उसके दोस्तों के पास देखने जा रहे है आप घर लौटने पर उसको देखें तो उसको प्लीज कहीं जाने न दें।" फ़ोन पर बोलते-बोलते दिव्या को रुलाई छूट गई थी और वो लगातार रोते-रोते बोल रही थी।
"दिव्या! संभालो अपने आपको, मिल जाएगा मयंक।" मैंने ऐसा बोलकर उसको सांत्वना देने की कोशिश की। पर आज मेरी छटी इंद्री भी बोल रही थी कि मयंक ने गुस्से में कुछ न कुछ नासमझी का निर्णय लिया है। मयंक के न मिलने की वज़ह से थोड़ी घबराहट हम दोनों को भी हो रही थी क्योंकि मयंक अभी इतना बड़ा नहीं हुआ था कि सभी कुछ अपना संभाल सके और फिर आजकल के माहौल में बच्चों से जुड़ी आपराधिक वारदातें भी तो बहुत सुनने में आने लगी थीं।


मयंक के कहीं न मिलने पर पुलिस रिपोर्ट भी दिनेश और दिव्या ने करवाई। पूरा दिन निकल चुका था। दोनों के मुँह में खाने का एक निवाला भी नहीं गया। मिलने-जुलने वाले भी बराबर हर तरह से कोशिशों में लगे थे कि किसी तरह मयंक का पता चल जाये। पूरी रात जाने कैसे कटी उन दोनों की, हम भी तो उनकी परेशानी में शामिल हो चुके थे। तभी अचानक सवेरे अहमदाबाद से मयंक का फ़ोन आया दिव्या के फ़ोन पर। उसने दिनेश को फ़ोन नहीं लगाया था शायद वह दिनेश से बात करने की हिम्मत जुटा नहीं पाया हो। ऐसा मेरे दिमाग़ में आया।

"माँ मैं मुम्बई जा रहा हूँ। मैं कुछ भी करूँगा वहाँ। आप चिंता मत करना।" बोलकर मयंक चुप हो गया।
मयंक का फ़ोन खुल जाने से पुलिस ने भी उसको ट्रेक कर लिया था और आगे से आगे इन्फॉर्म कर उसको मुम्बई स्टेशन पर ही संभालने की ज़िम्मेवारी पुलिस ने ब-ख़ूबी निभाई। दिनेश ने भी मुंबई में रहने वाले अपने किसी दोस्त को मयंक के पास पहुँचने को कहा और उसको ख़ुद के मुम्बई पहुँचने तक संभालने को कहा। मयंक के अहमदाबाद से मुम्बई पहुँचने के बीच का समय दिनेश और दिव्या के लिए शायद सबसे भारी समय था। हर गुजरते पल के साथ उसकी सलामती के लिए दोनों की बैचेनी उन दोनों के चेहरे के हाव-भाव से साफ़-साफ़ नज़र आ रही थी।

बहुत दौड़-भाग से गुजरे चार दिनों के बाद मयंक को दिनेश वापस घर लेकर आ गया। इस बीच जाने कितनी ही बार दिनेश और दिव्या दोनों की रुलाई फूटी। बगैर खाये पिये दोनों ने चार दिन किस तरह गुजारे ईश्वर ही जानता था। उम्र में हम दोनों उन दोनों से बड़े थे। साथ ही मकान-मालिक होने की वजह से, हमारी इस परिवार के दुःख में शामिल होने की अप्रत्यक्ष-सी ज़िम्मेवारी बन गई थी। अभी तक एक शब्द भी मैंने दिनेश और दिव्या को ढांढस के अलावा नहीं बोला था। जैसे ही चार दिन बाद मयंक घर लौटा। दिव्या और दिनेश की आँखों में आँसुओं और लाड़ के अलावा कुछ नहीं दिख रहा था। उन दोनों को देखकर यही लगता था, जैसे ग़लती मयंक ने न करके दिव्या और दिनेश ने की हो। कई बार बच्चे माँ-बाप को कितना लाचार महसूस करवा देते हैं मानो कि बच्चों की भलाई सोचना भी बच्चे ग़लत तरह से ले जायेंगे।
चार-पाँच दिन और बीते होंगे तो एक दिन मयंक ने हमारी घंटी बजाई। मेरे दरवाजे पर पहुँचने पर मैंने बोला तो कुछ नहीं बस प्रश्नसूचक दृष्टि से मयंक को देखा।
"आंटी दो दिन बाद मेरा एग्जाम है कुछ समझना था आपसे, आप फ्री हो तो समझा दीजिये।" मयंक बोला।


