सितम्बर 2015
अंक - 7 | कुल अंक - 54
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

‘रेहन पर रग्घू’ : दरकते रिश्ते, बिखरते गाँव : अजीत कुमार पटेल
(संदर्भ-भूमंडलीकरण)



“अगर ‘काशी का अस्सी’ मेरा नगर है तो ‘रेहन पर रग्घू’ मेरा घर है  – और शायद आपका भी ।”1 वरिष्ठ कथाकार काशीनाथ द्वारा घोषित उक्त कथन अर्थ के कई परत को उघाड़ता है भाव के स्तर पर भी और भाषा संरचना के स्तर पर भी । एक सतही रूप में देखा जाए तो लेखक ने अपने दो प्रसिद्ध उपन्यासों की चर्चा भर की है; परन्तु सूक्ष्म सामाजिक धरातल पर विश्लेषण करें तो पाते हैं कि लेखक ख़त्म होती मानवीय संवेदना तथा शहरी आपा-धापी का दूषित प्रभाव जो गाँव-घर के चौखट पर दस्तक दे चुका है, की ओर इंगित करता है । पूँजी की जकड़न से मानवीय संवेदना का मरण और विकास की बेतरतीब अवधारणा को भी चिन्हित किया गया है । ‘और शायद आपका भी’ आम भारतीय जनमानस से सांस्कृतिक संरक्षण करने का जो चित्र खींचा है वो भरोसेमंद है । केवल काशी या रघुनाथ को ही नहीं अपितु तथाकथित मुख्यधारा के समस्त सामाजिक पक्षों को आज का आभासी विकास प्रभावित कर रहा है । इसीलिए लेखक का यह भावुक इशारा आम जनमानस को होशियार करने में कुछ योगदान देने की पहल करता हुआ प्रतीत होता है ।

    
‘रेहन पर रग्घू’ काशीनाथ सिंह का साहित्य अकादमी से पुरस्कृत ख्यातिप्राप्त उपन्यास है ।  जिसमें लेखक ने भूमंडलीकरण की मृगमरीचिका तथा समकालीन मनुष्य जो निरंतर एकाकीपन की ओर अग्रसर है, का निहायत संजीदगी से चित्रण करने का सफलतम प्रयास किया है ।  वैश्विकरण की विद्रूपताओं को टटोलने वाला यह एक लोकप्रिय उपन्यास है । कथाकार ने यह बताने का प्रयास किया है कि किस तरह बाजार हमारे गाँव  घर में घुस चुका है और हमारी चेतना, संस्कृति को कैद किया जा रहा है । पूँजी के प्रलोभन, नवधनाढ्य मध्यवर्गीय जीवन और इस प्रकार के मुखौटावादी समाज का कथाकार ने जो चित्र खींचा है उसकी बानगी देखिए -“जिस कम्पनी में और जिस कांट्रेक्ट पर अमेरिका जाना है उससे तीन साल में कोई भी इतना कमा लेगा की अगर उसका बाप चाहे तो गाँव का गाँव खरीद ले ।”2 अर्थात घर परिवार की सारी समस्याओ का समाधान पूँजी में निहित हैं पूँजीवाद और भूमंडलीकरण ने गाँव, घर, समाज, संस्कृति, रिश्ते-नातों सम्बन्धो, पारस्परिक अस्मिता आदि के साथ कुछ इस तरह से खिलवाड़ किया की मानवीय संवेदना के सारे स्रोत सूखते नजर आ रहे हैं । वरिष्ठ आलोचक चौथीराम यादव का मानना है कि “पूँजीवाद आर्थिक सम्बन्धो को इतना मजबूत बना देता है कि उसके सामनें पारम्परिक संस्कार और संवेदनात्मक सम्बन्ध चकनाचूर हो जाते हैं । बाजारवाद के इस दौर में रूपये की खनक ने जिन्दगी की खनक को फीका कर दिया हैं ।”3


