अप्रैल 2019
अंक - 48 | कुल अंक - 54
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

लेख

भारत और साम्प्रदायिकता के प्रश्न
- अनंत विजय पालीवाल


आधुनिक भारतीय इतिहास में यह तर्क कि सांप्रदायिकता या उससे उपजने वाले विनाशकारी वैमनस्य सिर्फ ब्रिटिश साम्राज्य की उपज है, सांप्रदायिकता की अवधारणा को ख़तरनाक सरलीकरण की ओर ले जा सकता है। यदि साम्प्रदायिक वैमनस्य सिर्फ अँग्रेजों की ही देन था तो अँग्रेजों के जाने के बाद इसे समाप्त हो जाना चाहिये था। जबकि वस्तुस्थिति यह है कि आजादी के बाद सांप्रदायिक घटनाओं में न केवल वृद्धि हुई है बल्कि अधिक विध्वंसक रूप में सामने आई है।

मुसलमानों के आगमन के पूर्व ही भारतीय उपमहाद्वीप में ब्राह्मण-बौद्ध, शैव-वैष्णव, नाथ-सिद्ध आदि आस्थाओं के बीच संघर्ष के प्रमाण मिलते हैं। सही मायने में ये संघर्ष सांप्रदायिक संघर्ष से ज्यादा कहीं राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक प्रतिद्वंदिता से उत्पन्न संघर्ष थे। जबकि मध्ययुगीन भारत में हिंदू राजाओं की पराजय और मुस्लिम शासन की स्थापना के बाद सामाजिक वर्चस्व या स्थान को लेकर प्रतिद्वंदिता स्वाभाविक थी। इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि प्रतिद्वंदिता सांस्कृतिक स्तर पर भी थी फिर भी कहीं न कहीं सांस्कृतिक मूल्यों का आदान-प्रदान हो रहा था।

दरअसल कुछ अपवादों को छोड़कर मुस्लिम शासकों ने भारत को अपना घर बना लिया था। गुलाम वंश से लेकर अंतिम मुगल सत्ता तक वे एक भारतीय शासक के रूप में ही रहे। उन्हें न ही कोई सम्पदा लूटकर बाहर भेजनी थी और न ही वे हजारों मील दूर से संचालित हो रहे थे। आम जनता से लड़कर वे वर्षों शासन नहीं कर सकते थे। अत: निरंकुश शासन की परिकल्पना उनके खुद के लिये आत्मघाती होती। इस सम्बंध में एडमंड बर्क ने सही लिखा था- “तुर्क आक्रमण दुष्टतापूर्ण था किंतु हमारा संरक्षण भारत का नाश कर रहा है। वे तो दुश्मन थे, हम दोस्त हैं। बीस साल बाद हमारी विजय के स्वरूप में कोई खास तब्दीली नहीं हुई। नौजवान अंग्रेज़ भारत पर हुकूमत कर रहे हैं, उन्हें देशी लोगों से कोई हमदर्दी नहीं है। देशी लोगों से वे उतना ही सम्पर्क करते हैं जितना दौलत बटोरने के लिये जरूरी होता है। जमाने की हविश और जवानी का जोश। उनकी भूख कभी शांत नहीं होती। मुनाफे का एक रुपया जो अंग्रेज़ लेता है, वह हिंदुस्तान के हाथ से हमेशा के लिये निकल जाता है। दूसरे विजेता अपने पीछे कई ऐसी यादगार छोड़ गये हैं, जिससे जनता का लाभ हो या उनका गौरव बढ़े।

दरअसल भारत आये अन्य सारे आक्रमणकारियों जैसे यवन, शक, हूण, मंगोल, तुर्क, अफगानी आदि ने या तो भारतीय संस्कृति को अपना लिया अथवा यहाँ के बाशिंदों के साथ मिलकर एक साझी संस्कृति का विकास किया। भारत की पहचान यही साझी संस्कृति है। जबकि अँग्रेजों की प्राथमिकता दूसरी थी। अपने लाभ के लिये उन्होंने इसी साझी संस्कृति को मोहरा बनाया। इसे धार्मिक और सांप्रदायिक रंग देकर कई व्यक्तिगत समस्याओं को सामूहिक समस्या के रूप में उभारा। नतीजन रिश्तों में राजनीति का प्रवेश हुआ। अत: यह समझना बेहद जरूरी हो जाता है कि व्यक्तिगत या स्थानीय समस्याएँ किस तरह क्षेत्रीय या सामूहिक द्वंद का निर्माण करती है।

