प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जनवरी 2019
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ज़रा सोचिए
परिवार इनके लिए भी आवश्यक है
 
यह बात सन 2001 की है। एक दिन अचानक ही मेरा मन हुआ कि कुछ समय अनाथ बच्चों को भी दिया जाये। मुझे लगता था, शायद उनके भी कुछ अनसुलझे अन्तरद्वंद हों और मैं उनको सुलझा पाऊँ। इसी विचार ने सवेरे से मेरे मन को घेर रखा था। चूँकि मैंने उस समय पी. एचडी करने का भी मानस बनाया हुआ था तो सोचा कि अगर संम्भव हुआ तो अपने शोध का विषय भी निश्चित कर लूँगी।
जब अनाथाश्रम में पहली बार मैं वहाँ के संचालक से मिली तो उनसे मिलना एक ईश्वरीय संजोग था। वह एक ऐसे व्यक्तित्व के धनी थे, जिनका जीवन समाज-सेवा के लिए समर्पित था। लोग उन्हें बाउजी पुकारते थे, सो उनसे मिलने के बाद यही संबोधन मुझे भी बहुत भाया क्योंकि उनका समाज के लिए करने का भाव, इस संबोधन के लिए बहुत उपयुक्त था। उन्होंने जैसा कि मुझे बताया था कि उनके जीवन का एक बड़ा हिस्सा किस-किस तरह से समाज को ही समर्पित है, उनकी बातों से मुझे भी प्रेरणा मिली और  मैं भी इन बच्चों के लिए कुछ करूँ जैसे मेरे भाव और भी प्रबल हुए।
 
जब हमारी विस्तृत बातचीत हुई और मैंने उनको अपने बारे में बताया कि मैं सामाजिक व चिकित्सा के क्षेत्र में कॉउंसिलिंग से ही जुडी हुई हूँ, तब उन्होंने मुझसे आग्रह किया कि मैं उनके द्वारा संचालित अनाथाश्रम की बारह से अठारह साल की बच्चियों को समय दूँ और उनको जीवन में आने वाली तरह-तरह की उलझनों और उनके समाधानों से अवगत कराऊँ। साथ ही उन्होंने मुझसे आग्रह किया था कि "बेटा! मुझे इन लड़कियों की शादियाँ करनी हैं, अगर तुम्हारी समझाइश से यह बच्चियाँ भविष्य में अपने-अपने परिवार अच्छे से संभाल पाएँ तो मुझे बहुत अच्छा लगेगा।" उनका आग्रह ही इतना सकारात्मक था कि मेरा इनकार करने का प्रश्न ही नहीं उठता था और यही मैं दिल से चाहती भी थी कि अपना कुछ समय इन बच्चों को भी दूँ।
 
उनके आग्रह के बाद हर रोज़ ही मेरा लगभग दो घण्टों का समय उन बच्चियों के साथ गुजरता था, उनके पढ़ने-लिखने से लेकर हर ऱोज उनके अलग-अलग प्रश्नों और उत्तरों के बीच मेरा समय कब निकल जाता; मुझे पता ही नहीं चलता था। अलग-अलग बच्चियों के साथ मेरे अलग-अलग अनुभव रहे। उनकी जिज्ञासाओं से जुड़ी छोटी-छोटी उलझनों को मैंने बहुत ही सहज रूप से, उन्हें अपना बनाकर सुलझाने की कोशिश की और काफ़ी हद तक मैं अपने कार्य में सफल भी रही, यह मुझे बच्चों ने ही मेरे प्रति उनके अपनेपन के भाव से महसूस करवाया।
 
जब बच्चा किसी परिवार के बीच जन्म लेता है तब वह स्वतः ही धीरे-धीरे उस परिवार के मूल्यों में ढलकर संस्कारित होता जाता है क्योंकि कुछ गुण और दोष बच्चे में माँ और बाप दोनों से स्वतः ही हस्तान्तरित होते हैं। पर वो बच्चे जिनको अनाथाश्रम में छोड़ा जाता है या कहीं से उठाकर पहुँचाया जाता है, उन पर कुछ अधिक मेहनत की आवश्यकता होती है क्योंकि इनमें से काफी बच्चे अपरिपक्व या समय से पूर्व ही जन्म लिए हुए ही होते हैं। दूसरी ओर, जो बच्चे एक परिवार में जन्म लेते हैं वो रिश्तों के जुड़ते ही, विभिन्न भावों से स्वतः ही जुड़ते जाते हैं और बच्चे अपने आप में एक मजबूत सम्बल महसूस करते हैं।
 
अनाथ बच्चों में आत्मविश्वास और संवेदनाएँ पनपने में थोड़ा अधिक समय लेते हैं। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि जिस बच्चे के कोख़ में आते ही माँ-बाप या माँ या अन्य घर वाले उसको पहले से ही छोड़ने का मानस बना लें और मौका पाते ही उसको छोड़ने की योजना पर क्रियान्वन करें, तो ऐसे बच्चों की मानसिक तरंगे, सामान्य परिवार में जन्म लेने वाले बच्चों की मानसिक तरंगों से काफी भिन्न हो सकती हैं। एक ओर बच्चे के पनपने से पहले ही उसके प्रति छोड़ने का भाव नकारात्मक तरंगों से जुड़ा हुआ है और दूसरी ओर परिवार में जन्म लेने वाले बच्चे के प्रति अपनाने का भाव जुड़ा हुआ है। यह सकारात्मक तरंगों को जन्म देता है। यह सब बातें किसी भी नवांकुर के पनपने में सकारात्मक व नकारात्मक सहयोग देती हैं, यह सब बातें मुझे उन अनाथ बच्चियों के साथ समय गुजारने पर नज़र आई। नकारत्मक और सकारात्मक भावों के परिणाम हमको दोनों तरह के बच्चों के साथ समय गुज़ारने पर पता चलते हैं।
 
इसमें से जो बच्चे किन्हीं परिवारों में गोद ले लिए जाते हैं, वे काफी कुछ उन परिवारों से ग्रहण कर सीख लेते हैं पर जैसा कि हम सभी जानते हैं, सभी बच्चे तो गोद नहीं जाते, जो बच्चे गोद जाने से रहे जाते हैं और वहीं रहकर पढ़ते हैं, उनके समर्थ व व्यस्क होने पर जब उनके विवाह होते हैं तो उनको परिवार का असल रूप देखने व जीने को मिलता है, हालांकि वह भी समय के साथ सभी को अपना लेते हैं पर उनको परिवार में ढलने में वक़्त लगता है। मुझे ऐसी ही बच्चियों को तैयार करना था। मैंने उनको काफ़ी समय दिया। सबकी पढ़ाई के बाद बहुत अच्छे से शादियाँ हुयीं, जब मुझे पता चला कि सब अपने-अपने परिवारों में ख़ुश हैं, मुझे भी दिल से प्रसन्नता हुई।
 
उस दौरान मुझे जो दिल से महसूस हुआ वो यह है कि अगर हम बच्चों को गोद ले सकते हैं, अगर हम समर्थ हैं तो ज़रूर गोद लें। बेशक़ यह बच्चे मजबूरियों की उपज हैं पर इनको भी पनपने के लिए परिवार की ज़रूरत है। इस बात से कोई फर्क़ नहीं पड़ता कि गोद बेटा लिया जाये या बेटी, आज किसी भी बच्चे को परिवार देना सबसे बड़ी समाज सेवा है। इस विषय पर भी हम सभी को सोचना चाहिए।

- प्रगति गुप्ता