काशीनाथ सिंह अपने उपन्यास में इस बात की सूचना देते हैं कि किस प्रकार गावों में शहर का प्रवेश होकर नई बसी कालोनियों में उपभोक्तावाद और बाजारवाद निरंतर प्रवेश करता जा रहा है, जो इक्कीसवीं सदी की वास्तविकता का जीता जागता उदाहरण है । एक ऐसा दस्तावेज़ है जिसमें वैश्वीकृत मनोदशा की चर्चा है, साथ में शोषित प्रतिकार, नये युग की स्त्री व्यथा-कथा, नारी का प्रेम और विवाह जैसी संस्था से मोहभंग आदि का दक्ष अंकन भी है । तद्भव के संपादक अखिलेश का मानना है कि “भूमंडलीकरण के परिणामस्वरूप संवेदना, सम्बन्ध और सामूहिकता की दुनिया में जो निर्मम ध्वस हुआ है- तब्दिलियों का जो तूफान निर्मित हुआ है उसका प्रामाणिक और गहन अंकन है ‘रेहन पर रग्घू’ ।”4 मतलब साफ है कि भूमंडलीकरण ने तत्कालीन समाज में मनुष्य के एकीकृत समाज, स्मृति, स्वप्न और सम्बन्ध आदि पर करारा प्रहार कर इन्हें चकनाचूर कर दिया है । भौतिकवादी लालसा के चक्कर में मानव ने अपनें स्वप्न को भी समेटकर रख दिया है । कवि पाश ने बहुत पहले ही लिखा था ‘बहुत खतरनाक होता है सपनों का मर जाना’ ।


धूमिल होती इंसानियत और भौतिक चकाचौंध के इस बाजारवादी युग में भूमंडलीय मोनोकल्चर (एकल संस्कृति) एक ऐसे समाज का सृजन कर रहा है जो विचारहीनता से परिपूर्ण है । पश्चिम की विकट भोगवादी प्रवृत्ति ने मानव को न केवल यंत्रित कर रखा है अपितु उसके चेतना विवेक को घर की चहारदीवारी के भीतर कैद कर रखा है । ‘रेहन पर रग्घू’ इन्हीं साजिशों के प्रति जिरह करते हुए आधुनिक मानव को सचेत करता हुआ प्रतीत होता है । कथानायक रघुनाथ एक ऐसे ग्रामीण मध्यवर्गीय समाज का प्रतिनिधित्व कर रहा है जो वर्तमान उदारवादी पूँजी के प्रलोभन और शहरी चकाचौंध से प्रभावित तो है लेकिन अपने गाँव-घर, पारंपरिक संस्कृति आदि से मोहभंग भी नहीं हो पा रहा है । रघुनाथ न तो अपने गाँव को छोड़ पा रहे हैं जहाँ उनकी पुश्तैनी यादें सिमटी हैं और न ही शहर को पूरी तरह से आत्मसात कर पा रहे हैं । कथानायक के मन में ये अंतर्द्वंद देखे जा सकते हैं – “वे गाँव से अजीज भी आ गए थे लेकिन उसे छोड़ना भी नहीं चाहते थे । मन शहर और कॉलोनी की ओर बहक रहा था – जीवन के नयेपन की ओर,........अनजाने नए सम्बन्धों की ओर । ये आकर्षण थे मन के लेकिन उधर जाने में हिचक भी रहा था मन ।”5  समीक्षक प्रो. चौथीराम यादव ‘रेहन पर रग्घू’ के कथावस्तु एवं संवेदनात्मक मनोभाव के आधार पर प्रेमचंद के ‘गोदान’ से भावसाम्यता ग्रहण करने का प्रयास करते हैं । उनका मानना है कि –“ यदि ‘रेहन पर रग्घू’ उत्तरशती का ‘गोदान’ प्रतीत हो और रघुनाथ के चेहरे में होरी का चेहरा नजर आये तो क्या आश्चर्य ? ”6  
भूमंडलीकरण के इस पूँजीवादी चरित्र ने मध्यवर्गीय जीवन को दोमुँहापन की ओर धकेल दिया   है । मनुष्य समाज में रह भी रहा है तो मुखौटा लगाकर, वास्तविक चरित्र से उसका कोई सरोकार न रहा । नव उदार आर्थिक बाजार ने समाज को एक छद्म रूप दे दिया है । इन्हीं सारी सामाजिक विडम्बनाओं को कथानायक झेलता है और एक ऐसे भँवर में फँसता चला जाता है जहाँ से निकल पाना असंभव सा प्रतीत होता है । आलोचक पुष्पपाल सिंह यह स्वीकारते है कि – “ ‘रेहन पर रग्घू’ जिसे बुढौती दंश पर केन्द्रित उपन्यास कहा जा सकता है किन्तु अपने विस्तार में जाता हुआ उपन्यास अपने को वैश्विक समस्याओं से जोड़ता है कथानायक रघुनाथ का जीवन विस्तार जो बनारस के समीपस्थ पहाड़पुर गाँव से अमेरिका तक फैला हुआ हैं ।”7


