सितम्बर 2015
अंक - 7 | कुल अंक - 54
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

लेख

हिंदी दिवस का मनोविज्ञान: डॉ. विजेंद्र प्रताप सिंह

 

सरकारी कार्यालय का राजभाषा विभाग। गिने-चुने 4 कर्मचारियों के लिए वर्ष  में सबसे व्यस्ततम माह, सितंबर का, क्योंकि 14 सितंबर को उनके विभाग का सबसे बड़ा वार्षिक दिन होता है। कार्मिक, वाणिज्य, लेखा, संरक्षा, सुरक्षा, इंजीनियरिंग तथा अन्य विभागों के कर्मचारियों की आवा-जाही का बढ़ना और वर्ष के अन्य महीनों में उपेक्षित राजभाषा कर्मियों की भी थोड़ी पूंछ का बढ़ना। थोड़ा-थोड़ा हनुमान होने का अहसास कराता है। थोड़ा-थोड़ा इसलिए कि उन्हें भी पता है चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात। तो बहुत ज्यादा उठा-पटक करना वर्ष के अन्य महीनों के लिए हितकर न होगा। इसलिए अंदर ही अंदर अल्पकालीन खुशी का अहसास लिए राजभाषा विभाग के एकमात्र ग्रुप बी राजपत्रित अधिकारी और 4 से 5 कर्मचारी जुड़े, भिड़े हुए रहते हैं वर्ष भर के आंकड़े एकत्रित करने के लिए सकारात्मरक माहौल बनाए रखने की जद्दोजहद में। जद्दोजहद ही है साहब, क्योंकि मासिक रिपोर्ट, त्रैमासिक रिपोर्ट, छ:माही रिपोर्ट के लिए अन्य विभागों के वे ही कर्मचारी राजभाषा विभाग के कर्मचारियों के साथ थोड़ा बहुत सम्मान के साथ बात करते हैं, जिन्हें हिंदी दिवस, हिंदी सप्ताह, हिंदी पखवाड़ा के दौरान किसी न किसी प्रतियोगिता में या हिंदी में कार्य करने के लिए प्रोत्साहन स्वरूप कोई पुरस्कार दे दिया जाता है। वरना अधिकांश की टिप्पणियां राजभाषा विभाग के नि:स्हाय, बेचारे  कर्मचारियों के हृदय को छलनी करने के लिए पर्याप्त से अधिक होती हैं। बतौर नमूना- आ गए साहब हिंदी वाले, बाद में आना बहुत काम है, आप लोगों के पास तो बस और कोई काम ही नहीं है, हिंदी डिपार्टमेंट की नौकरी सबसे बढि़या, नो टेंशन फुल पेंशन, आंकड़े भेजते रहो और मस्त रहो। संक्षेप में यही स्थिति होती है हिंदी विभाग के अधिकारी और कर्मचारियों के साथ अन्य विभागों के अधिकारियों एवं कर्मचारियों द्वारा दैनिक व्यवहार की। कई बार अन्य कर्मचारियों द्वारा दुत्कारे जाने के बाद भी बड़ी बेशर्मी से पुन: आंकड़े एकत्रित करने के लिए पहुंच जाना, राजभाषा विभाग के कर्मचारियों की अद्भुत सहनशक्ति और कुछ न कर पाने की मजबूरी का बेजोड़ नमूना कहा जा सकता है। क्योंकि राजभाषा नीति प्रोत्साहन एवं पुरस्कार की नीति है, दंड का तो कोई प्रावधान हो ही नहीं सकता क्योंकि ऐसी कोई व्यवस्था ही नहीं है जिससे देश की राजभाषा के प्रति असम्मानजनक रवैये के लिए तथा राजभाषा के प्रचार-प्रसार कर्ताओं के साथ असहयोग के लिए कोई दंड दिया जा सके। वैसे सरकारी कार्यालयों में जरा-सा प्रोटोकॉल्‍ा भंग करने पर भी माइनर से मेजर चार्जशीट झटके में जारी की जा सकती है, परंतु देश की राष्ट्रभाषा, राजभाषा के प्रति असम्मान वैसे ही है जैसे प्रेमचंद के गोदान का प्रमुख वाक्य ‘गरीब की लुगाई, सारे गांव की भौजाई’ जिसके मन में जो आए बोल सकता है राजभाषा एवं उसके प्रयोग प्रसारक अधिकारी तथा कर्मचारियों को।