1757 ई. में बंगाल और फिर बिहार पर विजय के साथ-साथ ब्रिटिश शासन की जड़ें पूरे भारत में जमने लगीं। जनता पर कई तरह के अत्याचार और शोषण ने आक्रोश को जन्म दिया। यह जन-असंतोष लगभग 100 वर्षों तक चलता रहा जिनमें अधिकार-च्युत सरदार, जमींदार, पोलीगर, भूतपूर्व सैनिक और भारतीय रियासतों के अनुजीवी शामिल थे। इनके नेतृत्व में कई सशक्त विद्रोह पनपे। बंदोबस्ती व्यवस्था और बेलगाम करों के कारण बड़ी संख्या में किसान और कारीगर इन विद्रोहों में हिस्सा लेते रहे। अधिक राजस्व की वसूली के लिये कंपनी ने घरेलू उद्योगों और कृषि को एक बंधुआ मण्डी की तरह इस्तेमाल किया, जिसने परिस्थिति को और विस्फोटक बना दिया। पूरे भारत में विद्रोहों की लगभग एक शृंखला-सी शुरु हो गयी। बंगाल में संन्यासी विद्रोह (1763-1800) इन्हीं परिस्थितियों की देन था। इसका नेतृत्व धार्मिक मठवासियों और बेदखल जमींदारों ने किया था। वारेन हेस्टिंगस एक लम्बे अभियान के बाद ही इसे दबा पाया। उसके बाद चुआर और हो विद्रोह (1766- लगभग 1816 तक), कोल विद्रोह (1831), संथाल विद्रोह, अहोम विद्रोह, खासी विद्रोह और पागलपंथी तथा फ़रेज़ियो का विद्रोह हुआ। इसी तरह पश्चिमी भारत में भील विद्रोह 1812-19 तक पुन: 1831 और 1846 में, कोलों का विद्रोह, कच्छ का विद्रोह, बधेरा विद्रोह, सूरत का नमक आंदोलन, रमोसी विद्रोह, कोल्हापुर तथा सावंतवाड़ी विद्रोह। उत्तर भारत भी कम अशांत नहीं था। सन्‌ 1824 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा के जाटों ने गम्भीर अशांति पैदा कर दी। सन्‌ 1805 में बिलासपुर के राजपूतों, सन्‌ 1814-17 में अलीगढ़ के ताल्लुकदारों और सन्‌ 1842 में जबलपुर के बुंदेलो ने जो विद्रोह किये, वे भी प्रमुख हैं। दक्षिण भारत की स्थिति भी कमोबेश यही रही। विजयनगरम् के राजा ने 1794 में विद्रोह किया। 18वीं शताब्दी के नवें दशक में पोलीगरों ने तमिलनाडू में, सन्‌ 1801 में डिंडीगुल और मालाबार में, सन्‌ 1801-05 तक तटवर्ती आंध्र में और 1813 से 1834 ई. तक परलाकिमिदि में विद्रोह किया। मैसूर वालों ने सन्‌ 1800-1831 में विजगापट्टनम विद्रोह सन्‌ 1830-34 के बीच हुआ। यहाँ त्रावणकोर के बेलू ताम्पी का भी विद्रोह महत्वपूर्ण है जो सन्‌ 1805 में हुआ।

