प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अप्रैल 2019
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्यांकन
मानवीय असंवेदना का दस्तावेज: विषाद
 
 
भौतिकता के चकाचौंध में मानव इतना अन्धा हो गया है कि- आज उसे किसी के सुख-दु:ख से कोई वास्ता नहीं है। ऐसी ही मानवीय असंवेदना को आधार बनाकर प्रो. रवीन्द्र प्रताप सिंह ने 'विषाद' नामक नाटक की रचना की है।
यह नाटक रूसी लेखक अन्तोन पाव्लाविच चेखव की कहानी 'द लेमेन्ट' का हिन्दी नाट्य रुपान्तरण है। अन्तोन पाव्लाविच चेखव का जन्म दक्षिण रूस के तगानरोग नामक शहर में 29 जनवरी 1860 ई. को तथा मृत्यु 15 जुलाई 1904 ई. को हुई। मुंशी प्रेमचन्द ने इन्हें सर्वश्रेष्ठ कथाकार कहा है।
 
प्रो. सिंह लखनऊ विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर हैं। प्रो. सिंह का नाम हिन्दी और अंग्रेजी साहित्य में बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। प्रो. सिंह हिन्दी और अंग्रेजी के अच्छे कवि, नाटककार, कहानीकार और कुशल रंगकर्मी हैं। इनके कार्यक्रम आकाशवाणी तथा दूरदर्शन से समय-समय पर प्रसारित होते रहते हैं। आपकी रचना 'शेक्सपीयर की सात रातें' पर आपको मोहन राकेश सर्जना पुरस्कार 2015 ई. मिला। 'फ्ली मार्केट एंड अदर प्लेज' पुस्तक पर डॉ. एस. एम. सिन्हा पुरस्कार 2017 ई., 'अंतर्द्वन्द्व' नाटक पर भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार 2017 ई. प्राप्त हो चुका है।
 
प्रो.सिंह के भाषा तथा शिल्प की सबसे बड़ी विशेषता है कि- उनका यह नाटक पढ़ने पर कहीं से भी यह नहीं लगता कि यह रूसी कहानी का हिन्दी नाट्य रुपान्तरण है। 
आज मनुष्य इतना असंवेदनशील हो गया है कि उसको किसी के जीने-मरने से कोई सरोकार नहीं है। नाट्क के मुख्य पात्र फ़ज़ल के बेटे की मौत एक सप्ताह पहले हो चुकी है, वह अपना दु:ख हाकिम, नक्कन, बक्कन, कम्मू, कुली आदि के साथ बाँटना चाहता है। पर किसी के पास उसका दुखड़ा सुनने का समय नहीं है, क्योंकि सबकी संवेदनाएँ मर चुकी हैं।
 
फजल-(स्वयं से) किससे कहूँ! हफ्ता बीता। कोई नहीं सुनने वाला। पूरी कायनात में कोई नहीं। मेरा बेटा मर गया। गुजर गया। अरे कब्र अभी सूखी भी नहीं है। कोई आ के मुझसे पूछे....पूछे तो सही! कैसे मरा बदल! कैसे मरा! अस्पताल में क्या हुआ। (फ़ज़ल उठता है, भीड़ की तरफ बढ़ता है। हर गुजरने वाले को रोककर अपना दु:ख बताना चाहता है। कोई रुकने को तैयार नहीं, बात करने को तैयार नहीं)।
इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रो. सिंह ने अपनी लगभग प्रत्येक रचना में मानवता को पुनर्जीवित करने का का कार्य किया है जो सराहनीय है। उनके नाटकों में एक विशेष बात होती है कि वे गीत से परिपूर्ण होते हैं। यही गीत यदि छन्दबद्ध हों तो नाटक की रोचकता और बढ़ जायेगी।
 
 


 

समीक्ष्य पुस्तक- विषाद (नाटक)
लेखक- प्रो.रवीन्द्र प्रताप सिंह
प्रकाशन- सनलाइम पब्लिकेशन्स, जयपुर
संस्करण- प्रथम, 2018
मूल्य- 75 रूपये


- डॉ. अरुण कुमार निषाद