राजभाषा विभाग में आंकड़ों का खेल ही सबसे निराला है। धारा 3 (3) का अनुपालन शत-प्रतिशत होना अनिवार्य है इसके लक्ष्य में कोताही के लिए भारत के सर्वोच्च नियंत्रक राष्ट्रपति को भी कोई छूट नहीं  है। (राजभाषा अधिनियम 1963) बड़ा सुखद एहसास कराता है, सुनने में किंतु जब आंकड़े एकत्रित कर भेजने की बारी आती है तो पसीने छूट जाते हैं राजभाषा कर्मियों के क्योंकि जिसके हाथ में समस्त जनसंपर्क के दस्तावेज, सूचना, अधिसूचना, कार्यालय आदेश आदि कुल मिलाकर 14 अभिलेखों में से एक को भी जारी करने का अधिकार नहीं है या राजभाषा विभाग का काम ही नहीं है, को शत-प्रतिशत द्विभाषी जारी कराने का पूरा उत्तरदायित्व राजभाषा विभाग का है। मरता क्या न करता। बेचारे भागते हैं कार्मिक विभाग में महीने भर में जारी किए कार्यालय आदेशों की अंग्रेजी प्रतियां लाकर हिंदी में अनुवाद कर जारी कराने के लिए क्योंंकि सरकार के सर्वोच्च कार्यालयों से भी ‘हिंदी वर्सन फोलो’ लिखे हुए अंग्रेजी पत्र तो बहुतायत में दिखाई दे जाते हैं किंतु मूल रूप से हिंदी में जारी पत्र कभी-कभार किसी हिंदी में काम करने का कीड़ा काटे हुए कर्मचारी या अधिकारी के द्वारा आ जाता है। मूल पत्राचार भी 100 प्रतिशत हिंदी में होना अनिवार्य है तो उनमें अधिकांश संख्या हिंदी विभाग से जारी पत्र ही प्रमुख होते हैं, उसी से आंकड़े की स्थिति जो भी रहे।


भाषा प्रयोग का खेल भी बहुत ही रोचक है सरकारी कार्यालयों में, जिन अधिकारियों, कर्मचारियों की सेवापंजी में लगे हुए शैक्षणिक योग्यता के प्रमाण पत्रों में अंग्रेजी सिर्फ विषय के रूप में होती है, वे सरकारी सेवा ज्वाइन करते ही, अंग्रेजी में पारंगत कैसे हो जाते हैं ये वास्तेव में शोध का विषय है, क्योंकि अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने वाला हिंदीभाषी पहले हिंदी में सोचता है फिर अंग्रेजी में भाषांतरण कर बोलता या लिखता है। भाषा शिक्षण एवं भाषाविज्ञान के अनुसार मातृभाषा का प्रभाव लक्ष्य भाषा पर रहता ही है, ऐसा बिरले ही हो पाता है कि व्यक्ति सोचे मातृभाषा में और सम्पूर्ण रूप से त्रुटिरहित प्रयुक्त लक्ष्य, भाषा या बाद में सीखी हुई भाषा में कर दे। फिर जिस सरकारी कर्मचारी की शिक्षा ही हिंदी माध्यम से हुई हो उसका अचानक सेवा में आते ही अंग्रेजी में पारंगत हो जाना और जगह-जगह ये कहते फिरना कि हिंदी में काम करना बहुत कठिन है। हम तो अंग्रेजी में बहुत कुशलता से कार्य कर लेते हैं, आश्चार्यचकित तो करता ही है। भाषा शिक्षण का एक और सत्य है कि हिंदी की लिपि की सबसे बड़ी विशेषता ही ये है कि जैसा कहा जाता है वैसा ही लिख जाता है या जा सकता है जबकि अंग्रेजी में साइलेंट वर्णों के प्रयोग की प्रचूरता किसी भी व्याक्ति तो भ्रमित एवं परेशान करने  के लिए पर्याप्त है। To (टू), Go (गो), Put(पुट) But (बट) आदि का प्रयोग हिंदी माध्यम से शिक्षा ग्रहण कर सेवा में आने कर्मचारी के लिए परेशानी सबब हो ही सकता है। न्यूमोनिया, सुनामी, साइकलोजी, नॉलेज, कैमिस्ट्री, चौधरी आदि पर भले ही चुटकुले के रूप में टिप्प‍णी की जाती हो परंतु भाषाई वैविध्य दर्शाने के अच्छे उदाहरण हैं जब कि हिंदी की देवनागरी लिपि में जो उच्चरित किया जाएगा वह उसी रूप में लिखा जाएगा। फिर भी अंग्रेजी सरल है और हिंदी कठिन। पत्र निर्माण में अंग्रेजी शब्दावली के शब्दंकोश का सहारा लेना पड़ सकता है परंतु एक हिंदी भाषा को हिंदी में पत्र तैयार करने के लिए कभी हिंदी शब्द का सहारा लेनी की आवश्यकता नहीं होगी।