इन आंदोलनों के अतिरिक्त इन 100 वर्षों में कई सैनिक विद्रोह भी हुए। सैनिकों के असंतोष का कारण उनका कम वेतन, भत्ते तथा जटिल सेवा शर्तें थीं। इसके अतिरिक्त निहत्थी आम जनता पर अत्याचार भी कभी-कभी उन्हें विद्रोह के लिये उकसाता रहा। प्रमुख सैनिक विद्रोह 1764, 1806, 1825, 1838, 1844, 1849-50 में हुए लेकिन प्राय: यह स्थानीय रूप के ही थे। इन सारे विद्रोहों और उनके सफलतापूर्वक दमन के बावजूद अँग्रेजों को सबसे ज्यादा भय मुसलमानों से था। भारतीय मुसलमान यह कभी नहीं भूला था कि एक दिन उनका भारत के अधिकांश भाग पर शासन था। अत: मुस्लिम शासन के पतन के साथ ही भारत के विभिन्न भागों में कई मुस्लिम आंदोलन शुरु हो गये थे। जिसमें सर्वप्रमुख था वहाबी आंदोलन। अंग्रेज़ प्रभुसत्ता को 100 वर्षों के विभिन्न आंदोलनों में सबसे सुनियोजित तथा गम्भीर चुनौती इसी आंदोलन से मिली। वहाबी आंदोलन 19वीं शताब्दी के चौथे दशक से सातवें दशक तक चलता रहा। इसके प्रवर्तक रायबरेली के सैयद अहमद (1786-1831) थे। वह अरब के अब्दुल वहाब (1703-87) से प्रभावित हुए परंतु उन पर दिल्ली के संत शाह वली उल्लाह (1702-62) का अधिक प्रभाव था। वहाबी आंदोलन का मुख्य उद्देश्य काफिरों के देश (दार-उल-हर्ब) को मुसलमानों के देश (दार-उल-उलूम) में बदलना था। दरअसल यह एक पुनुरुत्थानवादी आंदोलन था।


वहाबियों से अँग्रेजों को एक भय यह भी था कि सिथाना से निर्वासित वहाबी लोग अफगान अथवा रूसी सहायता प्राप्त करने में सफल न हो जाये। अत: 1860 के पश्चात अंग्रे़जी सरकार ने वहाबियों के विरुद्ध एक व्यापक अभियान आरम्भ किया और अनेक अन्य स्थानों पर न्यायालयों में वहाबियों के विरुद्ध देशद्रोह के अभियोग चलाये गये। दरअसल यह आंदोलन मुसलमानों का, मुसलमानों द्वारा, मुसलमानों के लिये ही था और इसका उद्देश्य भारत देश को मुसलमानों का देश बनाना था। यह आंदोलन किसी भी समय एक राष्ट्रव्यापी या राष्ट्रीय आंदोलन नहीं बन सका। अपितु इसके फलस्वरूप देश के मुसलमानों में पृथकतावाद की भावना जागी।

संघर्षों और विद्रोह की इस शृंखला की चरम परिणति थी 1857 का विद्रोह। जिसमें एक बार फिर सांप्रदायिक कटुता को किनारे रख मुसलमान और हिंदू समान रूप से अंग्रेज़ हुकूमत के खिलाफ एक हो गये। अंतिम मुगल शासक बहादुरशाह ज़फ़र को शंहशाहे-हिंदुस्तान घोषित किया गया। इस तरह सत्ता के केंद्र और प्रतीक के रूप में दिल्ली पर कब्ज़े के साथ ही 1857 के विद्रोह की शुरुआत हुई। दिल्ली पर कब्ज़े के एक महीने के भीतर विद्रोह लगभग सभी बड़े केंद्रों– कानपुर, लखनऊ, बनारस, इलाहाबाद, बरेली, जगदीशपुर और झाँसी तक फैल गया। विद्रोह के स्थानीय नेता ब्रिटिश शासन समाप्त करने समान हित के प्रति जागरुक थे। लखनऊ से जारी किये गये उनके एक घोषणापत्र में कहा गया था- “सभी हिंदू एवम् मुसलमान ये जानते हैं कि चार ऐसी चीजें हैं जो हम सबको समान रूप से प्रिय हैं: धर्म, आत्मसम्मान, जीवन और सम्पत्ति। इनकी रक्षा एक राष्ट्रीय सरकार के अंतर्गत ही हो सकती है।" इन सारी बातों से इतर एक तथ्य यह भी है कि झाँसी की रानी, तात्या टोपे, कुँवर सिंह, मौलवी अहमदुल्ला जैसे कुछ एक अपवादों को छोड़कर विद्रोहियों को अपने नेताओं से कोई खास मदद नहीं मिली। अधिकांश इस विद्रोह के महत्व को समझ नहीं पाये और अवसर के अनुकूल खड़े नहीं हो सके। बहादुरशाह ज़फ़र और जीनत महल को सिपाहियों पर भरोसा नहीं था और अपनी सुरक्षा के लिये वे ब्रिटिश अधिकारियों से बातचीत चला रहे थे। ज्यादातर ताल्लुकदारों को महज़ अपने हितों से मतलब था और मानसिंह जैसे कुछ लोगों ने तो परिस्थिति की माँग के अनुसार कई-कई बार अपनी वफादारी बदली। जान लारेंस ने ठीक ही टिप्पणी की है कि- “अगर उनमें (विद्रोहियों में) से एक भी योग्य नेता निकला होता तो हम सदा के लिये हार जाते।"

