प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितम्बर 2015
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़लें

ग़ज़ल

ज़िन्दगी दरअस्ल बस क़िस्सा-कहानी ही तो है
हसरतों की, चाहतों की तर्ज़ुमानी ही तो है

साथ इसके चल पड़ो, ठहरे रहो या डूब लो
उम्र का क्या? उम्र दरिया की रवानी ही तो है

पाँव के नीचे ज़रूरी है ज़मीं थोड़ी बहुत
आसमां का ख्व़ाब, साहब! आसमानी ही तो है

था जहां कहना, वहां पर कह न पाये उम्र भर
काग़ज़ों पर शेर लिखना बेज़ुबानी ही तो है

कौन से सुर्ख़ाब के पर थे लगे मुझमें भला
जो उड़ा हूँ, सब उसी की मेहरबानी ही तो है

एक रिश्ता चूड़ियों में टूट कर चुभता रहा
यूँ अगर देखें, कलाई पर निशानी ही तो है

गर किसी अहसास तक पहुंचा तो मोती बन गया
अश्क भी वरना फ़क़त नमकीन पानी ही तो है

तर्ज़ुमानी= अनुवाद


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ग़ज़ल

मिला जितना ही, उतनी चाहतें बढ़ती गईं मेरी
दर-ओ-दीवार उसके थे, छतें बढती गईं मेरी

हवा, ख़ुशबू, सुनहरी धूप, बादल, फूल, तितली-सा
मिला जब भी मुझे वो हसरतें बढ़ती गईं मेरी

दुआओं में, कभी इमदाद की ख़्वाहिश जता देता
हमेशा ख़ुद की ख़ातिर मन्नतें बढ़ती गईं मेरी

मेहर तेरी हुई जब-जब, रहा हर बार नाशुकरा
क़हर तेरा दिखा तो मिन्नतें बढ़ती गईं मेरी

जो पहले दिन ही मुझको टोक देती तू तो अच्छा था
मेरी माँ! देख, कैसी हरक़तें बढ़ती गईं मेरी

ख़ुदा जाने वो जादू-सा कहीं कुछ था अँगुलियों में
छुआ जैसे ही उसने राहतें बढ़ती गईं मेरी

किसी भूखे को रोटी दी, किसी की चोट सहलायी
न जाने क्यूँ तभी से बरकतें बढ़ती गईं मेरी


- त्रिवेणी पाठक
 
रचनाकार परिचय
त्रिवेणी पाठक

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ग़ज़ल-गाँव (1)