वस्तुत: ये सारा का सारा खेल है हमारी मानसिक गुलामी का। हम आज तक अपने आप को अंग्रेजों से कम ही आंकते हैं और इसी क्रम में अंग्रेजी से भारतीय भाषाएं पीछे हैं। हमें सुपिरियर कहलाने में बड़ा मजा आता है। चार टूटी फूटी लाइनें अंग्रेजी में बोल कर हम बहुत ही गौरव का अनुभव करते हैं। विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों में अंग्रेजी के शिक्षक बहुत ही गर्व से ये कहते हुए पाए जाते हैं कि मैं अंग्रेजी पढ़ाता हूं।  अंग्रेजी विभाग वालों की बात दूर है अन्य विभागों वाले यथा-वाणिज्य, विज्ञान, भूगोल, इतिहास, नागरिक शास्त्र, समाजशास्त्र आदि विभागों वाले भी जब हिंदी के शिक्षक को संबोधित करते हैं तो उनकी वाणी में एक अजीब-सा तुच्छ्ता का भाव झलकता है, जैसे हिंदी वाला हां, है जिसकी कोई जरूरत नहीं थी पर है। दैनिक जीवन में भी कोई व्यक्ति हमारे अंग्रेजी की गलत लाइनें या श्‍ाब्द भी बोल कर चला जाता है तो हम हिंदी वाले झेंप जाते हैं उसके सामने ये तक नहीं सोचते है कि जो गलत शब्द अंग्रेजी का वो व्यक्ति बोलकर गया है उसका सही रूप हम जानते हैं और उसे सही सिखा सकते हैं। हमारे खून, सोच एवं व्यवहार में जो दासता की जड़ें समाई हुई हैं उनसे मुक्त नहीं हो पा रहे हैं हम। अन्य स्वतंत्र देशों की अपनी राजकाज की स्वतंत्र भाषाएं हैं परंतु भारत में जब देश का नाम ही हिंदी अंग्रेजी में समान नहीं कर पाए हैं तो बाकी कहा ही क्या जाए। अन्य देशों में राजभाषा उनकी अपनी भाषा है अंग्रेजी का प्रयोग वे अध्ययन एवं ज्ञान के लिए करते हैं और पाश्चात्य विचारधारा के अनुरूप उन्हें कोई चीज अच्छी लगती है तो वे अपनी भाषा में अपने देशकाल और वातावरण के अनुसार परिवर्तित करते हैं परंतु हम भारतीय अभी तक अपनी एक भाषा निर्धारित नहीं कर पाए हैं और इस पर भी बड़े गर्व के साथ कहते हैं कि भारत अनेकता में एकता का प्रतीक है। जबकि सही रूप में कहा जाए तो हम सिर्फ अनेकता का ही प्रतीक हैं। संविधान की अष्टम सूची में 22 भारतीय भाषाएं हैं और अंग्रेजी नहीं है फिर भी अंग्रेजी हमारे राजकाज की दूसरी कही जाने वाली प्रथम और प्रमुख भाषा है। मेरे विचार से मनोवैज्ञानिक स्तर पर ये भी बहुत अच्छा शोध विषय है। ये बहुत अच्छा संकेत है अंग्रजों के लिए उनको ये फीलगुड कराने के लिए कि आज भी भारत के लोग मानसिक तौर पर अंग्रेजी और अंग्रेजों के गुलाम हैं।