इन सबके बावजूद विद्रोहियों ने अपूर्व, साहस, समर्पण और प्रतिबद्धता का परिचय दिया। हजारों लोगों ने अपनी जान गंवाई लेकिन अंतत: उस सबसे बड़ी चुनौती का अंत हुआ, जो ब्रिटिश साम्राज्यवाद को भारत में झेलनी पड़ी। लेकिन यहीं से भारत में सांप्रदायिक राजनीति के नये अध्याय की शुरुआत भी हुई। केंद्रीय सत्ता के पतन और देश के महत्वपूर्ण आर्थिक क्षेत्रों पर अंग्रेज़ो के कब्ज़े ने अभी तक चली आ रही भारतीय राजनीति की बुनावट को पूरी तरह से उधेड़ दिया था। 1857 के तुरंत बाद एलफिंस्टन ने पूरी औपनिवेशिक सोच को इन शब्दों में व्यक्त किया था- "डिवाइड एट इम्पीरा वाज़ द ओल्ड रोमन मोटो, एज़ इट शुड बी आवर्स, अर्थात् पुरानी रोमन कहावत ‘फूट डालो और राज करो’ हमारी भी मार्गदर्शक होनी चाहिये। फूट डालो और राज करो की नीति की सबसे तार्किक परिणति हिंदू-मुस्लिम जनता के बीच हो सकती थी और राज्य के सचेत प्रयासों से वही हुआ।"

ब्रिटिश हुकूमत की साम्प्रदायिक राजनीति को शह देने की नीति ने कई सांप्रदायिक दंगों को जन्म दिया। इन दंगों को रोकने में कभी उतनी फुर्ती नहीं दिखायी गयी, जितने अन्य जन-आंदोलनों को रोकने में होती थी। इसका परिणाम यह हुआ कि “1857 तथा 1918 के बीच कुछ भयंकर सांप्रदायिक दंगे हुए। इनमें कुछ दंगे ऐसे स्थानों पर भी हुए, जहाँ पहले सांप्रदायिक विवाद का कोई उल्लेख इतिहास में नहीं था। इनमें बरेली (1871), मऊ (1893), बंबई (1893), नासिक (1894), पूर्वी बंगाल (1907), पेशावर (1901), अयोध्या (1912), आगरा (1913), शाहाबाद (1917) और करतारपुर (1918) के दंगे क्षति और दूरगामी प्रभावों के कारण उल्लेखनीय हैं।" सांप्रदायिकता की जो धारा भारतीय राजनीति में चल निकली थी, उसे रोकना किसी भी संगठन या नेतृत्व के लिये असम्भव-सा प्रतीत हो रहा था।

दरअसल बाद के समय में मुसलमान और हिंदू अपने आंतरिक मतभेदों को कभी सुलझा नहीं सके। ये आंतरिक मतभेद उनके व्यापक हित को किस कदर प्रभावित कर रहे थे, इसका आभास उन्हें नहीं हो पा रहा था। उनकी अपनी पार्टियाँ और अपने नेता खुद की समस्याओं तक सिमट कर रह गये थे। 1885 में कांग्रेस की स्थापना एक धर्मनिरपेक्ष पहल मानी जा सकती है लेकिन वहीं मुसलमान राजनीति का परिदृश्य तनिक ज्यादा जटिल था। 1885 के बाद अँग्रेजों ने मुसलमानों को खुश करने की नीति अपनाई और सैयद अहमद खाँ के नेतृत्व में मुसलमान राजनीति में ब्रिटानिया राज के प्रति निष्ठावान समुदाय का उदय हुआ। पर इसमें संदेह है कि अलीगढ़ आंदोलन ने उत्तर प्रदेश की सीमा से बाहर भी कोई प्रभाव डाला होगा। खास तौर पर बंगाल के मुसलमान, जिसमें ज्यादातर गरीब किसान थे, अलीगढ़ आंदोलन का हिस्सा नहीं थे।

