सितम्बर 2015
अंक - 7 | कुल अंक - 54
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

प्रतिकार-रस
प्रिय प्रीती
 
मुझे मालूम है कि तुम मुझसे घृणा करती हो। लेकिन जीवन के असल सत्य को जो व्यक्ति समय से समझ जाये वास्तव में वही बुद्धिमान होता है। हमें (तुम्हे और मुझे) यह समझ लेना चाहिए कि जिस व्यक्ति से हम जीवन में सबसे अधिक घृणा करते हैं; और जो व्यक्ति हमे एक आँख ना सुहाता हो, उस व्यक्ति द्वारा दिये गये तीखे आघातों या कटाक्ष का हम प्रतिउत्तर न दें ऐसा कभी नहीं हुआ और शायद ना कभी होगा। शायद यह संभव ही नहीं है। तुमने और मैंने भी यही किया। तुम्हारा अंतिम संदेश - पत्र मैंने पढ़ा। जी (मन) ‘रेड फॉस्फोरस’ से भी अधिक तीव्र हो चला था। लेकिन मैंने स्वयं को  ठंडा रखा। मेरी इस ठंडी प्रतिक्रिया को शायद कायरता समझा गया हो, लेकिन प्रिय डरता वह है जिसके मन में चोर है। लेकिन मैं चुप रहा। तुम्हारे संदेश – पत्र के प्रत्येक अक्षर का मेरे पास जवाब था; तुम्हारे हर इल्जाम का प्रतिकार करने में मैं सक्षम था। लेकिन मैं चुप रहा। मैं चुप इसलिए रहा क्योंकि मैं समझ चुका हूँ कि तुम्हारी समझ के ताने -  बाने इतने सघन हो चुके हैं कि इनमें किसी अन्य सोच के धागों के लिए कोई स्थान शेष नहीं रहा। मैंने सिसीफस के विषय में अधिक नहीं पढ़ा लेकिन जाने किस आधार पर मुझे यकीन हो चला कि वह अपने समय का सबसे बड़ा मूर्ख रहा होगा। शायद यही वजह रही होगी जो मैंने तुम्हारे अंतिम संदेश – पत्र का प्रतिउत्तर नहीं दिया। किसी के इल्ज़ामात का प्रतिकार करने का अपना एक सुख है। इस सुख के आगे बड़ी से बड़ी घृणा ठीक उसी तरह घुलने लगती है जिस तरह द्रव्य और मिट्टी की भेली के मिलन से मिट्टी द्रव्य में विलय होने लगती है। लेकिन इस मिलन में घृणा के कंकड़ जलाश्य के तल में बैठे रहते हैं। मुझे यह समझ नहीं कि इसे सौभाग्य समझूं या दुर्भाग्य लेकिन हम दोनों ने इस इस सुख को भोगा है, वह भी एक साथ। निस्संदेह यही सुख रहा होगा जो तुम्हारी घृणा का पात्र होने के बावजूद तुम मुझे लिखने के मोह को तिलांजली ना दे सकी। परसाई जी निंदा रस की मिठास का बखान करते नहीं थकते किंतु मुझे लगता है कि प्रतिकार के रस जैसी मिठास और किसी अन्य रस में नहीं और वह भी तब और अधिक होगी जब आप किसी से प्रेम करते हो और फिर प्रेम मार्ग से यू टर्न लेकर वाय की दूसरी नफरत वाली डंडी पर चलने लगो। शायद यही वजह है जो मेरे जैसे व्यक्ति प्रतिकार करने के बहाने खोजते हैं। तुम्हारे मन में यह बात तो ठीक तरह बैठ गयी होगी कि मैं क्यों पेट्रॉल की ही भांति ज्वलनशील और अतिप्रतिक्रियाशील हूँ। मानव हूँ ना, इसलिए मुक्त नहीं हूँ – न क्रोध और घृणा से, और ना ही प्रेम से। लेकिन बावजूद इसके मैं चुप रहा। तुम्हारे अक्षर मेरे मन को कचोटते, कुरेद डालते और मैं तुम्हारे हर प्रश्न का उत्तर देने के लिए अधीर हो उठता। अधीरता के इस अहसास से और कोई परिचित हो न हो लेकिन तुम जरूर होंगी क्योंकि अधीरता के इस क्षण को तुमने भी जिया है।
 