अंग्रेजी के पक्षधरों द्वारा ये तर्क दिया जाता है कि अंग्रेजी का ज्ञान रोजी-रोटी दिलाता है। यदि ऐसा ही सत्य मान लिया जाए तो फिर क्यूं भारत में भाषा आंदोलन किया गया? संविधान सभा द्वारा क्यों  सर्वसम्मतति से अंग्रेजी और सिर्फ अंग्रेजी को राष्ट्रभाषा एवं राजभाषा नहीं बनाया गया? शायद गलती हो गई देश के उन कर्णधारों से जो राष्ट्र हित राष्ट्र प्रेम के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर करने  से नहीं चूके। अंग्रेजी शासन काल भारत में नवजागरण लेकर आया और नये ज्ञान विज्ञान से देश को परिचित कराया, तो फिर क्यों भारतीयों को स्वतंत्रता की आवश्यवकता महसूस हुई। हमें आज भी अंग्रेजों के अधीन रहना चाहिए था शायद बहुत ज्यादा ज्ञानी हो गए होते हम। वेद, पुराण, शास्त्री ये व्याख्याएं भारतीय भाषाओं में निम्नस्तरीय कभी नहीं रही। जिस काम कला की पाश्चात्य दौड़ में हम आज अंधाधुंध भाग रहे हैं, वह उनसे पूर्व हमारे देश में विद्यमान रही, कोर्णाक, खजुराहो आदि के भित्तिचित्र प्रमाण है वात्सयायन का कामसूत्र विश्व प्रमाणित है। किसी भाषा का ज्ञान रखना और उसे नवीन अन्वेषणों से परिचित होने के लिए उपयोग लाया जाना हमारी प्रगति का परिचायक हो सकता है परंतु अपनी भारतीय भाषाओं, जिनमें ज्ञान का अथाह भंडार है उन्हें उपेक्षित करना उचित प्रतीत नहीं होता। आर्यभाषाओं के अतिरिक्त द्रविड़ भाषाएं भी हर दृष्टिकोण से परिपूर्ण एवं उन्नत हैं। हम राष्ट्र एकता के परस्पर भारतीय भाषाओं के ज्ञान के पक्षधर नहीं जबकि भारत के एक राज्य का व्यक्ति दूसरे राज्य में रोजी-रोटी के जुगाड़ में आवागमन ही नहीं करता अस्थाई रूप से आवास भी करता है परंतु ऐसा भी देखा जाता है कि हिंदी भाषी व्यक्ति अपने जीवन के 35-40 वर्ष गुजारने के बाद भी अहिंदी भाषी राज्य की भाषा नहीं सीख पाता है जबकि जीवन की सारी आवश्यकताएं वहीं से पूरी करता है। अहिंदी भाषी व्यक्ति सामान्य हिंदी जानता है बोल सकता है परंतु अंग्रेजी बोलता है। बड़ा ही दुखद लगता है जब व्यक्ति अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए टूटी फूटी ही सही परंतु हिंदी बोलता है और जब उसका काम निकल जाता है तो वह कहता है- ‘बॉस आई डोंट नो हिंदी, आई नो इंग्लिस।’ भारत में अधिकांश राज्यों  में वहां की क्षेत्रीय भाषा में पढ़ाई होती है परंतु अंग्रेजी वो माध्यमिक स्तग के बाद पढ़ते है, हिंदी भाषी राज्योंं में भी कांन्वेट स्कूलों को छोड़कर अन्य विद्यालयों में माध्यमिक स्तर से अंग्रेजी सिखाई जाती है परंतु जो भाषा हम अपने परिवार से सीखते हैं उस पर बाद में सीखी जाने वाली भाषा अंग्रेजी भारी पड़ जाती है और हम हिंदी, हिंदुस्ताानी होकर भी अंग्रेज बन जाते हैं।


- डॉ. विजेंद्र प्रताप सिंह

रचनाकार परिचय
डॉ. विजेंद्र प्रताप सिंह

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