उस समय (19वीं शताब्दी में) दो प्रमुख नेता सैयद अहमद खाँ और बदरुद्दीन तैय्यब जी मुस्लिम राजनीति की दो प्रमुख धाराओं का नेतृत्व कर रहे थे। तैय्यब जी कांग्रेसी थे और मुस्लिम राजनीति और अस्मिता को सभी के सहयोग से आगे ले जाना चाहते थे। वहीं सैयद अहमद प्रतिनिधिक सरकार के विरोधी थे क्योंकि हिंदू बहुसंख्यक थे और ऐसे में मुसलमानों को उनके अधीन रहकर काम करना पड़ता। इसी तरह गाँधी जी के राजनीतिक मित्र मौलाना शौक़त अली जो कि निश्चित रूप से साम्राज्य विरोधी थे। लेकिन खिलाफत आंदोलन के असफल होने के बाद गाँधी जी के साथ उनकी कटु बहस चली थी, जिसमें उन्होंने कांग्रेस और हिंदुओं के खिलाफ जहर तो उगला था पर यह भी कहा था कि मुझे अपने मुसलमान भाइयों को अँग्रेजों के चंगुल से बचाना होगा क्योंकि यह उनके लिये मौत का पैगाम होगा और इससे इस्लाम को बहुत नुकसान होगा। शौकत अली का यह पैगाम अँग्रेजों के विरुद्ध होते हुए भी कौम की ही नुमाइंदगी थी। आने वाले दशकों में मुसलमान राजनीति में यह प्रवृत्ति और तेजी व प्रमुखता से उभर कर सामने आई।

1906-07 में मुस्लिम लीग के गठन के साथ पहली बार आधुनिक भारत में आधिकारिक तौर पर किसी सांप्रदायिक संगठन का निर्माण किया। जिसे ब्रिटिश हुकूमत में मान्यता भी मिल गयी। 1905 में बंगाल विभाजन, 1907 में मुस्लिम लीग का निर्माण और 1914-15 में प्रतिक्रियावश हिंदू महासभा का निर्माण, सांप्रदायिक राजनीति के नये-नये स्तंभों के रूप में स्थापित होते चले जा रहे थे। ऐसी स्थिति में धर्म को सांप्रदायिकता से जुदा करना एक मुश्किल काम था। क्योंकि धर्म ही वह आग थी, जिस पर अंग्रेज़ी हुकूमत अपनी रोटियाँ सेंक सकती थी। कुछ लेखक भी यह मानते हैं कि भारत में सांप्रदायिकता के विकास का कारण यहाँ की बहुधर्मवादिता है। समानांतर अस्तित्व के कारण धर्मों में सर्वोच्चता की अभिलाषा और संघर्ष होना कोई गैर लाजिमी बात नहीं थी। लेकिन यह वास्तविकता नहीं है। भारत में सांप्रदायिकता या ऐसी राजनीति के विकास में धर्म की कोई बुनियादी भूमिका नहीं रही। दरअसल सांप्रदायिकता के दायरे में धर्म उसी हद तक आता है, जिस हद तक वह गैर धार्मिक मामलों में अपने राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति नहीं कर लेता। सांप्रदायिक राजनीति के लिये धर्म एक औज़ार भर है। इसका प्रयोग राजनीतिक गोलबंदी से आगे कभी गया ही नहीं। धर्म को लेकर उत्तेजक नारों का दौर 1757 से लेकर 1947 तक नेताओं की अपनी सहूलियत के हिसाब से जारी रहा। ये दोनों ओर रहा। सांप्रदायिक तनाव और दंगों का कारण धार्मिक आचरण और उन्माद तय करने लगा। यहाँ यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि धर्म को सांप्रदायिकता का कारण नहीं ठहराया जा सकता लेकिन सांप्रदायिकता ने धर्म को अपना औज़ार बनाया  इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता। "अत: धर्मनिरपेक्षता का तकाजा यह नहीं था कि धर्म को समाप्त कर दिया जाये बल्कि धर्म की भूमिका को व्यक्ति के निजी जीवन तक ही सीमित रखा जाये।"