बाज़ार और भोगवादी पूँजी ने समूचे वैश्विक परिप्रेक्ष्य में न केवल राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तन किये अपितु सामाजिक सम्बंद्धता, पारिवारिक सम्बंध और मानवीय मूल्यों में भी ब्यापक बदलाव देखने को मिलता है । सच पूछा जाए तो भूमंडलीकरण का दोगलापन चरित्र केवल और केवल जोड़-तोड़ का है । अलगाववाद, सामाजिक भेदभाव, तुष्टिकरण के रूप में इनके पास अमोघ अस्त्र होते हैं, जिनको गाहे-बगाहे क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चलाते रहते हैं । सामाजिक सम्बन्धों का बिखराव, स्वार्थपरक जीवन, सबकुछ कह एवं कर गुजरने की तमन्ना, सहअस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह जैसे अवांछनीय प्रक्रियाओं का मानव जीवन में इतनी तीव्र गति से हस्तक्षेप हो रहा है कि समूचा समाज असहाय, बेबस, लाचार जैसी स्थिति में खड़ा पाता है । काशीनाथ का रघुनाथ भी ऐसे ही किंकर्तव्यविमूढ़ हो चुका है । पूँजीवादी प्रलोभन और आपाधापी माहौल ने रघुनाथ के संतानों को एक ऐसी संस्कृति की ओर धकेल दिया है जिससे सम्पूर्ण परिवार बिखराव के कगार पर पहुँच चुका है । इस तरह बेबस रघुनाथ अनायास ही अपनी पत्नी से कहते हैं- “शीला हमारे तीन बच्चे हैं लेकिन पता नहीं क्यों कभी-कभी मेरे भीतर ऐसी हूक उठती है जैसे लगता है –मेरी औरत बाँझ है और मैं निःसंतान पिता हूँ ।”8


बहरहाल, ‘रेहन पर रग्घू’ का रघुनाथ न केवल अपने पारिवारिक झंझावातों को देखता है वरन सम्बंधित अन्य पात्र मसलन  छब्बू पहलवान, एल,एन.बापटे, जीवनाथ वर्मा, आदि ऐसे लोग हैं जो कहीं न कहीं से मानसिक अवसादों से जूझ रहे हैं । जाहिर है कि सामाजिक परंपराओं की धार अब कुंद होने लगी है । विवाह जैसे संस्कार अब केवल औपचारिक मात्र रह गए हैं । बदलते हुए सामाजिक परिवेश में भूमंडलीकरण मनुष्य के सम्बन्धों से कैसे खिलवाड़ कर रहा है इसकी समझ काशीनाथ सिंह को है । रघुनाथ का बेटा संजय अमेरिकी जीवनके दौरान अपनी पत्नी से किस तरह के विचारों को रखता है ? एक उदहारण दृष्टव्य है- “मैं तो डियर, परदेस को ही अपना देस बनाने की सोच रहा हूँ ।........तुम भी क्यों नहीं ढूढ़ लेती एक बॉयफ्रेंड ?”9


