प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अप्रैल 2019
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

गीत-गंगा

ढाई आखर बाँचो तो

पँख जलें तो जल जाने दो,
लौ के ऊपर नाचो तो।
जीने का आनंद मिलेगा,
ढाई आखर बाँचो तो।

हमने चाहा तो ये सारी
दुनिया ही अनुकूल लगी।
और हटाया मन इससे तो
बिलकुल हमें फिजूल लगी।

लगन पपीहे की कहती है,
अपनी चाहत जाँचो तो।

प्यार जहाँ है वहाँ कभी
शंकाएं जन्म नहीं लेतीं।
जीत-हार की दुविधाएं भी
हैं तकलीफ नहीं देतीं।

जिस जूनून में जला पतंगा,
उस जुनून में झाँको तो।

मैंने जितना प्यार दिया है
उससे ज्यादा पाया है।
इसीलिये कहता हूँ तुमसे
प्यार सदा रंग लाया है।

दीवानेपन की हद तक तुम,
अपना मकसद आँको तो।


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मन का मीत मिले तो जी लें

मन का मीत मिले तो जी लें एक बार डटके।
क्या बतलाएँ इस उलझन में कहाँ-कहाँ भटके।

आकर्षक चेहरों ने मुझको
कितनी बार छला।
वो मतलबपरस्त निकला
जो दिखता रहा भला।

उम्मीदों पर भारी ताले रहे सदा लटके।

जो भी मिला उसे जी भरकर
मैंने प्यार किया।
बदले में नफरत ही पाई
फिर भी प्यार दिया।

दूर निकल जाने पर भी कुछ लोग बहुत खटके।

अपनी-अपनी निपटो
सारी बस्ती डूब रही।
इस दुनिया में रीति प्यार की
यह भी खूब रही।

खड़े रहे अपनी-अपनी दीवारों से सटके।


- ज्ञानेन्द्र मोहन ज्ञान
 
रचनाकार परिचय
ज्ञानेन्द्र मोहन ज्ञान

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गीत-गंगा (2)