प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
महिला ग़ज़ल अंक
अंक -53

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव
ग़ज़ल-
 
हौसलों को परखना बुरा तो नहीं
टिमटिमाता दिया मैं बुझा तो नहीं
 
बादलों में छुपा चंद्रमा तो नहीं
या कुहासे घिरी इक दुआ तो नहीं
 
वक़्त की माँग तो है मगर हमसफ़र
रह बदलना मेरी पर रज़ा तो नहीं
 
जीत है, जश्न है, फ़ख्र का शोर है
बेटियाँ अनसुनी-सी सदा तो नहीं
 
फेर भी लेती आँखें मगर क्या करूँ
है बदलने की मुझमें कला तो नहीं
 
मोड़ हैं अनगिनत और कंकर भी हैं
रहगुज़र ये मेरी तयशुदा तो नहीं
 
हाँ, अज़ानों में है, मौन वंदन में है
दूर हमसे वो नूर-ए-ख़ुदा तो नहीं
 
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ग़ज़ल-
 
सच है किस्मत जो चाल चलती है
लहज़ा अपना कहाँ बदलती है
 
धूप नवयौवना-सी खिलती है
माथे कुमकुम सजाये चलती है
 
भोर आई हँसा खिला सूरज
नभ पे तितली कोई मचलती है
 
ज़िन्दगी अधलिखी इबारत-सी
रूह पढ़ती निखरती चलती है
 
गूंजे मन में मधुर-सी शहनाई
याद कोई पुरानी छलती है
 
मौन बाँचे वरक़ वो जीवन के
उम्र की शाम ऐसे ढलती है
 
सच में गुलशन बहार है या फिर
काग़ज़ी गुलफ़िशां ही छलती है

- वंदना
 
रचनाकार परिचय
वंदना

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