शायद बहुत दिनों से मयंक के प्रति मेरा अबोला गुस्सा, मुझे न जाने कैसे चुप करवा के बैठा था यह मैं ही जानती थी पर उसको अपने सामने पाकर स्वयं को रोक नहीं पायी। "क्या मानते हो मयंक तुम मुझे? सिर्फ आंटी या गुरु की जगह भी देते हो।" मेरा यूँ अचानक इस तरह का गुस्से में प्रश्न पूछना मयंक को सकपका गया।
"आपसे पढ़ने आता हूँ। आप और अंकल मम्मा-पापा से काफी बड़े भी हैं तो आदर करता हूँ आप दोनों का।" मयंक ने बहुत शांत मन से जवाब दिया।
ध्यान से अब मेरी बात सुनो चूंकि तुम इतने छोटे बच्चे नहीं हो और तुम्हारी गुरु होने के नाते काश मैं तुमको एक थप्पड़  लगा पाती और तुमको भी तुम्हारे माँ और पापा के जैसे बग़ैर खाने के चार दिन तक एक ही जगह पर बांध सकती। ताकि तुम अहसास करो अपने पेरेंट्स के उस कष्ट को, जिसमें उन्होंने तुम्हारी अनुपस्थिति की यातना को भोगा है। क्या तुम्हारे भले की सोचना उनकी ग़लती है? या फिर तुमको उनको कष्ट देने में बहुत अच्छा लगा? यह कदम उठाने से पहले क्यों नहीं तुम उनकी चिंता कर पाये। कैसे तुमने यह सोचा इतनी छोटी उम्र में घर के बाहर की दुनिया तुमको ग़लत राह पर नहीं ले जाएगी। बेशक़ तुम्हारे पेरेंट्स ने तुमको डांटा या मारा नहीं, पर मेरे पास अगर कुछ समझना पढ़ना हो तो मुझे तुम्हारे लिखे हुए दो पत्र चाहिए, वो भी दिल से लिखे हुए। एक तो मुझे लिखो अपनी इन हरकतों की वजह बताते हुए। दूसरा अपने पेरेंट्स से माफ़ी माँगो अगर लगता है कुछ ग़लत किया है। तुमने किसी के बहकावे में आकर यह निर्णय तो नहीं लिया वो भी बताना। फिर आना मेरे पास तब तुमको बताऊँगी, जीवन में किताबी पढ़ाई-लिखाई के अलावा भी बहुत समझना जीवन का हिस्सा है। इसको तुम्हें समझना होगा क्योंकि तुम बड़े हो रहे हो और तुम्हारी यह नादानी हम सबके लिए विशेषतः तुम्हारे माँ-बाबा के लिए बहुत कष्टदाई रही है।

"सॉरी आंटी मुझसे आवेश में आकर ऐसी ग़लती हुई है। जानता हूँ मैं। आपको और मम्मी पापा को ज़रूर लिखित में माफ़ी मांगूगा।" मुझे खुद समझ नहीं आ रहा था मम्मी पापा को कैसे कहूँ, कैसे उनके आगे अपनी नासमझियों के लिए माफ़ी मांगू? क्या आप मेरी मदद करेंगी? मयंक ने कहा।
"ज़रूर करुँगी मयंक, अगर तुमने सभी कुछ दिल से महसूस किया है।" मैंने जवाब दिया।


अक्सर ही बच्चों को जितना मिलता जाता है वो अपना हक़ समझने लगते है। बच्चों के लिए प्यार जितना ज़रूरी है, उतनी ही डांट भी ज़रूरी है और बच्चों को इसकी आदत होनी चाहिए। नहीं तो भविष्य में उनको पता ही नहीं चलता ग़लत क्या है और सही क्या है। बहुत बार बच्चों की भटकन बहुत अधिक लाड़-प्यार की वजह से भी होती है। जब तक बच्चों को उनकी ग़लतियाँ ही नहीं पता चलेंगी तो वो सही निर्णय कैसे लेंगे! सोच कर देखिये ज़रूर।


- प्रगति गुप्ता