वास्तव में प्रतिकार का रस हमें तब तक प्राप्त नहीं होता जब तक हमारे साथ अन्याय ना हुआ हो अथवा इसका बोध ना हुआ हो। अन्याय का इस रस से बड़ा गहरा संबंध है। असल में यह अन्याय ही इस रस की नींव रखता है। तुमने इस रस को क्यों भोगा, यह मेरे लिए आज भी एक प्रश्नचिह्न है क्योंकि अन्याय का भोगी तो मैं हूँ। अन्याय तो मेरे साथ हुआ है। सवाल केवल एक है – अन्याय का। इतिहास साक्षी है इसी अन्याय ने विश्व की सबसे सर्वोत्तम और महान क्रांतियों की पृष्ठभूमी तैयार की। अब चाहे वह 1789 की फ्रांसीसी क्रांति हो या 1917 की रूसी क्रांति या फिर हमारे समय की जयप्रकाश नारायण और अण्णा हज़ारे की क्रांतियां। उद्देश्य सभी का एक था – अन्याय का विरोध। विरोध करने की इस चाह को रस कहना गलत नहीं होगा। लेकिन इसपर पूर्ण विराम लगाना शायद आज भी संभव नहीं। हमारे निजी जीवन में यह कई रूपों में रहता है। इसकी उपस्थिति फलस्वरूप ही बेजोड़ संबंध एक क्षण में ही टूटकर बिखरने लगते हैं।
 
उस रोज़ किसी विवाह में तुम अचानक ही मिल गई थी। तुम्हारे आने का मुझे ज्ञान था। किंतु हम ऐसे मिलेंगे सोचा ना था। इस विवाह में जो कुछ भी हुआ वह बिलकुल भी अच्छा नहीं था। विवाह के जश्न में सब डूबे हुए थे। पंजाबी संगीत अपने चरमोत्कर्ष पर था। लेकिन हमारे मन का संगीत? वह इतना विपरीत क्यों? तुम्हारे मस्तिष्क ने उस समय क्या समझा होगा, क्या जाना होगा मुझे खबर नहीं लेकिन मैंने जो दृश्य देखा वह बड़ा ही भयावह था। सीधे शब्दों में लिख तो दूं लेकिन अब तुमसे डर लगने लगा है। अब तुम बच्ची नहीं रही ना! किसी एक वाक्य के कई अर्थ निकालने में निपुण हो गयी हो और मैं थक चुका हूँ दूसरों की इसी असमझ को ढ़ोते – ढ़ोते। पागलपन, रोष, क्रोध – जो कुछ मुझमें दीखता है, सब इसी का जन्मा है। एक सवाल सदैव से मेरे मन – मस्तिष्क को खरोंच रहा है। आखिर मनुष्य इतना लड़ता क्यों है? खासकर अपनो से। या फिर उनसे जिन्हे हम ब्रह्माण्ड में सबसे अधिक प्रेम करने का दावा करते हैं। यदि परिपक्वता हमारे भीतर केवल नफरतें लाती है तो लानत है इस परिपक्वता पर। ऐसे वृक्ष को इसके बचपने में काट देना चाहिए ताकि यह भविष्य में हमारी आब-ओ-हवा को जहरीली न कर सके।
 
अपनी सोच को खंगालने पर मुझे एक अटपटा – सा उत्तर मिला। मन कहता वह एक लड़कपन था, हमारा बचपना था जब हम प्रेम करते थे। अब हम बड़े हो गए हैं। तो क्या परिपक्वता ही हमारे भीतर नफरतों के जंगल उगाती है? यदि हां तो लानत है इस परिपक्वता पर, इस जवानी पर। बचपन की खड़मस्ती, छीना – झपटी, हुल्लड़बाज़ी और प्रेम-रस में भीगी क्षणभंगुर जलन का अंत इतना भयानक होगा यह सोचा ना था। मेरी समझ यहां भी धोखा खाती है। आखिर वजह कौन? तुम? मैं? या फिर अदृश्योन्य समय? मुझे इस बात का कोई दुख नहीं है कि कोई मुझसे कितनी घृणा करता है लेकिन यह बात मेरे मन को सदैव क्षतिग्रस्त करती रहेगी कि मैं तुम्हे समझने हेतु कितना आतुर था जबकि तुमने एक शब्द भी नहीं कहा। मैंने लाख यत्न किये लेकिन सब व्यर्थ। बिलकुल सिसीफस की तरह। विपरीत इसके मैंने तुम्हारे लिए अपने हृदय के नट बोल्ट खोल दिये किंतु तुम्हे यह भी स्वीकार नहीं। क्यों? इस प्रश्न का उत्तर मेरे पास नहीं है। एक बार अपनी आंखें बंद करो और ठंडी सांस लेकर सोचो – क्या मुझे यह उत्तर पाने का अधिकार न था? क्या इस विषय पर तुम्हारी कोई जवाबदेही नहीं? तुम कैसे बोल सकती हो। हमारे सपनों को खंडहर भी तो तुम्ही ने बनाया है। पता नहीं क्यों मुझे एकबार फिर से गलतफहमी होने लगी है कि यही प्रश्न तुम्हारी अंतरात्मा ने भी जरूर उठाए होंगे। तुम्हारा मन – मस्तिष्क भी इनके खौफजदा माहोल से एकबार तो अवश्य गुजरा होगा। लेकिन तुम्हारा उज्जड़पन अगले ही क्षण मेरी अक्ल के पर्दे उठा देता है। यदि तुमने एक बार भी इस विषय में सोचा होता तो हरी मिर्च का भौंडापन तुम्हारे वाणी में नहीं होता। ओछेपन की तुम कुलदेवी नहीं होती। खैर...
 
