सितम्बर 2015
अंक - 7 | कुल अंक - 54
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

भाषांतर

मूल कवि- रेनर मारिया रिल्के (4 दिसम्बर 1875- 29 दिसम्बर 1926)
मूल भाषा- जर्मन
हिंदी अनुवाद- नीता
 पोरवाल

 

पतझर

कुछ यूँ झर रही हैं पत्तियां,
मानो गिर रहीं हों बहुत ऊँचाई से
वहाँ आसमान में
मानो मुरझा गए हों बगीचे भी

ऐसे झर रही है हर पत्ती
मानो कह रही हो ‘न’

आज की रात
अकेलेपन से जूझती जमीन भी
बोझल मन लिए
विलग हो रही है सितारों से

इधर ढल रहा है यह हाथ
और उधर देखो
उस दूसरे हाथ को भी
झर रहे हैं हम सभी हर पल

लेकिन कोई तो है
शांत हैं
जिसकी हथेलियाँ
समूचे पतझर को
सम्हालते हुए भी


********************************************

गर्मियों में बारिश से पहले

कभी-कभी
तुम्हें भनक भी नही होती
और तुम्हारे चारों ओर फैली हरीतिमा
गायब हो जाती है अचानक से
जबकि तुम्हें तो वह
महसूस हो रही थी
नीम खामोशी के साथ
बढ़ती हुई खिड़की पर

यकायक नजदीक जंगल से
सुनाई देती है उसके टूटने की आवाज़
उस एक आवाज़ को सुन
भर उठते हो तुम अकेलेपन और आवेश से
और तब मानो कोई तुम्हें
दिला जाता है याद संत जीरोम की,
जिनकी करुण पुकार सुनते ही
झमाझम हो उठती थीं बारिशें

दीवारें प्राचीन तस्वीरों के साथ
बहुत आहिस्ते
हमसे दूर सरकती मालूम होती हैं,
जबकि हकीक़त यह है
कि वे नहीं सुन पाती हमारी बातें

प्रतिबिम्बित हो उठती है
उड़े रंग वाले चित्रपट पर
बचपन के उन उदास लम्बे दिनों की
सिहरती कम्पित रौशनी,
जब तुम रहा करते थे बहुत भयभीत!

 

**********************************************

शरद ऋतु के दिन

हे परमात्मा!
यह वह समय है
जब चरम पर है ताप

तो पड़ने दो धूप-घड़ी पर
अपनी परछाईं
और खुला छोड़ दो हवाओं को
मैदानों में

प्रण करो
आखिरी फल को भी
परिपूर्ण कर देने का

प्रण करो
विपरीत दिनों को
दो और दिन देने का,
पक जाने के लिए
दबाब बनाओ फलों पर
शराब में मिठास लाने के लिए
एक आखिरी कोशिश और करो

जिनके पास घर नही है
वे अब घर बनाएंगे क्या ही
जो एकाकी हैं अभी तक
आगे भी एकाकी रहेंगे वे,
वे जागते रहेंगे, पढेंगे, लम्बे पत्र लिखेंगे
और घूमेंगे नीचे और ऊपर, बेचैनी से भरे,
जब तक कि उड़ती रहेंगी पत्तियां


*******************************************

बार-बार

यह जानते हुए भी
कि प्रेम के परिदृश्य में
नज़र आता है
शोकाकुल करते नामों वाला
एक छोटा-सा कब्रिस्तान

और एक
खौफनाक खामोश रसातल
जहां गिरते दिखाई देते हैं दूसरे भी
बार-बार

फिर भी
पुराने दरख्तों तले
साथ घूमते हैं हम दोनों
बार-बार

आसमान से आँख मिलाते
पड़े रहते हैं फूलों बीच
बार-बार


- नीता पोरवाल

रचनाकार परिचय
नीता पोरवाल

पत्रिका में आपका योगदान . . .
कविता-कानन (2)आलेख/विमर्श (1)जो दिल कहे (1)भाषांतर (2)