प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
महिला ग़ज़ल अंक
अंक -53

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव
ग़ज़ल-
 
क़ैद में गर मुझको अपनी बाँधता रह जाएगा
मेरे रहते वो मुझी को ढूँढता रह जाएगा
 
यूँ तो बदलेगा नहीं कुछ भी तेरे जाने के बाद
दामने-आरिज़ मगर हाँ, भीगता रह जाएगा
 
मेरी ख़ामोशी ही दे देगी उसे सारे जवाब
वो सवाल अपने ही दिल से पूछता रह जाएगा
 
किरचियाँ कुछ ख़्वाबों की चुभती रहेगी आँखों में
बाद तेरे उम्र भर का रतजगा रह जाएगा
 
मुब्तिला गर इश्क़ में ऐ दिल हुआ तो सोच ले
ज़िन्दगी भर ज़िन्दगी को ढूँढता रह जाएगा
 
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ग़ज़ल-
 
अधूरे ख़्वाब की दहलीज़ पे सोया नहीं करते
किसी भी एक ग़म पर बारहा रोया नहीं करते
 
यहाँ तक ठीक है तुम ढूँढने निकले हो चारागर
किसी की खोज में ख़ुद को मगर खोया नहीं करते
 
रुके हो तुम किसी अनजान के वादे पे हैरत है
यहाँ तो अपने भी बाट अपनों की जोया नहीं करते
 
मिली रुसवाइयाँ ईनाम में हमको अगर तो क्या
मुहब्बत में मिले जो दाग़ वो धोया नहीं करते
 
तुम्हें मातम मनाने की इजाज़त ही नहीं 'इक़रा'
शजर पत्तों के गिरने पर कभी रोया नहीं करते

- रिज़वाना बानो इक़रा
 
रचनाकार परिचय
रिज़वाना बानो इक़रा

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ग़ज़ल-गाँव (1)