इस प्रकार यह समझ आता है कि फूट डालो और राज करो की नीति के पीछे सिर्फ सांप्रदायिक कारण ही नहीं मौजूद थे बल्कि भारतीय समाज में बहुत पहले से ही कई विभाजनकारी तत्व मौजूद थे, जिन्हें धर्म के नाम पर सिर्फ प्रोत्साहित किया गया। भारत की विभिन्नता में एकता की बात तब केवल दूर की कौड़ी मात्र थी। आंचलिक, प्रांतीय, भाषाई आधार एक-दूसरे की खिलाफत जोरों पर थी। कमोबेश यही हाल विभिन्न विचारधाराओं में भी था जैसे- गरमपंथ-नरमपंथ, दक्षिणपंथ-वामपंथ, सुधारवादी-परम्परावादी, किसान-जमींदार आदि। दरअसल यह औपनिवेशिक राजनीति के औज़ारों के तौर पर कब और कैसे इस्तेमाल होते गये, इन्हें इसका आभास तक नहीं हुआ। वस्तुत: सांप्रदायिकता इन सभी माध्यमों से औपनिवेशिक राजनीति का पोषण कर रही थी, अन्यथा इन लोगों के हित पूरी तरह से उपनिवेशवाद से टकराते थे।

भारत में सांप्रदायिकता के पालन-पोषण के लिये ब्रिटिश हुकूमत ने कई पैंतरे आजमाए। इस संदर्भ में विपिन चंद्रा लिखते हैं- "एक, उसने हिंदुओं, मुस्लिमों और सिक्खों को लगातार ऐसे अलग-अलग समुदायों का दरजा दिया, जिनकी सामाजिक-राजनीतिक पहचान में कुछ भी साझा नहीं था। बताया गया कि भारत न तो एक राष्ट्र है, न राष्ट्र के रूप में उसका विकास हो रहा है और न वह विभिन्न जातियताओं का समुच्चय है– उसका गठन तो धर्म पर आधारित ऐसे समुदायों से हुआ है, जिनके हित आपस में टकराते हैं। दो, सांप्रदायिकतावादियों को सरकारी संरक्षण और रियायतें दी गईं। तीन, सांप्रदायिक पत्रों, व्यक्तियों और आंदोलनों के प्रति असाधारण असहिष्णुता दिखाई गई। चार, सांप्रदायिक माँगों को तुरंत स्वीकार कर लिया जाता था और इस तरह सांप्रदायिक संगठनों को राजनीतिक मजबूती दी जाती थी। उदाहरण के लिये 1885 से 1905 तक कांग्रेस एक भी माँग मंजूर नहीं करा सकी, जबकि मुस्लिम लीग ने 1906 में वायसराय के समक्ष अपनी सांप्रदायिक माँगें रखी ही थीं कि उन्हें मान लिया गया। इसी तरह 1932 में अँग्रेजों ने, जिसे ‘कम्युनल अवॉर्ड’ कहा जाता है, उसके माध्यम से लीग की तमाम मुख्य सांप्रदायिक माँगें मंजूर कर लीं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान मुस्लिम सांप्रदायिकतावादियों को पूरी छूट दी गई कि वे अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करें। पाँच, ब्रिटिश सरकार सांप्रदायिक संगठनों और नेताओं को उनके तथाकथित प्रामाणिक प्रवक्ता के रूप में तत्काल स्वीकार कर लेती थी, जबकि राष्ट्रवादी नेताओं को एक छोटे-से वर्ग या विशिष्ट वर्ग का प्रतिनिधि माना जाता था। छ्ह, सांप्रदायिक आधार पर बनाए गये चुनाव क्षेत्र।'

इस प्रकार किसी भी प्रकार की सांप्रदायिक घटना- परिघटना की अनदेखी हुकूमत की नीति बन गई। कुल मिलाकर भारत में सांप्रदायिकता के उभार के पीछे किसी एक घटना या तत्व को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता और न ही यह कोई धार्मिक मसला है। दरअसल यह सत्ता के षडयंत्र का एक उत्पाद है, जिसकी नींव आर्थिक और सांस्कृतिक श्रेष्टता पर टिकी हुई है।


- अनंत विजय पालीवाल

रचनाकार परिचय
अनंत विजय पालीवाल

पत्रिका में आपका योगदान . . .
आलेख/विमर्श (1)