मनुष्य की संकटग्रस्त आदमियत तथा गाँव घर की पारिवारिक त्रासदी के जिंदा दस्तावेज के साथ- साथ काशीनाथ सिंह अपने उपन्यास के तनावपूर्ण कथानक में दुनियादारी से इतर सुकूँ देने के लिए अथवा यूँ कहे कि अपने वैचारिक संदेश में रवानगी लाने के लिए ‘प्रेम’ का भी सहारा लिया है । वर्तमान युग में प्रेम को किस तरह जिया जा रहा है , मध्यवर्गीय समाज कैसे प्रेम को परिभाषित कर सकता है ? इसकी समझ कथाकार में देखा जा सकता है- “ प्यार बंद और सुरक्षित कमरे की चीज नहीं । खतरों से खेलने का नाम प्यार है । लोगों की भीड़ से बचते बचाते, उन्हें धता बताते, उनकी नज़रों को चकमा देते जो किया जाता है – वह है प्यार ।”10  कहीं-कहीं लेखक का दार्शनिक अंदाज भी दिखता है – “ प्यार एक खोज है सल्लो । जीवन भर की खोज कभी ख़तम और कभी शुरू । खोज किसी और की नहीं खुद की ।”11 कहने का आशय यह है कि समूचे उपन्यास में एक ऐसे ग्रामीण मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि को दर्शाया गया है जिसमें संवेदनाओं से मर चुके तथा भौतिक वस्तुओं की लालसा में कुंठित वर्तमान समाज को ‘प्रेम’ ही वास्तविक सहारा दे सकता है ।


अतः स्पष्ट है कि भूमंडलीकरण के दौर में जहाँ हर तरफ मानवता विरोधी शक्तियाँ सक्रिय है, ऐसे समय में ‘रेहन पर रग्घू’ न सिर्फ मानव विरोधी षड्यंत्रों का खुलासा करता है बल्कि उन पर चोट भी करता है । कथाकार ने बदलते सामाजिक मूल्यों के विघटन और पारिवारिक सम्बन्धों की भूमिका को रेखांकित किया है । बाजारवाद के आत्मघाती समय और उपभोक्ता संस्कृति की विरूपता को पहचानने में यह रचना काफी मुखर है । मनुष्यता विरोधी शक्तियों से दो-दो हाथ न कर पाने का दर्द भी कहीं-कहीं देखने को मिलता है । उपन्यास में प्रयुक्त एक फ़िल्मी गीत और अपनी बात ख़त्म –
“वक्त ने किया, क्या हसीं सितम
    तुम रहे न तुम , हम रहे न हम ”12


सन्दर्भ ग्रन्थ सूची –
1 – काशीनाथ सिंह, रेहन पर रग्घू, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली,2010, पृ.सं.7
2 – वही, पृ.सं. 23
3 – चौथीराम यादव, संवेद पत्रिका,सं.किशन कालजयी, जनवरी 2013 पृ.सं.71
4 - काशीनाथ सिंह, रेहन पर रग्घू, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली,2010, पृष्ठ भाग
5 - वही, पृ.सं. 92
6 – पुष्पपाल सिंह, भूमंडलीकरण और हिंदी उपन्यास,राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली 2012,पृ.सं.103
7 - काशीनाथ सिंह, रेहन पर रग्घू, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2010, पृ.सं.89
8 - वही, पृ.सं.110
9 - वही, पृ.सं. 31
10 - वही, पृ.सं.42
11 - वही, पृ.सं. 109


- अजीत कुमार पटेल

रचनाकार परिचय
अजीत कुमार पटेल

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