तुमने एक इल्जाम लगाया था। लिख दूँ? मगर किसी की विकृत मानसिकता के विषय में लिखने का मेरी नज़र में एक अर्थ यह भी है कि तुम स्वयं ऐसी मानसिकता के अधीन हो। इस बात का यह अर्थ बिलकुल भी ना लगाया जाये कि समाज के भौंडेपन के विषय में लिखा ही ना जाए। यह बात विषय पर निर्भर करती है। मैं बस इन बातों को व्यकतिगत रूप के सांचे में देखते हुए लिख रहा हूँ। यदि किसी चीज़ से समाज पर ज़रा भी फर्क पड़ता है तो तथ्यों को प्रकाशमय करना हमारा सामाजिक दायित्व बनता है। लेकिन यदि बात आपसी संबंधों की हो, यदि हमारी नफरत व्यक्तिगत हो और समाज को इससे रत्ती फर्क ना पड़े तो इसको मैं अपने अंदर का भौंडापन ही कहूंगा - एक कोरी विकृत मानसिकता।
 
इसका दूसरा अर्थ वह है जिसे समझने का तुम दावा करती आई हो। कितनी खोखली समझ है तुम्हारी। प्रेम का पेट अक्षरों से नहीं भरता। प्रेम की तृप्ती मूकपन में होती है न कि इने – गिने चंद खोखले शब्दों में। जिन लोगों के कंठ में आवाज़ नहीं रहती कोई उनसे जाने वे किस तरह अपनी आँखों से प्रेम की इसी मूकता का आनंद लेते हैं। प्रेम का तो आरंभ ही आंखों की मूकता से होता है। यहीं से प्रेम रिसकर हमारे मन तक पहुंचता है और हमारे मन को प्रेम द्रव्य में भिगो देता है। आह!  कितना मूर्ख हूँ मैं भी। किसे समझा रहा हूँ। इतना भी ना जान सका कि तुम तो प्रेम की देवी हो। तभी तो टूटे, बिखरे, उजड़े प्रेमियों को अपने प्रेम ज्ञान के अमृत से क्षणभर भी वंचित नहीं रहने देती। तुम्हारे प्रेमी भक्तजन तो तुम्हारे पांव धो पीते होंगे जिनका तुम इतनी लगन और परिश्रम से मार्गदर्शन करती हो। पीते हैं ना? इसका तो उत्तर दे सकती हो। और क्यों न पियें। इतने व्यस्त जीवन में भी तुम अपने भक्तों के लिए अपना कीमती समय उन्हे देती हो। लेकिन हां, तुम्हारी स्वयं की पहली प्रीत विफल रही। लेकिन इससे तुम्हे क्या फर्क पड़ता है। फर्क तो मुझे पड़ता है क्योंकि तुम काला सुरमा हो जो एक स्त्री की सुंदरता में चार चाँद लगा देता है, जिससे बुरी नज़र को दूर रखा जाता है और मैं एक काले हृदय वाला बुरा व्यक्ति हूँ जिसकी नज़र से बचने के लिए ही लोग सुरमे से काला टीका लगाते हैं।
 
लेकिन मुझे अभी भी अचंभा होता है। तुम्हारा जीना हराम क्यों नहीं हुआ? या फिर शायद होता भी होगा। मुझे क्या पता। तुमने तो अपने हृदय के हिस्से से मुझे तोड़ कर फैंक दिया। अब तुम्हारे जीवन में क्या हो रहा है इसका मुझे क्या पता। कुछ आधी रोटी – सा रह गया हूँ। न तुम्हारा, और ना ही किसी और का। तुम तो संपूर्ण हो गयी हो। याद है मुझे जब तुमने कहा था – “कोई अच्छी – सी...” दोहराउंगा नहीं। आह! कितनी सरलता से तुम बातें कह देती हो। लेकिन सुनो, मेरा इश्क कोई तिजारत नहीं है जो पहले इश्क का घाटा किसी दूसरी स्त्री से पूरा करूँ। ये खोजने खुजाने के कार्य तुम्हारे लिए हो सकते हैं मेरे लिए नहीं। मैं उन जुआरियों में से नहीं हूँ जो रोज़ थोड़ा – थोड़ा हारते हैं और रोज़ थोड़ा – थोड़ा रोते हैं। मैं बड़ा जिंदादिल जुआरी हूँ जिसने कच्ची उम्र में अपने सम्पूर्ण जीवन के सुकून को दांव पर रख दिया। जीवन के इस जुए में मेरी हार सौ फीसदी निश्चित थी लेकिन मुझे तुम पर स्वयं से अधिक विश्वास हो गया था। इसलिए निडर होकर खेल गया...लेकिन हार गया। मुझे अपनी इस हार का रत्तीभर अफसोस नहीं।
 

- रोनी ईनोफाइल

रचनाकार परिचय
रोनी ईनोफाइल

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